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हमारा अन्य से अनौपचारिक समझौता भी होता है

इस बुधवार को मुझे वॉट्सएप पर एक समाचार मिला, जिसमें लिखा था कि मध्यप्रदेश में शाजापुर के शिवपाल सिंह ने सूर्य देव...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jun 07, 2018, 05:15 AM IST

हमारा अन्य से अनौपचारिक समझौता भी होता है
इस बुधवार को मुझे वॉट्सएप पर एक समाचार मिला, जिसमें लिखा था कि मध्यप्रदेश में शाजापुर के शिवपाल सिंह ने सूर्य देव के खिलाफ प्रकरण दायर किया है। उसमें उन्होंने कहा है कि पिछले एक सप्ताह से उन्हें अत्यधिक गर्मी के कारण शारीरिक एवं मानसिक त्रास हो रहा है। संभव है कि शिवपाल सिंह यह भूल गए होंगे कि इंसानियत के तौर पर हमारा प्रकृति के साथ अनौपचारिक समझौता होता है जिसमें हमें पेड़ों को संरक्षण देना होता है ना कि नदियों को प्रदूषित करने जैसे दूसरे काम करना। चूंकि हम उसका पालन करने में विफल रहे हैं इसलिए सूर्य देव अपना क्रोध दिखा रहे हैं। इस घटना ने मुझे दो पुराने प्रकरणों की याद दिलवा दी।

पिछली 21 मई को माता-पिता क्रिस्टीना और मार्क रोटोन्डो ने अमेरिका की ओनोन्डागा काउंटी सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल करते हुए कहा कि उनके बेटे माइकल रोटोन्डो से कहा जाए कि वह उनका घर खाली कर दे। इस प्रकरण की पूरे अमेरिका में जिज्ञासावश चर्चाएं रहीं कि बढ़ते बच्चे को माता-पिता के घर में रहने देना चाहिए, फिर भले ही वह आलसी हो, कोई काम न करता हो और घर में किसी की मदद न करता हो। उस दंपती की जीत हुई क्योंकि उन्हें वह ऑर्डर मिल गया था जिसमें उनके बेटे को घर खाली करने के लिए बाध्य किया जाता। इसके पहले जज ने उनके बेटे माइकल की बातें सुनीं, जो अपनी बात रखने के लिए खुद कोर्ट में उपस्थित हुआ था। उसने कहा, मैं यह नहीं समझ पा रहा हूं कि वे मुझे घर से निकाले जाने को लेकर थोड़ा इंतजार क्यों नहीं कर सकते। यहां जज डोनाल्ड ग्रीनवुड ने चुटकी लेते हुए कहा, तुम कहना चाहते हो कि तुम माता-पिता के घर में छह महीने और रहने के हकदार हो जो वास्तव में अपमानजनक लगता है।

माता-पिता को उस कानूनी कार्रवाई का सहारा था जिसमें वे बेटे को लगातार (2 फरवरी से) सूचना-पत्र के माध्यम से कह रहे थे लेकिन उसे निकालने में विफल रहे। वह सूचना-पत्र की शुरुआत उन बातों के बाद हुई जो पिछले अक्टूबर से जारी थीं। उन बातों और सूचना-पत्रों में नौकरी हासिल करने के लिए प्रोत्साहन, दूसरा घर खोजने के लिए 1000 डॉलर से अधिक की मदद आदि बातें थीं। उन सूचना पत्रों में घर खाली करने की 30 दिन की समय सीमा थी, जो इसी वर्ष 15 मार्च को समाप्त हो गई। माता-पिता ने कहा कि वह पिछले आठ वर्ष से उनके घर में रह रहा है, उसने कभी यह नहीं सोचा कि उसे घर के खर्चों में योगदान भी देना चाहिए या घर के कामकाज में हाथ बंटाना चाहिए। यह सभी बातें और स्थितियां एक तरह के अनौपचारिक समझौता का हिस्सा हैं।

29 नवंबर, 2016 को दिल्ली हाईकोर्ट ने ऐसे ही एक फैसले में कहा- कोई बेटा अपनी वैवाहिक स्थिति के बावजूद अपने माता-पिता के घर में रहने का हकदार तब तक नहीं है, जब तक उसके माता-पिता इसकी मंजूरी न दें। फैसले में जस्टिस प्रतिभा रानी ने कहा, यहां मंजूरी की बात इसलिए है क्योंकि माता-पिता ने संबंधों के आधार पर सौहार्दपूर्ण रूप से उसे वर्षों तक घर में रहने दिया, इसका यह मतलब नहीं कि वे जीवनभर उसका भार उठाएंगे। इस प्रकरण में बेटे-बहू की वह अपील खारिज कर दी गई, जिसमें उन्होंने ट्रायल कोर्ट से जारी आदेश रद्द करने की गुहार लगाई थी। ट्रायल कोर्ट ने वरिष्ठ नागरिक माता-पिता के पक्ष में फैसला सुनाया था। प्रकरण दायर करने वाले माता-पिता अदालत से चाहते थे कि वह उनके बेटे एवं बहू को घर का कब्जा छोड़ने के लिए कहे क्योंकि उनके कारण उनकी जिंदगी ‘नरक’ बन गई थी।

फंडा यह है कि  हमारा प्रकृति, माता-पिता एवं अन्य से अनौपचारिक समझौता होता है। हमारी विफलता है कि हम उसका पालन नहीं कर पाते।

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए टाइप करें FUNDA और SMS भेजें 9200001164 पर

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in

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Web Title: हमारा अन्य से अनौपचारिक समझौता भी होता है
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