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‘पावसाचा निबंध’ और वैचारिक अकाल

मराठी भाषा में कथा फिल्में बनाने वाले नागराज मंजुले की सफल ‘सैराट’ का हिन्दी संस्करण प्रदर्शन के लिए तैयार किया...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jun 15, 2018, 05:20 AM IST

‘पावसाचा निबंध’ और वैचारिक अकाल
मराठी भाषा में कथा फिल्में बनाने वाले नागराज मंजुले की सफल ‘सैराट’ का हिन्दी संस्करण प्रदर्शन के लिए तैयार किया जा रहा है और उसकी पहली झलक भव्य समारोह में दिखाई गई तब जाह्वनी को अपनी मां श्रीदेवी की याद इस तीव्रता से आई कि वह रो पड़ी। नागराज मंजुले ने एक लघु फिल्म बनाई है, जिसका नाम है ‘पावसाचा निबंध’ अर्थात वर्षा पर निबंध। नागराज मंजुले ने वर्षा के अपने अनुभवों को छवियों में रूपांतरित किया है। मौसम की पहली वर्षा जीवन में ताज़गी का अहसास जगाती है। सारे मौसम साधन संपन्न लोगों के लिए होते हैं। सिने माध्यम के पहले कवि चार्ली चैप्लिन को भूख ने बड़े प्यार से पाला था। वे कहते थे कि उन्हें वर्षा इसलिए पसंद है कि उसके होते समय कोई उनके आंसू नहीं देख पाता। गीतकार शैलेन्द्र ने अपना पहला फिल्मी गीत राज कपूर की ‘बरसात’ के लिए लिखा था और उसी स्मृति को संजोये रखने के लिए उन्होंने अपने बंगले का नाम ‘रिमझिम’ रखा था। बाद में देव आनंद अभिनीत ‘काला बाजार’ के लिए गीत लिखा था ‘रिमझिम के तराने लेकर आई बरसात, याद आए किसी से वह पहली मुलाकात।’

राज कपूर की फिल्म ‘श्री 420’ का गीत ‘प्यार हुआ, इकरार हुआ फिर प्यार से क्यों डरता है दिल’ बरसात के दृश्यों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि यह नायक-नायिका के महत्वपूर्ण फैसले से जुड़ा है। युवा प्रेमियों के बीच आंखों ही आंखों में इकरार होता है और वर्षा प्रारंभ होती है। दोनों को फुहारों से बचने के लिए एक ही छाते में आना पड़ता है। यहां छाता विवाह का प्रतीक बन जाता है। बरसात के दृश्यांकन में इलेक्ट्रिक शॉक का भय होता है, इसलिए यूनिट के सदस्य को गमबूट दिए जाते हैं। अमजद खान, नसीरुद्‌दीन शाह और आशा सचदेव अभिनीत व चार्ल्स डिकेन्स के उपन्यास ‘ऑलिवर ट्विस्ट’ से प्रेरित फिल्म ‘कन्हैया’ की शूटिंग में ही गमबूट नहीं पहने होने के कारण एक कर्मचारी को शॉक लगा था। अगले दिन ही अमजद खान पूरे यूनिट के लए गमबूट खरीदकर ले आए थे।

अनेक उपन्यास लिखने के बाद सर आर्थर कॉनन डायल ने एक उपन्यास के क्लाइमैक्स में शरलॉक होम्स को खलनायक से लड़ते हुए खाई में गिरकर मर जाने का विवरण लिख दिया। हजारों पाठकों ने अपना विरोध जताया। अगले उपन्यास में उन्होंने शरलॉक होम्स को पुन: प्रस्तुत किया। कहा कि वे घाटी में गिरे थे परंतु जख्मी हालत में पड़े पाए गए।

शेक्सपीअर का पात्र हेमलेट पांच शताब्दियों से जीवित है। वेदव्यास के पात्र तो हजारों वर्ष बीतने पर भी गुजरे नहीं हैं। अर्जुन की दुविधा हेमलेट की दुविधा से गुजरते हुए देवदास तक पहुंचती है। आज हर आदमी दुविधा में है। दुविधा के दायरे ऐसे फैल रहे हैं कि मध्य प्रदेश में एक ‘संत’ ने आत्महत्या कर ली। बादल सरकार के ‘बाकी इतिहास’ में आत्महत्या कर लेने वाला पात्र मंच पर आकर जीवित लोगों से पूछता है कि वे आत्महत्या क्यों नहीं करते। अज्ञात अर्थहीनता की लहरें हमें थपेड़े मारती रहती हैं। कथा फिल्म में आपके पास ढाई घंटे का समय है परंतु शॉर्ट फिल्म में अनेक सीमाएं हैं, जिनके भीतर रहकर अपनी बात कहनी होती है। फिल्मकार का इम्तिहान लेती हैं शॉर्ट फिल्में। दुर्भाग्यवश हमारे यहां इन्हें प्रदर्शित करने का मंच ही उपलब्ध नहीं है। हमारे पास एक ही रास्ता है कि फिल्मकार अपनी कथा फिल्म के साथ ही एक लघु उपदेशात्मक फिल्म भी बनाए। ‘पावसाचा निबंध’ से याद आया कि एक दौर में प्रश्न-पत्र में प्रेसी राइटिंग का प्रश्न होता था जिसमें छात्र को चंद शब्दों में सारांश प्रस्तुत करना होता था। आज के फैलते हुए बाजार के दायरों में सारांश का ही लोप हो गया है। वाचालता के इस स्वर्ण काल में भी अनअभिव्यक्त सपनों और इच्छाओं की कमी नहीं है। अनअभिव्यक्त इच्छाएं कभी-कभी शरीर में रोग बनकर बैठ जाती हैं जिनका इलाज महान लुकमान हकीम के पास भी नहीं था।

जयप्रकाश चौकसे

फिल्म समीक्षक

jpchoukse@dbcorp.in

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Web Title: ‘पावसाचा निबंध’ और वैचारिक अकाल
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