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क्रोध आपको चलाता है या आप क्रोध को चलाते हैं?

सात जून 1893 को भारत से एक युवा वकील काम के सिलसिले में डर्बन से प्रिटोरिया जा रहा था। उसने फर्स्ट क्लास का टिकिट...

Dainik Bhaskar

May 29, 2018, 05:25 AM IST
क्रोध आपको चलाता है या आप क्रोध को चलाते हैं?
सात जून 1893 को भारत से एक युवा वकील काम के सिलसिले में डर्बन से प्रिटोरिया जा रहा था। उसने फर्स्ट क्लास का टिकिट खरीदा था और इसलिए वह फर्स्ट क्लास के कम्पार्टमेंट में सवार हो गया। एक यूरोपीय उस कम्पार्टमेंट में आया और ऐसे युवा को देखकर, जो ‘कुली’ जैसा दिखाई देता था, रेलवे अधिकारियों को बुलाया और मांग की कि इस युवा को डिब्बे से उतार दिया जाए। भारतीय आदमी ने उतरने से इनकार कर दिया। विरोध करने पर उसे पीटरमैरिट्जबर्ग रेलवे स्टेशन पर सामान सहित जबरन उतार दिया गया। बेशक, यही वह घटना है, जिसने भारत के राष्ट्रपिता मोहनदास गांधी को जन्म दिया और जिन्होंने दक्षिण अफ्रीका में 21 साल रहते हुए नागरिक अधिकारों के लिए संघर्ष किया। शेष तो सब इतिहास है।

लगभग सौ साल बाद 1993 में ग्यारह वर्षीय बच्चा अरूप दास, जो अब 36 साल के वयस्क हैं, ज्यादातर सुबह अपनी बहन के जख्मी चेहरे को देखता। उसे क्रोध बहुत आता पर वह असहाय महसूस करता। स्कूल में पढ़ने वाला यह लड़का क्रूर पति के हाथों अपनी बड़ी बहन की तकलीफों से बहुत दुखी होता। छोटी उम्र के अरूप को गुस्सा तो बहुत आता पर उसने अपने गुस्से को 10वीं कक्षा में पहुंचने तक दबाए रखा। 1999 में जहां वे रहते थे, वहां कोई हाईस्कूल नहीं था। समीप का स्कूल 30 किलोमीटर दूर था और रोज आना-जाना आसान नहीं था। शिक्षा छोड़ने पर मजबूर होने के बाद वह पूरा वक्त मार्शल आर्ट सीखने में लगाने लगा। 2004 में कोलकाता पुलिस ज्वॉइन करने के बाद अरूप ने अपनी बहन से घरेलू हिंसा के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के साथ तलाक का मुकदमा कायम करवाया। वह यहीं नहीं रुका।

अब जल्दी से 2018 में आ जाते हैं। 14 साल की अंजलि और 12 साल की कशिश सिंह कोलकाता से 30 किलोमीटर दूर अपने पालकों सत्यदेव और राजंती सिंह के साथ एस्बेस्टॉस की छत वाले एक कमरे के मकान में रहते हैं। उनके पिता सब्जी बेचते हैं। एक दिन जब वे स्कूल से आ रहे थे तो बाइक पर सवार दो युवा अश्लील कमेंट करने लगेे। भागने के बजाय उन्होंने रुककर उन्हें चुनौती दी। स्कूली लड़कियों से उन दो युवाओं को यह उम्मीद नहीं थी और वे भाग गए। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि दोनों लड़कियां अरूप की स्टूडेंट हैं, जिन्हें 200 से ज्यादा लड़कियों के सेल्फ-डिफेंस गुरु के रूप में जाना जाता है। इनमें से ज्यादातर झुग्गी बस्तियों से हैं और अरूप उन्हें मुफ्त में ट्रेनिंग देते हैं।

किंतु अरूप के लिए यह आसान नहीं था। झुग्गी के ज्यादातर लोगों ने मुफ्त में आत्मरक्षा का प्रशिक्षण लेने से इनकार कर दिया था। सत्यदेव और राजंती सिंह जैसे लोग भी हैं, जो अपनी बेटियों के लिए ट्रेनिंग के उपकरण और पोशाक नहीं खरीद सकते। अरूप जब चुनी हुई लड़कियों में आग देखते हैं तो यह सब उन्हें खरीदकर देते हैं। तब वे न सिर्फ पीछा करने वालों को भगा देती हैं बल्कि अंजलि और कशिश सिंह की तरह मार्शल आर्ट्स स्पर्धाओं में मेडल भी जीतती हैं। अरूप पूरे हफ्ते पुलिस ट्रेनिंग स्कूल में व्यस्त एक्साइज, कस्टम्स और जेल विभागों के कॉन्स्टेबल-अधिकारियों को बिना हथियारों के लड़ना सिखाते हैं। रविवार को वे कोन्नागर ओलिंपिक इंस्टीट्यूट मैदान पर लड़कियों को तीन घंटे प्रशिक्षण देते हैं। गांधीजी के गुस्से ने ब्रिटिश शासकों को देश से भगा दिया। अरूप का क्रोध इन लड़कियों का पीछा करने वाले बदमाशों को भगाने के साथ इन युवा लड़कियों को समाज की बुराइयों के साथ लड़ने की हिम्मत दे रहा है, जाहिर है उन्हें अधिक सुरक्षित भी बना रहा है।

फंडा यह है कि  आपको क्या चलाता है- आपका गुस्सा अथवा आप गुस्से को चलाने में कामयाब होते हैं? जरा इसके बारे में सोचिए।

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए टाइप करें FUNDA और SMS भेजें 9200001164 पर

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

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