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माता-पिता से दिन में कम से कम तीन बार बात करें

‘गुड मॉर्निंग।’ मैं जानता हूं कि जब आपने यह पढ़ा तो मुस्कराए और खुद को मन ही मन में गुड मॉर्निंग कहा। ‘गुड...

Danik Bhaskar | Apr 17, 2018, 05:15 AM IST
‘गुड मॉर्निंग।’ मैं जानता हूं कि जब आपने यह पढ़ा तो मुस्कराए और खुद को मन ही मन में गुड मॉर्निंग कहा।

‘गुड मॉर्निंग।’ अब मुझे पता है कि आपकी भौहें तन गई होंगी और मन में पूछा होगा, ‘ यह है क्या?’

‘गुड मॉर्निंग,’ अब मैं जानता हूं कि अाप चिढ़ गए होंगे। दूसरे पैराग्राफ पर जाने की कोशिश कर रहे होंगे, यह चेक करने कि कोई प्रिंटिग की गलत तो नहीं है। सही है न? तो आपको यह ‘गुड मॉर्निंग’ स्टोरी पढ़नी चाहिए।

सोमवार को सुबह जब मैं पवई लेक पर घूमने के लिए गया तो मेरे गृहनगर से आए मेहमान भी मेरे साथ आ गए। जब हम वहां सबसे पहले पहुंचने वाले बुजुर्गों के समूह के पास से गुजरे तो मैंने उनमें से एक से पूछा, ‘गुड मॉर्निंग अंकल, आपको सारे गुड मॉर्निंग मैसेज मिले या नहीं?’ उन्होंने प्रसन्नता से अपना सिर उठाया, मुझे सुबह का अभिवादन किया और कहा, ‘हां भई हां, आज सब बिल्कुल समय पर थे।’ मेरे मेहमान को कुछ भी समझ में नहीं आया और वे मुझसे इस असामान्य से वार्तालाप का मतलब पूछने लगे।

वास्तव में यह ‘65 प्लस’ नाम का छोटा वॉट्सएप ग्रुप है, जिसमें साठ तो ग्रुप एडमिन हैं और 300 से ज्यादा सदस्य हैं, जिससे हर ग्रुप एडमिन पांच सदस्यों से ज्यादा को मैनेज नहीं करता। वे साठ एडमिन इन छह लोगों को रिपोर्ट करते हैं और एक मैसेज भेजते हैं कि उन्हें सारे गुड मॉर्निंग मैसेज प्राप्त हुए। उस ग्रुप में हर किसी को एक ‘गुड मॉर्निंग’ मैसेज हर दिन भेजना होता है। इसी प्रकार दोपहर बाद और रात को भी मैसेज भेजा जाता है। यह ग्रुप एडमिन का काम है कि वह हर दिन आवश्यक रूप से भेजे जाने वाले ये मैसेज चेक करे। यदि उन्हें एक भी मैसेज न मिले तो उन छह में से एक सदस्य को सतर्क कर दिया जाता है, जो दिन के ज्यादातर समय साथ रहने का प्रयास करते हैं। फिर वे मैसेज न भेजने वाले के घर जाते हैं।

मेरे मेहमान थोड़े चिढ़-से गए और कहने लगे, ‘हे ईश्वर, मुझे तो इन गुड मॉर्निंग मैसेज से नफरत है, जो हर सुबह मेरे फोन में सैलाब की तरह आते हैं। मुझे समझ में नहीं आता कि वे 300 लोग कैसे मैनेज करते हैं और वह भी दिन में तीन बार। कुछ देर ठहरकर उन्होंने पूछा, ‘वे यह व्यर्थ का काम क्यों करते हैं?’ उसका भी कारण है कि क्यों वे इस रस्म के बारे में इतने गंभीर हैं।

हाल ही में जब उन्हंे एक 70 वर्षीय महिला से मैसेज नहीं मिला तो वे तत्काल उनके घर गए और उन्हें पता चला कि उस सुबह उन्हें लकवे का हल्का दौरा पड़ा था। उन्हें समय रहते बुजुर्गों का यह ग्रुप तत्काल पास के अस्पताल ले गया और उनकी जान बचाई जा सकी।

उन्हें अस्पताल में भर्ती कराए जाने के तीन घंटे बाद आया बेटा इन अनजान चेहरों को देखकर चकित रह गया, जिनसे वह जीवन में कभी नहीं मिला था। उसने पूछा, ‘क्षमा करें पर मैं आप लोगों को पहचान नहीं पाया। मुझे नहीं लगता कि मैं आपसे कभी मिला हूं।’ चूंकि उन्होंने उसकी मां को अस्पताल पहुंचाने में मदद की थी तो उसने अपने आप पर काबू रखा और पूछा, ‘सॉरी, पर आप मेरी मां को कैसे जानते हैं?’ फिर ग्रुप के एक सदस्य ने ‘65+’ ग्रुप की जानकारी दी और उसके मिशन के बारे में विस्तार से बताया।

फिर उन्होंने बताया, ‘आज सुबह हमें आपकी मां से मैसेज नहीं मिला तो हम तत्काल उनसे मिलने गए और बाकि बातें तो आप जानते हैं।’

फंडा यह है कि  हमें माता-पिता से बातें करते रहना चाहिए। फिर चाहे बातचीत हमें मिलने वाले गुड मॉर्निंग मैसेज जैसी बोरिंग ही क्यों न हो।

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एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

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