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आपके पैसे से बहुत बड़ा है आपके समय का दान!

वे पोलियो से प्रभावित कज़िन के साथ बड़े हुए थे, लेकिन फिर भी बरसों तक उन्हें ऐसे लोगों की तकलीफ का अहसास नहीं हुआ, जब तक...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 03, 2018, 05:25 AM IST

आपके पैसे से बहुत बड़ा है आपके समय का दान!
वे पोलियो से प्रभावित कज़िन के साथ बड़े हुए थे, लेकिन फिर भी बरसों तक उन्हें ऐसे लोगों की तकलीफ का अहसास नहीं हुआ, जब तक कि 22 नवंबर 2007 को उन्होंने पोलियो से प्रभावित 18 वर्षीय लड़की और तीन बच्चों की 27 वर्षीय विधवा मां को नहीं देखा, जिसने गैंगरीन के कारण दोनों पैर गंवा दिए थे। तब से वे ‘जयपुर फुट’ कहलाने वाले 30 हजार कृत्रिम पैर देकर ज़िंदगियां बदल देने में माध्यम बने हैं।

मिलिए रमन झुंथारा अग्रवाल से, जिनके जयपुर से 400 किमी दूर स्थित हनुमानगढ़ में कई बिज़नेस हैं और जो चैरिटी में पैसे की तुलना में वक्त अधिक देते हैं। इसकी शुरुआत छोटे भाई राहुल की अचानक मौत से हुई। रमन के विशाल बिज़नेस परिवार ने मिलकर ‘राहुल गुप्ता मेमोरियल चैरिटेबल ट्रस्ट’ शुरू करने का फैसला किया ताकि उसके नाम से कुछ अच्छा काम किया जाए। परिवार के बुजुर्ग वेद प्रकाश झुंथारा ने कहा कि उन्हें कोई साधारण चैरिटी की बजाय ऐसा कोई विशिष्ट सेवाकार्य करना चाहिए, जो गरीबों की ज़िंदगी बदलकर रख दे। उस समय रमन को ध्यान में आया कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के ज्यादातर कमाऊ सदस्य दुर्घटनाओं में या लापरवाही की वजह से बीमारी में पैर गंवा देते हैं और फिर कर्ज में फंस जाते हैं। रमन ने फैसला कर लिया कि वे इस तरह अपने पैर गंवाने वालों को नया जीवन देंगे।

2007 में जब उन्होंने ‘जयपुर फुट’ बनाने वाले कारीगरों को हनुमानगढ़ लाने का फैसला किया तो उन्हें पूरा भरोसा था कि इससे 250 किलोमीटर के दायरे में आने वाले बठिंडा, श्रीगंगानगर, सिरसा, हिसार, चूरू, बीकानेर, मुक्तसर और फरीदकोट तक के लोगों को फायदा होगा। उन्होंने शिविर लगाने के छह माह पहले 2 लाख रुपए की लागत से कलेक्टर व तहसील कार्यालय से लेकर हर बाजार में पोस्टरों के माध्यम से प्रचार अभियान चलाया। स्थानीय केबल नेटवर्क का भी इस्तेमाल किया गया। लेकिन, एक भी व्यक्ति आगे नहीं आया, क्योंकि आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों में पढ़ने की काबिलियत नहीं होती। शिविर की तारीख के कुछ पहले स्थानीय नगरपालिका के चेयरमैन ने उन्हें लाउड स्पीकर से घोषणा करने में मदद की और उससे आखिरकार लोग शिविर में आने लगे। शुरुआत पहले रोगी के रूप में 18 वर्षीय लड़की से हुई, जो रिश्तेदारों की मदद से आई थी। उसके बाद विधवा महिला आई। उस दिन 150 से कुछ ज्यादा लोग आए और अगले दिन 140 लोग आए, जिन्हें तीसरे दिन यानी 24 नवंबर 2007 को कृत्रिम अंग लगाए गए। रमन ने विधवा महिला को उनके लिए बनाए खास ट्रैक पर किसी बच्चे की तरह चलते देखा, उसकी आंखों में आत्मविश्वास के आंसू देखे। बाद में यह महिला पास के डॉ. सुखविंदर सिंह गाटे अस्पताल में ‘सफाई कर्मचारी’ बनी। वह अपने सभी बच्चों को पढ़ाने और अपने रहने के लिए छोटी जगह खरीद में कामयाब रही। रमन ने जो पहला कृत्रिम पैर दान किया उसने इन चार लोगों की ज़िंदगी बदल दी।

बाद में उन्होंने हनुमानगढ़ में अपना अस्पताल खोला, जो कृत्रिम पैरों का निर्माण करता है और उनकी सालाना मरम्मत व रखरखाव भी करता है। आज वे बांग्लादेश, पाकिस्तान, म्यांमार, चीन के सीमावर्ती क्षेत्रों और जम्मू-कश्मीर के ज्यादातर जगहों पर जाने जाते हैं, जहां कई कारणों से बहुत से लोग पैर गंवा देते हैं। भारतीय सेना इन जगहों पर उनके शिविरों के आयोजन में मदद करती है। पैसे के साथ रमन और अन्य न्यासियों ने जो वक्त दिया उसका बहुत सम्मान किया जाता है। ध्यान रहे कि अमीर और गरीब सबके लिए 24 घंटों का ही समान वक्त है।

फंडा यह है कि  ऐसे लोग कम होते हैं, जो पैसे के जरिये लोगों की ज़िंदगी बदलने के लिए अपना वक्त देते हैं। यही महत्वपूर्ण है।

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए टाइप करें FUNDA और SMS भेजें 9200001164 पर

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in

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