Hindi News »Rajasthan »Nagar» कालाधन सफेद करने के लिए हर साल बन रही हैं 100 से ज्यादा पार्टियां, 75% कभी चुनाव नहीं लड़ीं

कालाधन सफेद करने के लिए हर साल बन रही हैं 100 से ज्यादा पार्टियां, 75% कभी चुनाव नहीं लड़ीं

अमित कुमार निरंजन | नई दिल्ली पिछले एक दशक से देश में कुकुरमुत्तों की तरह राजनीतिक दल पैदा हो रहे हैं। इसके पीछे...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jun 02, 2018, 05:25 AM IST

अमित कुमार निरंजन | नई दिल्ली

पिछले एक दशक से देश में कुकुरमुत्तों की तरह राजनीतिक दल पैदा हो रहे हैं। इसके पीछे कालेधन को सफेद करने का खेल भी है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, हर साल औसतन 100 नए दलों का रजिस्ट्रेशन हो रहा है। देश में 2100 से ज्यादा दल हैं, इनमें से दो हजार बिना मान्यता वाले हैं। जबकि 75% दलों ने आज तक चुनाव नहीं लड़ा। 55% पार्टियां पिछले 10 साल में रजिस्टर्ड हुई हैं। अभी 400 पार्टियों के आवेदन रजिस्ट्रेशन के लिए चुनाव आयोग में कतार में हैं। करीब दो हजार गैर-मान्यता प्राप्त पार्टियां ऐसी हैं, जिनके चंदे का लेखा-जोखा न तो चुनाव आयोग के पास है और न आयकर विभाग के पास।

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम जैदी कहते हैं कि इसमें कोई शक नहीं कि चुनाव में हिस्सा न लेने वाले दल कालेधन को सफेद करने का जरिया बन गए हैं। नियम के तहत उन्हीं पार्टियों को चंदे में छूट मिलती है जो हर साल चंदे का ब्यौरा आयोग और आयकर विभाग को देते हैं। जो पार्टियां ऐसा नहीं करती, तो उन्हें चुनाव आयोग डी-लिस्ट कर सकता है। यानी उनका पंजीकरण तो रद्द नहीं होगा, लेकिन टैक्स में छूट नहीं मिलेगी। एक अनुमान के मुताबिक 60% पार्टियां खर्च का ब्यौरा देती हैं। इनमें से सिर्फ 5% पार्टियों के खर्च की जांच आयकर विभाग करता है। आयोग और आयकर विभाग तभी जांच करता है जब कोई शिकायत करे। चुनाव आयोग के सचिव प्रमोद शर्मा ने बताया कि पता और अन्य गलत जानकारियां देने के कारण इस बार 225 पार्टियों को डी-लिस्ट किया है।





गलत जानकारी देने पर 225 पार्टियां डी-लिस्ट, आयकर छूट नहीं मिलेगी

तीन उदाहरण- कैसे ब्लैकमनी को व्हाइट बना रहे हैं राजनीतिक दल

1. कानपुर के अखिल भारतीय नागरिक सेवा संघ ने 8 लाख चंदा जुटाया था। बैंक बैलेंस 18 लाख रुपए था। पार्टी ने कभी किसी चुनाव में हिस्सा नहीं लिया। जांच में पता चला कि इसने कई सालों से ऑडिट रिपोर्ट भी जमा नहीं की थी।

90% थे गैर-मान्यता प्राप्त दल 2014 चुनाव में

2014 में हुए लोकसभा चुनाव में करीब 464 पार्टियों ने हिस्सा लिया, जिनमें से 419 गैरमान्यता प्राप्त दल थे।

400 से ज्यादा नई पार्टियां 4 साल में बनीं

4 वर्ष में 412 नए राजनीतिक दल रजिस्टर्ड हुए, जबकि बीते एक दशक में 1023नए दलों ने रजिस्ट्रेशन कराया। इनमें से सिर्फ 20 से 25% ने विधानसभा या लोकसभा चुनाव लड़ा।

4% से कम वोट यानी गैर- मान्यता प्राप्त पार्टी

पार्टी अगर राज्य में 4% वोट हासिल करती है, तो उसे स्टेट पार्टी का दर्जा मिल जाता है। यदि चार राज्यों में 6% वोट मिल जाते हैं, तो उसे राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिलता है।

2. फरीदाबा द की राष्ट्रीय विकास पार्टी ने 40 लाख रुपए का चंदा घोषित किया था, लेकिन सीबीडीटी जांच में पता चला कि बैंक खाते से दो करोड़ का ट्रांजैक्शन किया। पार्टी पर आईटी एक्ट के तहत जुर्माना लगाया गया।

चुनाव आयोग और आयकर विभाग के पास इन पार्टियों के चंदे की जांच करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। तमाम पार्टियां चंदे का खर्च दूसरी मदों में करती हैं। इस तरह से ये पार्टियां ब्लैक से व्हाइट मनी करने का जरिया बन गई हैं। - जगदीप छोकर, संस्थापक सदस्य, एडीआर

चुनाव में हिस्सा लेना और न लेना पार्टियों का विशेष अधिकार है। लेकिन ये बात सही है कि अनरिकॉग्नाइज्ड पार्टियां ब्लैक को व्हाइट मनी करने का जरिया बन गई हैं। चूंकि ये पार्टियां चुनाव में नहीं उतरती हैं इसलिए इन पर सरकारी एजेंसियों का ध्यान भी नहीं जाता। - संजय कुमार, निदेशक, सीएसडीएस

पार्टी दफ्तर की जगह चल रहा किराना स्टोर

दिल्ली की मातृ भक्त पार्टी के कार्यालय के पते पर जब भास्कर संवाददाता पहुंचा, तो यहां किसी पार्टी का कार्यालय नहीं मिला। बल्कि किराना दुकान चल रही थी। पूछने पर दुकानदार अमित ने बताया कि पहले यहां पार्टी का कार्यालय हुआ करता था, लेकिन अब तो यहां सिर्फ यही दुकान है। इस पार्टी में पदाधिकारी रहे संदीप जिंदल ने बताया, ‘हमारे जो पेपर थे, वो हमने चुनाव आयोग को जमा कर दिए थे। इससे ज्यादा जानकारी नहीं है।’ पहले इस पार्टी का नाम परमार्थ पार्टी था।

3. दिल्ली की परमार्थ पार्टी ने 2 वर्षों में डेढ़ करोड़ चंदा दिखाया। जांच में पता चला कि चंदा लेने का तरीका और बैंक बैलेंस ठीक था। पर खर्च करने का तरीका गलत था। पार्टी ने राजनीतिक गतिविधि में एक भी रुपया खर्च नहीं किया।

चुनाव आयोग और आयकर विभाग के पास इन पार्टियों के चंदे की जांच करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। तमाम पार्टियां चंदे का खर्च दूसरी मदों में करती हैं। इस तरह से ये पार्टियां ब्लैक से व्हाइट मनी करने का जरिया बन गई हैं। - जगदीप छोकर, संस्थापक सदस्य, एडीआर

चुनाव में हिस्सा लेना और न लेना पार्टियों का विशेष अधिकार है। लेकिन ये बात सही है कि अनरिकॉग्नाइज्ड पार्टियां ब्लैक को व्हाइट मनी करने का जरिया बन गई हैं। चूंकि ये पार्टियां चुनाव में नहीं उतरती हैं इसलिए इन पर सरकारी एजेंसियों का ध्यान भी नहीं जाता। - संजय कुमार, निदेशक, सीएसडीएस

दैनिक भास्कर पर Hindi News पढ़िए और रखिये अपने आप को अप-टू-डेट | अब पाइए Nagar News in Hindi सबसे पहले दैनिक भास्कर पर | Hindi Samachar अपने मोबाइल पर पढ़ने के लिए डाउनलोड करें Hindi News App, या फिर 2G नेटवर्क के लिए हमारा Dainik Bhaskar Lite App.
Web Title: कालाधन सफेद करने के लिए हर साल बन रही हैं 100 से ज्यादा पार्टियां, 75% कभी चुनाव नहीं लड़ीं
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

More From Nagar

    Trending

    Live Hindi News

    0

    कुछ ख़बरें रच देती हैं इतिहास। ऐसी खबरों को सबसे पहले जानने के लिए
    Allow पर क्लिक करें।

    ×