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उपचुनाव के बाद भूल सुधार की राह पर भाजपा

उपचुनाव स्कूल के मासिक टेस्ट जैसे होते हैं। इसके अंकों का अंतिम परीक्षा में कोई महत्व नहीं होता। इसीलिए उपचुनाव...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jun 08, 2018, 05:20 AM IST

उपचुनाव के बाद भूल सुधार की राह पर भाजपा
उपचुनाव स्कूल के मासिक टेस्ट जैसे होते हैं। इसके अंकों का अंतिम परीक्षा में कोई महत्व नहीं होता। इसीलिए उपचुनाव के एक और दौर में भाजपा से बेहतर प्रदर्शन करने पर विपक्ष का जश्न जल्दबाजी हो सकती है लेकिन, भारत की प्रमुख पार्टी भी 2019 के आम चुनाव में जीत मानकर नहीं चल सकती।

यह सिर्फ ज्यादा एकजुट विपक्ष की चुनौती का मामला नहीं है। सच यह है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कैराना से महाराष्ट्र के भंडारा-गोंदिया तक भाजपा के वोट शेयर में गिरावट है, जो बढ़ते सत्ता विरोध का शुरुआती संकेत है। चुनावी धक्का उत्तर और पश्चिम में लगा है, यह भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी ‘उत्तर-पश्चिम’ की लहर ने भाजपा को 2014 की शानदार जीत दी थी। भाजपा यह दावा नहीं कर सकती है कि नरेन्द्र मोदी ने इन उपचुनावों में प्रचार नहीं किया। कैराना में मतदान के एक दिन पहले प्रधानमंत्री पड़ोस के बागपत जिले में नए एक्सप्रेस-वे को हरी झंडी दिखाते हुए क्षेत्र के लिए ‘अच्छे दिन’ का वादा कर रहे थे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तो क्षेत्र में रैलियों पर रैलियां कर रहे थे। यहां तक कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से जिन्ना की तस्वीर हटाने का सांप्रदायिक मुद्‌दा तक उठाया गया था। जैसा कि हुआ, मई 2018 बिल्कुल मई 2014 जैसा नहीं था। तब मुजफ्फरनगर के भयावह दंगों की पृष्ठभूमि में भाजपा असाधारण ध्रुवीकरण करने में कामयाब रही। इस बार गन्ने के अधिक यथार्थवादी मुद्‌दे ने -जैसा कि गन्ने का बकाया देने की किसानों की मांग से जाहिर होता है- बांटने वाले जिन्ना पॉलिटिक्स को मात दे दी। क्या हम 2019 के आम चुनाव के पहले ताजे राजनीतिक विमर्श की वापसी होते देख रहे हैं, जिसमें स्थानीय चिंताएं टीवी स्टूडियो में उठाए जाने वाले ‘राष्ट्रीय’ मुद्‌दों को मात दे देती हैं? जवाब हां भी है और नहीं भी।

चुनाव के वक्त स्थानीय मुद्‌दों का महत्व तो होता है। कैराना में पूरे भाजपा विरोधी विपक्ष ने राष्ट्रीय लोक दल के प्रत्याशी का समर्थन किया। इससे उन्हें विपक्षी एकता की मजबूती के फायदे का आंकड़ों में संकेत मिला अौर वे आत्मविश्वास के साथ ‘गन्ना’ कार्ड खेल सके। किंतु ‘स्थानीय मुद्‌दे को उठाने’ के संदेश को 29 राज्यों की 543 सीटों तक पहुंचाना बहुत बड़ी चुनौती है। राजनीतिक दलों की स्पर्धा की प्रवृत्ति के कारण वे चाहे उप-चुनाव में जगह छोड़ने को राजी हों पर संसदीय चुनावों की अंतिम परीक्षा में उनके इतना उदार होने की संभावना नहीं है। उदाहरण के लिए क्या बसपा उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के दौरान उस तरह सीटों पर दावा छोड़ेगी, जितनी उदारता उसने उपचुनाव में दिखाई है या ममता बनर्जी बंगाल में कांग्रेस से कैसे तालमेल करेगी, जबकि अपने घरेलू मैदान में वे कांग्रेस के खिलाफ युद्ध छेड़ रही होंगी?

भाजपा भी पूरे दृढ़-निश्चय के साथ 2019 के चुनाव को राष्ट्रपति प्रणाली वाली चुनावी स्पर्धा में बदलने पर तुली होगी। वह लोगों के सामने ‘मोदी बनाम कौन’ का मुद्‌दा रखेगी। यदि विपक्ष नेतृत्व की यह चुनौती स्वीकार करने के जाल में फंस गया, तो विजेता एक ही हो सकता है। चुनाव दर चुनाव मोदी ने अपनी अथक ऊर्जा और व्यक्तित्व के करिश्मे से भाजपा को अंतिम चरण में ऊंचा उठाने की क्षमता का प्रदर्शन किया है। आम चुनाव में भाजपा-आरएसएस की चुनावी मशीन का आकार इतना बड़ा और संसाधन इतने व्यापक हैं कि उन्हें बीच में बैठे मतदाताअों को अपने पक्ष में झुकाने का आत्मविश्वास पैदा हो जाता है। मोदी और उनके सहयोगी अमित शाह ने विपक्ष को उनकी जोड़ी के अजेय होने का यकीन दिलाकर अपनी कद्‌दावर छवि गढ़ ली है। क्रिकेट की दुनिया से रूपक लें तो स्टीव वॉ की ऑस्ट्रेलियाई टीम और क्लाइव लाइव की वेस्ट इंडीज टीम ने ज्यादातर मैच टॉस उछाले जाने के पहले ही इसलिए जीत लिए, क्योंकि विरोधी टीम उन्हें हराने की सोच भी नहीं सकती थी। किंतु जैसा कि 1983 में वेस्ट इंडीज के खिलाफ भारत की आश्चर्यजनक विश्वकप विजय और 2001 में कोलकाता में चमत्कारिक वापसी ने दिखाया कि अपराजेय दिखाई देने वाले प्रतिद्वंद्वी को भी मात दी जा सकती है, बशर्ते पर्याप्त आत्मविश्वास हो।

पिछले चार साल में लगभग हर चरण पर मात खाने वाले विपक्ष के बाद अब राजनीतिक चुनौती की रूपरेखा तो उभर रही है। इसके केंद्र में है आखिरी राजनीतिक हथियार : नेता की अस्तित्व बचाने की वृत्ति। इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं है कि क्यों कांग्रेस ने कर्नाटक में सरकार बनाते समय एचडी कुमारस्वामी के सामने एक तरह से समर्पण कर दिया या मायावती भूतकाल की शत्रुता भुलाने के लिए क्यों राजी हो गईं? जैसा कि महात्मा गांधी ने संघर्ष-समाधान का विचार प्रस्तुत करते हुए कहा था, ‘समझौते की संुदरता’। अब वह विपक्ष का मंत्र हो गया है यानी हठधर्मिता छोड़कर मुख्य प्रतिद्वंद्वी को पराजित करने के एकमात्र उद्देश्य से सुलह की इच्छा।

एेसा नहीं है कि प्रभावी दल जमीन पर लेट जाएगा और विपक्ष को खुद को कुचलकर अागे जाने देगा। संकेत मिलने लगे हैं कि मोदी-शाह जोड़ी सुधार के रास्ते पर चल पड़ी है। गन्ना उद्योग को विशाल सहायता पैकेज शायद देर से हुए अहसास का नतीजा है कि कैराना के बाद ‘गन्ना’ किसानों को राहत की जरूरत है। आम चुनाव के पहले ऐसी और रियायतों की उम्मीद है, क्योंकि मोदी सरकार पेट्रोल टैक्स से समृद्ध कोष को अाम आदमी के साथ बांटने की तैयारी कर रही है। शाह सहयोगियों को मना रहे हैं और कपिल देव से लेकर पूर्व सेनाध्यक्ष तक विभिन्न सेलेब्रिटी के साथ फोटो खिंचवा रहे हैं, जो भविष्य का एक और संकेत है कि 2019 के चुनाव के पहले भाजपा को मित्रों का दिल जीतने और लोगों को प्रभावित करने की कला फिर सीखनी होगी। ‘एकला चालो रे’ दिल छू लेने वाला गीत है पर जरूरी नहीं कि यह अच्छी राजनीति भी हो।

पुनश्च : कैराना नतीजे के एक दिन बाद मेरे दोस्त में मुझे भाजपा समर्थकों का एक वॉट्सअप फॉरवर्ड भेजा। इसमें लिखा था : ‘देखो कैराना में क्या हुआ। 35 फीसदी मुस्लिमों ने एकजुट होकर वोट डाले, जबकि हम हिंदू विभाजित हैं और पेट्रोल की कीमतों पर झगड़ रहे हैं’! चुनाव के पहले आने वाले महीनों में अपेक्षा कीजिए कि यह सांप्रदायिक स्वर और तीखा होगा।

(यह लेखक के अपने विचार हैं)

राजदीप सरदेसाई

वरिष्ठ पत्रकार

rajdeepsardesai52@gmail.com

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