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सिर्फ सस्ती दवाएं काफी नहीं, बेहतर सरकारी अस्पताल भी हों

करंट अफेयर्स पर 30 से कम उम्र के युवाओं की सोच अमित पांडे, 29 गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर, छत्तीसगढ़ ...

Dainik Bhaskar

Jun 13, 2018, 05:15 AM IST
सिर्फ सस्ती दवाएं काफी नहीं, बेहतर सरकारी अस्पताल भी हों
करंट अफेयर्स पर 30 से कम उम्र के युवाओं की सोच

अमित पांडे, 29

गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर, छत्तीसगढ़

amitpandeyggu89@gmail.com

अगले महीने से सरकार दवा उत्पादों के लिए नए प्राइस इंडेक्स को लागू कर रही है। इसके तहत दवाओं की कीमतें तय करने के लिए न्यूनतम मापदंड बनाए जाएंगे। वे दवाएं भी शामिल की जाएंगी, जो फिलहाल मूल्य निर्धारण के अंतर्गत नहीं आतीं। अभी तक जनहित से जुड़ी दवाओं की कीमतें तय की जाती रही हैं। अभी 850 दवाओं की कीमतों पर सरकार का नियंत्रण है। अन्य दवाअों की कीमत भी साल में 10 प्रतिशत से ज्यादा नहीं बढ़ाई जा सकती। सरकार ने 3600 जन औषधि केंद्र खोले हैं, जहां 700 से भी अधिक जनेरिक दवाएं कम दाम पर मिलती हैं। इसी तरह आयुष्मान भारत योजना के तहत 50 करोड़ लोगों को 5 लाख रुपए तक स्वास्थ्य बीमा योजना का लाभ मिलेगा।

इसके बावजूद देश में स्वास्थ्य सुविधाएं आम आदमी की पहुंच से दूर हैं। देश डॉक्टरों की कमी से जूझ रहा है। आम जनता निजी अस्पतालों की ओर रुख इसलिए करती है, क्योंकि देश के सरकारी अस्पतालों की हालत खराब है। महंगी दवाइयां और निजी अस्पताल निम्न और मध्यमवर्गीय लोगों की पहुंच से दूर होते जा रहे हैं। इसका अंदाजा नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग चैलेंज अथॉरिटी द्वारा किए गए सर्वे रिपोर्ट से लगाया जा सकता है। अथॉरिटी ने दिल्ली के एक निजी अस्पताल के बिल का विश्लेषण किया तो पता चला कि वहां के निजी अस्पताल दवाओं, वस्तुओं और उपचार पर मरीजों से मुनाफा नहीं ले रहे हैं बल्कि उन्हें लूट रहे हैं। दवाइयों पर अंकित मूल्य, लागत मूल्य से कई गुना ज्यादा रहता है इसका भी अनुचित फायदा स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े लोग उठा रहे हैं।

निजी अस्पतालों को राह पर लाने के लिए सरकार के सामने दो विकल्प हैं। एक, सरकारी अस्पतालों में मरीजों के लिए पर्याप्त डॉक्टर, दवाइयां और सुविधाएं मुहैया कराई जाएं। दो, निजी अस्पतालों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ठोस नियम एव कानून बनाए। निजी अस्पतालों में ऑपरेशन, चिकित्सीय जांच, रोग लक्षण जांच आदि की कीमत सरकारी अस्पतालों की तुलना में कुछ प्रतिशत ही ज्यादा हो ताकि देश का हर नागरिक सरकारी व निजी दोनों तरह के अस्पतालों का लाभ ले सके।

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