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दोषी ठहराने से पहले सिर्फ अपराध नहीं, इरादे भी देखें

क्या आपको 1975 में आई दीवार फिल्म का वह दृश्य याद है, जिसमें युवा पुलिस अफसर रवि (शशि कपूर) ब्रेड चोरी कर भाग रहे एक...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jun 06, 2018, 05:15 AM IST

दोषी ठहराने से पहले सिर्फ अपराध नहीं, इरादे भी देखें
क्या आपको 1975 में आई दीवार फिल्म का वह दृश्य याद है, जिसमें युवा पुलिस अफसर रवि (शशि कपूर) ब्रेड चोरी कर भाग रहे एक नौजवान चोर को गोली मार देता है। इस घटना के बाद रवि उस लड़के के घर जाकर भोजन देते हुए अपनी संवेदना जाहिर करता है। इस पर लड़के की मां रवि पर इस बात के लिए भड़क उठती है कि एक तरफ जहां बड़े अपराधी खुले घूम रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ अपने भूखे परिवार के लिए ब्रेड के चंद टुकड़े चुराने वाले लड़के को गोली मार दी जाती है। उस लड़के के पिता (ए.के. हंगल) जो शिक्षक भी हैं, अपनी प|ी को चुप कराते हुए कहते हैं कि इसमें मात्रा नहीं बल्कि इरादे देखे जाते हैं। मुझे लगता है कि ये शब्द पिता के नहीं, बल्कि उनके अंदर के शिक्षक के थे।

इससे मुझे अमेरिका में 1935 में घटी वास्तविक घटना याद आ गई। वह अमेरिका में घोर निराशा का दौर था। उस दौर में कुछ ऐसे लोग भी थे, जो सामने से जाने की बजाय अनजान लोगों के घर का पिछला दरवाजा खटखटाकर भोजन की भीख मांगते थे। नौकरियां न के बारबर थीं और पैसा दुर्लभ वस्तु हो गया था। इस मुश्किल दौर में फियोरेलो लागार्डिया न्यूयाॅर्क के मेयर थे, जिनके दिल में आम नागरिकों और गरीबों के लिए खास जगह थी। एक रात वे शहर के सबसे गरीब वार्ड के रात्रिकालीन कोर्ट में पहुंच गए थे। उन्होंने सुनवाई कर रहे जज को घर जाने के लिए कहा और खुद सुनवाई करने लगे। उस समय उनके सामने पहला केस एक वृद्ध महिला का आया। उस पर ब्रेड चोरी करने का अारोप था। उस वृद्ध महिला ने कांपते होंठों से गुनाह स्वीकार किया। लेकिन यह बताया कि उन्होंने यह चोरी अपने लिए नहीं, बल्कि अपनी बेटी और पोते-पोतियों के लिए की थी। वह खुद तो भूखी रह सकती थी, लेकिन पिता द्वारा छोड़ दिए गए अपने पोते-पोतियों को भूख से रोता नहीं देख सकती थी।

हालांकि, इसके बावजूद दुकानदार ने केस वापस लेने से मना कर दिया। उसने चिल्लाते हुए दलील दी कि यह गलत तरीका है, वह महिला दोषी है और न्याय होना ही चाहिए, ताकि अन्य लोगों को भी सबक मिल सके। लागार्डिया जानते थे कि दुकानदार सही है। उन्होंने शपथ ली थी और उन्हें न्याय का मान रखना था। लागार्डिया ने लंबी सांस ली। वे वृद्ध महिला की ओर मुड़े और बोले मुझे आपको दंडित करना होगा। न्याय की नजर में सब एक समान हैं। इसके बाद उन्होंने सजा का एेलान किया, दस डॉलर या दस दिन की जेल। यह सुनते ही महिला कांप उठी। इसके बाद वह कहने लगी कि यदि मेरे पास इतने पैसे होते, तो मैं चोरी ही क्यों करती। मैं जेल जाऊंगी, लेकिन मेरी चिंता यही है कि मेरे जाने के बाद मेरे परिवार की देखभाल कौन करेगा। लेकिन इस दौरान उनकी नजर जज के हाथों पर नहीं गई, जिन्होंने अपनी जेब से दस डॉलर निकालते हुए अपने हैट पर डालते हुए कहा, यह रहा फाइन जिसे मैं वहन करता हूं। यही नहीं, मैं इस कोर्ट रूम में मौजूद प्रत्येक व्यक्ति को ऐसी जगह पर रहने के लिए 50 सेंट का फाइन लगाता हूं, जहां एक वृद्ध महिला को अपने पोते-पोतियों को खिलाने के लिए चोरी करनी पड़े। कोर्ट के स्टाफ ने वहां मौजूद अन्य लोगों से वह फाइन जमा करके महिला को दे दिया। उस रात कोर्ट में 70 लोग थे, जिसमें गुस्से से लाल हो चुका दुकानदार भी शमिल था। उसे भी फाइन भरना पड़ा।

अगले दिन न्यूयॉर्क टाइम्स में खबर छपी कि ब्रेड चोरी करने की आरोपी एक महिला को कोर्ट में 47.50 डॉलर मिले, ताकि वह अगले कुछ महीनों के लिए जरूरी सामान खरीद सके।

फंडा यह है कि  महान लोग कानूनी शब्दों और उसके पीछे की भावनाओं के बीच के फर्क को समझते हैं।

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए टाइप करें FUNDA और SMS भेजें 9200001164 पर

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in

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