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समाज सुधार का जज़्बा बड़ा हो तो उम्र कोई मायने नहीं रखती

मैं राजस्थान के एक छोटे से गांव में रहती हूं। 15 साल की हूं और 10वीं में पढ़ती हूं। मेरे पिता मजदूर हैं और राजमिस्त्री...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jun 11, 2018, 05:10 AM IST

समाज सुधार का जज़्बा बड़ा हो तो उम्र कोई मायने नहीं रखती
मैं राजस्थान के एक छोटे से गांव में रहती हूं। 15 साल की हूं और 10वीं में पढ़ती हूं। मेरे पिता मजदूर हैं और राजमिस्त्री का काम करते हैं। मेरे गांव का नाम डेरा है और यह जयपुर के विराट नगर तहसील में स्थित है। लेकिन, मेरा गांव दूसरे गांवों से अलग है, क्योंकि यह बाल मित्र ग्राम है। यहां कोई बच्चा बाल मजदूरी नहीं करता और सभी बच्चे स्कूल जाते हैं। बाल पंचायत की सदस्य और बाल सरपंच रहते हुए मैंने अपने गांव के सभी बच्चों को बाल मजदूरी से निकालकर उन्हें स्कूल में पढ़ने के लिए दाखिल कराया है। सबसे बड़ी बात गांव में हमारे प्रयास से अब जातीय भेदभाव भी खत्म हो गया है। सभी जाति के बच्चे एक साथ उठते-बैठते और खेलते हैं।

मुझे स्कूल में पढ़ाया गया है कि देश का हर नागरिक बराबर है और उसके साथ जाति के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। लेकिन, एक दिन मुझे किताब में लिखी बात से अलग अनुभव हुआ। मैं दलित समाज की हूं। मुझे अपने गांव के स्कूल में मिड-डे मील परोसने से मना कर दिया गया था। यह 2015 की बात है। तभी मैं अपने गांव की बाल पंचायत की सदस्य बनी थी। मैंने कारण जानने की कोशिश की तो मुझे जवाब मिला कि मैं उस दलित समुदाय की हूं, जिसका कुछ भी बनाया और छुआ खाने से पाप होता है।

इस कुतर्क का मैंने जमकर विरोध किया और मामले को बाल पंचायत ले गई, जहां के बच्चों ने मेरा समर्थन किया। लेकिन, कुछ ब्राह्मणों ने मेरा विरोध किया। मैंने हार नहीं मानी और इस बुराई के खिलाफ लड़ती रही। आखिरकार, स्कूल के शिक्षकों ने मुझे मिड-डे मील परोसने की अनुमति दे दी। इस जीत ने मेरा आत्मविश्वास बढ़ाया और मुझमें सामाजिक बुराइयों से टकराने का जज़्बा पैदा किया। इस लड़ाई में बाल पंचायत के बच्चों ने मेरा जिस तरह से साथ दिया और उत्साह बढ़ाया, उससे मुझे बाल पंचायत की अहमियत भी समझ आई। आगे चलकर मैं अपने गांव के बाल पंचायत की सरपंच बनी। मैंने अपने गांव में छूआछूत और भेदभाव मिटाने का अभियान चलाया। घर-घर जाकर समझाया कि जात-पात और ऊंच-नीच की सोच एक सामाजिक बुराई है, इसे दूर कर ही हम सब मिल कर खुश रह सकते हैं। मैं पिछले तीन साल से बाल पंचायत के माध्यम से हर मकर संक्रांति को सामाजिक सद‌्भाव भोज का आयोजन करती हूं। इस दिन गांव के बच्चे जात-पात का भेदभाव भूलकर एक-दूसरे के घर खाना खाते हैं।

मुझ पर नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी का बहुत प्रभाव है। उन्होंने ही बताया कि हम बच्चों को अपने हक के लिए लड़ाई लड़नी चाहिए। यह भी बताया कि शिक्षा ही वह हथियार है, जिससे हम बच्चे अपना भविष्य संवार सकते हैं। इसलिए मैं पढ़ रही हूं। मैंने अपने गांव में देखा था कि बहुत सारे बच्चे स्कूल नहीं जाते, बल्कि बाल मजदूरी करते हैं। बाल पंचायत के बच्चों के साथ हम लोग उन बच्चों के घर जाते और उनके माता-पिता को समझाते कि उनकी पढ़ाई क्यों जरूरी है। शुरुआती परेशानियों के बाद आखिरकार हमें सफलता मिल गई और शिक्षा से वंचित गांव के 30 बच्चों का स्कूल में दाखिला हो गया। मैंने अपने स्कूल में एक और बड़ी समस्या का समाधान किया। स्कूल में पानी की जो टंकी थी उसकी नियमित सफाई नहीं होती थी। जिसकी वजह से पानी में कीड़े पड़ जाते थे। इसी दूषित पानी को बच्चों को पीना पड़ता था। कई बच्चे बीमार भी पड़ गए। बाल पंचायत में मैंने इस समस्या को कई बार उठाया और स्कूल के प्रधानाचार्य को पत्र भी लिखा। इसके लिए गांव के सरपंच से शिकायत भी की। आखिरकार इस समस्या का भी समाधान हो गया और टंकी की नियमित सफाई होने लगी। राजस्थान में बाल विवाह की भी समस्या है। हमारे गांव के आसपास के इलाकों में छोटी-छोटी लड़कियों का विवाह कर दिया जाता है। मैंने बाल विवाह की रोकथाम के लिए बाल मित्र ग्राम के बच्चों के साथ मिलकर कई रैलियां भी निकाली हैं। अब मेरे गांव के आसपास बाल विवाह का मामला देखने को नहीं मिलता। मैंने शिक्षा रैली भी निकाली हैं। गांव में सड़कें और नालियां भी बनवाई। हैंडपम्प भी लगवाएं। आप सोच रहे होंगे कि हैंडपंप और नालियां तो सरकार बनवाती है, हम बच्चों का इसमें क्या योगदान? तो मैं पहले आप को बाल मित्र ग्राम और बाल पंचायत के बारे में बताती हूं। फिर आप खुद ही समझ जाएंगे। बाल मित्र ग्राम (बीएमजी) बाल मजदूरी को रोकने और बच्चों को शिक्षित करने व उनमें नेतृत्व गुण विकसित का एक अभिनव प्रयोग है। कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रंस फाउंडेशन देशभर के 540 गांवों में इस प्रयोग को साकार कर रहा है।

प्रत्येक बीएमजी की अपनी एक बाल पंचायत होती है, जिसका गठन गांवों के बच्चों के बीच से चुनाव कराकर किया जाता है। बाल पंचायत गांव के बच्चों के लिए एक ऐसा मंच है जहां वे अपनी जरूरतों के मुताबिक मांगें रख सकते हैं और उसके लिए अभियान चला सकते हैं। बाल पंचायत को स्थानीय पंचायत मान्यता प्रदान करती है और निर्णय प्रक्रिया में उसे शामिल करती है। बच्चे गांव की भी समस्या उठाते हैं और उन्हें अंजाम तक पहुंचाते हैं। बाल पंचायत के पदाधिकारी मिल कर राष्ट्रीय महा बाल पंचायत गठन करते हैं और अपना सरपंच चुनते हैं। पिछले महीने ही मुझे इसका सरपंच चुना गया है।

मैं उम्र में छोटी हूं, लेकिन मेरा जज़्बा बड़ा है। जिस तरह से बाल मित्र ग्राम के बच्चों ने मुझमें विश्वास करते हुए महा बाल पंचायत का सरपंच चुना है, उससे मेरी जिम्मेदारी और बढ़ गई है। मेरा सपना है कि मैं अपनी पढ़ाई के साथ-साथ देशभर के बच्चों की आवाज को जोरदार तरीके से बुलंद कर सकूं।

(लेख बातचीत पर आधारित।)

ललिता दुहारिया

राष्ट्रीय महा बाल पंचायत सरपंच, प्रतिष्ठित रीबॉक फिट टू फाइट पुरस्कार से सम्मानित

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