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पहचान-पत्र से व्यक्ति के गर्व का मुद्‌दा भी जुड़ा है

इस मंगलवार को केंद्र सरकार ने ‘इमिग्रेशन चेक रिक्वायर्ड’ (ईसीआर) दर्जे वाले लोगों को नारंगी रंग के पासपोर्ट जारी...

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 01, 2018, 02:10 PM IST

इस मंगलवार को केंद्र सरकार ने ‘इमिग्रेशन चेक रिक्वायर्ड’ (ईसीआर) दर्जे वाले लोगों को नारंगी रंग के पासपोर्ट जारी करने का निर्णय वापस ले लिया। व्यक्तिगत और सामूहिक स्तर पर इसका विरोध किया गया था। फैसला वापस लेने से समाज में व्यक्ति की पहचान का महत्व रेखांकित होता है। प्रतिनिधिमंडलों ने ध्यान दिलाया कि नारंगी और मौजूदा नीला ऐसे दो भिन्न रंगों के कारण अजनबी देश में ‘दोयम दर्जे के नागरिक’ की तरह व्यवहार होने का खतरा हो सकता है, क्योंकि आमतौर पर ईसीआर दर्जा वे प्रवासी कामगार मांगते हैं, जो न तो ग्रेजुएट होते हैं और न करदाता। विदेश में पासपोर्ट ही एकमात्र पहचान होती है। केंद्र सरकार ने विरोध का औचित्य समझा और आखिरकार इस हफ्ते फैसला वापस ले लिया।

यह नीले-नारंगी पासपोर्ट का मुद्‌दा सिर्फ विदेश मंत्रालय के अधिकारियों की प्रशासनिक सुविधा का मसला नहीं था बल्कि इस मुद्‌दे में आत्म-सम्मान का मुद्‌दा भी निहित था, क्योंकि दोनों रंग के पासपोर्ट एक ही एयरपोर्ट और समान सुविधाओं के लिए इस्तेमाल होने थे। सिर्फ पासपोर्ट के रंग से देखने वाला सहयात्री के दर्जे के बारे में धारणा बना सकता था! इस कारण वे इस मुद्‌दे पर अपना पक्ष रखने पर मजबूर हुए। वैसे इस कदम से उनके विरोध का कोई संबंध नहीं था।

इससे मुझे मेरे मित्र के ड्राइवर की कहानी याद आई जो उत्तर प्रदेश का है। दो माह पहले मेरे मित्र के बिज़नेस हाउस में नया युवा ड्राइवर आया, जो सिर्फ आठवीं पास है लेकिन, ड्राइविंग में माहिर है। दो साल नई दिल्ली जैसे महानगर में ड्राइव करने के बाद उसने मुंबई जैसे तेज रफ्तार महानगर में वाहन संभालना सीख लिया था और कुछ नियमों को समझ गया था जिनका आमतौर पर मुंबई में बहुत कड़ाई से पालन होता है। चूंकि वह मेरे मित्र को अत्यधिक सुरक्षा वाले पोर्ट ट्रस्ट, एयरपोर्ट और यहां तक कि मंत्रालय में भी ले जाता है, तो उसे पुलिस से आवश्यक अनुमति के बाद पहचान-पत्र भी जारी किया गया है। मित्र की कंपनी में ऐसा पहचान-पत्र े के लिए पुलिस से क्लीयरेंस अनिवार्य है।

मेरा मित्र मानकर चल रहा था कि ड्राइवर अपने पहचान-पत्र को सातों दिन चौबीसों घंटे प्रदर्शित करता होगा, क्योंकि वह हिंदी प्रदेश से है और इन अत्यधिक सुरक्षा वाले क्षेत्रों में मराठी भाषी सुरक्षा गार्डों से स्थानीय भाषा में बोलना नहीं जानता। लेकिन मेरा मित्र पूरी तरह गलत था और इसका असली कारण इस हफ्ते तब समझ पाया जब वह मेरे घर आया। पिछले दो महीनों में हमारे ड्राइवरों का आपस में अच्छा परिचय हो गया था और वे एक-दूसरे को निजी बातें भी बताने लगे थे। इस हफ्ते उस नए ड्राइवर ने पूरे दिन अपना पहचान-पत्र प्रदर्शित करते रहने का असली कारण मेरे ड्राइवर को बताया। चूंकि ओला या उबर टैक्सी सर्विस के ज्यादातर ड्राइवर उसके गांव के हैं और प्राय: एयर या सी पोर्ट पर उनका आमना-सामना हो जाता है तो वह उन ‘गांववालों’ को यह बताने के लिए पहचान-पत्र प्रदर्शित करता है कि उसे व्यवस्थित जॉब मिला हुआ है और अब वह ‘टाइम-पास’ नहीं रहा, जो गांव में उसे कहा जाता था। दिल्ली में उसे यह मौका नहीं मिला, क्योंकि वह किसी आंत्रप्रेन्योर के निजी कर्मचारी के बतौर काम कर रहा था। मजे की बात है कि पहचान-पत्र का इस्तेमाल उन लोगों के सामने अपनी बात रखने के लिए हो रहा था, जो गांव में काम न पा सकने के कारण उसका मजाक उड़ाते थे। इसलिए किसी संगठन या देश में अलग लोगों के लिए अलग रंग के पहचान-पत्र नहीं होने चाहिए।

फंडा यह है कि  आइडेंटिटी कार्ड से प्रशासनिक उद्‌देश्य के साथ व्यक्तिगत गौरव भी जुड़ा है। एम्प्लाॅयर को दोनों का ध्यान रखना चाहिए।

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in

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