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ज़िंदगी के संघर्ष व समाज की हिकारत ने फौलादी बना दिया

मैं जब मेरे भूतकाल की तरफ देखता हूं तो फूट-फूट कर रोना आता है। मुझे लगता है कि मैं एक ऐसी खतरनाक गुफा से बच निकला हूं,...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 28, 2018, 05:00 AM IST

ज़िंदगी के संघर्ष व समाज की हिकारत ने फौलादी बना दिया
मैं जब मेरे भूतकाल की तरफ देखता हूं तो फूट-फूट कर रोना आता है। मुझे लगता है कि मैं एक ऐसी खतरनाक गुफा से बच निकला हूं, जो अंधेरे और कूपमंडूकता की असंख्य गहराइयों का समुच्चय थी। मैं जो जीवन जी रहा हूं, उसे मैं दूसरा जीवन, दूसरा मानता हूं। ऐसा लगता है जैसे मैं किसी दूसरे मुल्क का नागरिक बना हूं। जहां मेरा बचपन और जवानी गुजरी वह बिल्कुल अलग देश था, वहां की नागरिकता बिल्कुल अलग थी।

महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के हन्नूर गांव में 1956 में मैं पैदा हुआ। हम छह भाई और छह बहन थे। पिता की याद नहीं। मां और नानी ने हमें पाला। नानी झाड़ू लगाने का काम करती थीं, मैं उनके पास ही रहा। आज किसी भाई-बहन को मैं नहीं जानता, किसी से मिल नहीं सकता, क्योंकि मुझे पता ही नहीं कि वो कहां हैं, उन्हें नहीं पता मैं किस हाल में हैं, ज़िंदा हूं या नहीं। सब बिछड़ गए थे। मैं यदि पूरा सच ‘अक्करमाशी’ की तरह लिख दूं तो सच कहता हूं ‘म्हार’ के इस बेटे की कहानी आपको सोने नहीं देगी कि हम कितनी लाख बार मरे और फिर उठ खड़े हुए।

हम प्राइमरी में अपने गांव में पढ़ते थे। बाकि बच्चे स्कूल के क्लासरूम में बैठते और मैं क्लासरूम के बाहर चप्पलों के बीच। अगर कभी कुछ खाने को कहीं से स्कूल में आ जाता था तो वह सभी बच्चों के खा लेने के बाद मुझे मिलता था। मेरी हाल कुत्ते की तरह होती थी, जो दरवाजे पर बंधा आपको रोटी खाते एकटक देखता रहता है, आखिरी कौर के लिए। हम कभी स्कूल में पानी नहीं पी सकते थे। कुछ भी खाने के बाद चाहे जितनी प्यास लगे, पानी घर आकर ही पीना पड़ता। नल हमारे लिए नहीं था। नदी के ऊपर के हिस्से में सवर्ण पानी भरते, कपड़े धोते, पखाना साफ करते और हम नीचे का पानी पीते।

घर में खाने को इतना भर था कि तीन दिन पुराना सड़ा मांस भी मिल जाए तो हम दिवाली मना लेते थे। मैं तब तीसरी कक्षा में था, जब एक दिन मुझे ‘वन भोजन’ पर निबंध लिखने को दिया गया। मुझे ठीक-ठीक याद है कि मैं लिख नहीं पा रहा था। सोचा, मैं जो खाता हूं उसके बारे में कैसे लिखूं। गोबर में से निकाले हुए दाने की रोटी, सड़ा हुआ मांस। तभी मास्टर पीछे से गाली देते हुए बोला, ‘गाय का गोश्त खाता है और भोजन पर नहीं लिख पाता।’ स्कूल में पढ़ने की वजह से मैं अच्छा-बुरा जानने लगा था। एक दिन मेरी बहन जो स्कूल नहीं जाती थी, रास्ते में जमीन पर पड़े केले के छिल्के बटोरकर खाने लगी। मैंने उसे पीट दिया। उसने मां से शिकायत की तो मां ने कहा क्या हो गया छिल्का खाने से, वह मिट्‌टी पोंछकर तो खा रही थी। हालांकि, स्कूल जाने से पहले तक मैं भी खाता था।

सातवीं में मैं बोर्डिंग स्कूल में चला गया। उसके बाद की पढ़ाई महाराष्ट्र के सोलापुर जिले से हुई। वहां दलित पैंथर संगठन से जुड़ गया और राजनीतिक-सामाजिक चेतना में विस्तार हुआ। अखबारों में छपने वाली कविताएं-कहानियां बनावटी लगतीं। लगता कि यह तो हमारे बारे में है ही नहीं। फिर हमने भी कुछ कविताएं लिखनी शुरू कीं। बाद मैं मैंने 1982 में अपनी आत्मकथा ‘अक्करमाशी’ लिखी, जिसके बाद मैंने पहली बार समाज में सम्मान महसूस किया। सोलापुर से बीए पास करने के बाद मैंने मराठवाड़ा में टेलीफोन आॅपरेटर की नौकरी कर ली। उससे पहले मैं पढ़ाई के खर्च के लिए 30 रुपए महीने में एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाता था। 1986 में मुझे सोलापुर में रेडियो अनांउसर की नौकरी मिल गई। तब तक मैं एमए पास नहीं था। मैंने 1990 में कोल्हापुर से एमए किया। एमए में एक मजेदार घटना हुई। मैं जब एमए की परीक्षा दे रहा था तब मेरी लिखी किताब ‘अक्करमाशी’ एमए के कोर्स में थी। मेरी परीक्षा में उसी किताब से सवाल आए। मैंने लिख दिया, पर जानकर आश्चर्य होगा कि उसी प्रश्न-पत्र में मुझे सबसे कम नंबर आए। बहुत बाद में परीक्षक ने एक मुलाकात में बताया था कि उन्होंने इसलिए कम नंबर दिए कि लगा कि इतना अच्छा कोई कैसे लिख सकता है, जरूर इसने नकल की होगी।

असल संघर्ष तब शुरू हुआ जब मैंने यशवंत राव चह्वाण ओपन यूनिवर्सिटी नासिक में सहायक शिक्षक की नौकरी शुरू की। मुझे यहां कोई किराये पर मकान देने को तैयार नहीं था कि मैं म्हार हूं। इस विश्वविद्यालय मैं पहला आदमी था जो पीएचडी करके शिक्षक बनने की ओर था। मुझे परेशान किया गया। मुझे वीसी के कमरे में पूरी तरह नंगा कर दिया गया, हत्या की साजिश हुई। आखिर में मैं रामदास अठावले के पास गया, जो तब शरद पवार की सरकार में समाज कल्याण मंत्री थे। उनसे मैंने अपनी व्यथा कही, उन्होंने मुझे दो साल के लिए पीए बना लिया। दो साल बाद मैं फिर उसी विश्वविद्यालय में लौटा। रीडर हुआ, प्रोफेसर हुआ, वीसी बनने वाला था, पर दलित होने के कारण नहीं बनने दिया। इतने तिकड़म लगाए कि मैं डीन पद से ही दो साल पहले रिटायर हो गया। एमए, पीएचडी व सीनियर था, फिर भी मुझे काबिल नहीं माना गया।

खैर! मेरी किताबें देश और दुनिया के 136 विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती हैं, 12 पीएचडी हो चुकी हैं, 39 एमफिल हैं। अब जब मैं देश और दुनिया में बोलने जाता हूं तो आमतौर पर हवाई जहाज से ही जाता हूं। हर बार उतरते हुए एक बात मेरे दिल में हूक की तरह उठती है कि मैं पहली बार अपने गांव हन्नूर से सोलापुर कॉलेज पढ़ने के लिए बिना चप्पल 22 मील पैदल गया था। यह बात मैं अपने लिए नहीं कह रहा हूं, बल्कि मैं यह बताना चाहता हूं इस हालत में देश के लाखों नौजवान आज भी हैं, जो मीलों-मील जातीय उत्पीड़न और शोषण के खिलाफ बिना किसी मदद के पैदल चल रहे हैं, अपने सपने पूरे कर रहे हैं। बावजूद इसके कि दलितों के खिलाफ हिंसा पहले से बढ़ी है, सामूहिक हुई है। पर संघर्ष भी पहले से फौलादी और जाबांज हुआ है। -अजय प्रकाश से बातचीत पर आधारित

शरण कुमार लिंबाले

ख्यात मराठी लेखक

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Web Title: ज़िंदगी के संघर्ष व समाज की हिकारत ने फौलादी बना दिया
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