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दुखी ज़िंदगियों में सुकून लाकर महान मानव बनें

किसी भी अन्य मेहनती पिता की तरह डॉ. चंद्रशेखर संकुराथ्री ने प|ी मंजरी और दो बच्चों श्रीकिरण और शारदा को...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 25, 2018, 05:25 AM IST

दुखी ज़िंदगियों में सुकून लाकर महान मानव बनें
किसी भी अन्य मेहनती पिता की तरह डॉ. चंद्रशेखर संकुराथ्री ने प|ी मंजरी और दो बच्चों श्रीकिरण और शारदा को आंध्रप्रदेश के काकीनाडा स्थित गृहनगर में छुटि्टयां बिताने के लिए जाने दिया। भारतीय छात्र से वे कनाडा की जनस्वास्थ्य योजना ‘हैल्थ कनाडा’ में बायोलॉजिस्ट हो गए और फिर ओटावा में बस गए। 22 जून, 1985 को उन्होंने परिवार को एयरपोर्ट पर विदा किया। उस रात वे अपने बिस्तर में थकान से ढह से गए और सुबह अपने जीवन की सबसे बुरी खबर सुनने के लिए जगाए गए। 23 जून, 1985 को उनके परिवार को लेकर टोरंटो से मुंबई जा रहे विमान में विस्फोट हो गया। यह हादसा आयरिश कोस्ट के आसमान में लंदन में उतरने के ठीक एक घंटे पहले हुआ, जिसमें अटलांटिक महासागर पर से उड़ान भर रहे सभी 329 यात्री मारे गए। उनकी तो दुनिया ही उलट-पुलट हो गई। परिवार को आखिरी बार देखने के उनके सारे प्रयास नाकाम रहे।

चंद्रशेखर योद्धा थे और वे अपनी ज़िंदगी में कुछ करना चाहते थे। पहला विचार तो ऐसे गरीब लोगों की मदद करने का आया, जो इतने भाग्यवान नहीं होते कि उन्हें अच्छी ज़िंदगी मिले। 1988 में चंद्रशेखर ने आखिरकार ज़िंदगी में आगे बढ़ने का निर्णय लेकर जीवन को नया उद्‌देश्य देने का फैसला लिया। उन्होंने अपनी मोटी तनख्वाह वाली नौकरी छोड़ी, कनाडा का वह मकान बेचा, जिसमें वे दो दशकों से रह रहे थे और अपनी प|ी के गांव काकीनाडा में बसने का निर्णय लिया। अगले साल उन्होंने अपने पूरे परिवार की याद में काकीनाडी के बाहरी इलाके में गरीब ग्रामीणों को अच्छे स्वास्थ्य तथा शिक्षा की सुविधाएं देने के उद्‌देश्य से संकुराथ्री फाउंडेशन शुरू किया। तब दो चीजों ने खासतौर पर उनका ध्यान आकर्षित किया- बच्चों और वयस्कों में भी शिक्षा का अभाव तथा बेकाबू अंधत्व और तीसरी बात, गांव में कोई भी आपदा से निपटने के साधनों से लैस नहीं था।

इसलिए उन्होंने तीन बड़े कार्यक्रम शुरू किए- शारदा विद्यालयम के माध्यम से शिक्षा, शशिकिरण इंस्टीट्यूट ऑफ आफ्थेलमोलॉजी के माध्यम से नेत्र रक्षा और स्पंदन के माध्यम से आपदा राहत कार्यक्रम। आंख का अस्पताल गरीबों का मुफ्त में मोतियाबिंद का ऑपरेशन करता है, स्कूल वंचित बच्चों को शिक्षा देता है। आज तीनों संस्थाएं काकीनाडा से संचालित होती हैं लेकिन, उनका काम आंध्र के 4 जिलों में फैल गया है, जिसके दायरे में 2 करोड़ लोग आते हैं!

उनके पास कोई आंकड़ा नहीं है कि इन वर्षों में उन्होंने कितनी ज़िंदगियां बदलीं लेकिन 74 वर्षीय चंद्रशेखर का चेहरा खुशी से दमक उठता है जब वे देखते हैं कि एक सब्जीवाले के बेटे ने -जो उनके स्कूल का छात्र है- बीटेक में टॉप करके इंजीनियर के रूप में इसरो ज्वॉइन कर लिया है। सफलता की ये कहानियां तो आर्थिक और शैक्षणिक रूप से कमजोर उन ज़िंदगियों के चमकते उदाहरण हैं, जिन्हें चंद्रशेखर ने सवारा है। वे उन्हें जीवन की बाधाओं से निपटने में मदद करते हैं। संभव है इन गरीब व अनाथ बच्चों के माध्यम से वे सारे सपने पूरे कर रहे हों, जो वे अपने बच्चों के माध्यम से साकार करना चाहते थे। अगले माह उस क्रूर आतंकी हमले को 34 साल पूरे हो जाएंगे, जिसने उनकी ज़िंदगी बदल दी लेकिन, चंद्रशेखर के लिए दुखी आत्माओं की ज़िंदगी में शांति व सुकून लाना ज़िंदगीभर का उद्‌देश्य है। इस माह जारी हुई उनकी किताब ‘ए रे ऑफ होप’ पाठकों को बताती है कि कैसे स्वयंसेवा का कार्य हमें बेहतर मानव बनाता है।

फंडा यह है कि  ज़िंदगी हमसे नाइंसाफी भी कर देती है पर, दूसरों की ज़िंदगी में शांति लाकर हम अपने जीवन को उद्‌देश्यपूर्ण बना सकते हैं।

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए टाइप करें FUNDA और SMS भेजें 9200001164 पर

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in

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Web Title: दुखी ज़िंदगियों में सुकून लाकर महान मानव बनें
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