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अनुशासन, अभ्यास, अनुभूति और अनुभव आधारित अलख

अनुशासन, अभ्यास, अनुभूति और अनुभव आधारित अलख क्या है एक सामान्य नागरिक का ‘आइडिया ऑफ इंडिया’? राष्ट्र,...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jun 09, 2018, 05:25 AM IST

अनुशासन, अभ्यास, अनुभूति और अनुभव आधारित अलख

क्या है एक सामान्य नागरिक का ‘आइडिया ऑफ इंडिया’?

राष्ट्र, राष्ट्रवाद और राष्ट्रप्रेम का एक ही अर्थ है : कर्तव्य निर्वहन।

- भारत क्या है - इस पर दी जा रही विभिन्न व्याख्याओं का सरल अर्थ

भारत क्या है?

मैं। तुम। हम सभी।

नहीं।

हम।

केवल हम। छोटी-सी परिभाषा।

‘केवल’ तो संकुचित शब्द है।

जहां ‘केवल मेरे पास’ हो, ऐसा नहीं ; सभी के पास हो, वह भारत।

जिसकी सीमा होकर भी न हो, वह भारत।

भारतीय अनादि हैं।

जिनका न कोई आरम्भ था। न ही कोई अंत है।

विचित्र व्याख्या है यह। निश्चित। मनुष्य विचित्र ही है।

यदि शांत, संयत, स्पष्ट होता तो निरंतर नया कहां से करता?

शांतनु का पाप न होता, सत्यवती का ‘किन्तु-परन्तु’ न होता

तो भीष्म कैसे होते? दृढ़ता और प्रतिज्ञा की प्रेरणा कौन देता?

स्वार्थ का त्याग है भारत। ‘त्याग’ अर्थात भारत।

कैकयी न होती, यदि मंथरा न होती, न वचन का अर्थ पता होता।

कम होंगे। किन्तु हैं। ‘वचन’ पर प्राण देने वाले भारतीय।

किन्तु विद्वान ने कितना सही कहा है- कि पुत्र-राम, भाई-राम, पति-राम नहीं- राजा राम।

रामराज्य अर्थात् भारत। जिसमें सभी नागरिकों का महत्व हो।

हम भारतीय नागरिकों का?

नहीं।

विश्व के नागरिकों का। मानव मात्र का।

सहिष्णुता अर्थात् भारत।

‘सभी दिशाएं हमारी मित्र हों’।

वेदों के इस वाक्य से रेखांकित है ध्येय।

कोई भी, कहीं से भी आए - स्वागत है। इसलिए अाक्रांता भी चले आए। दासता भी झेली।

उदारता को कायरता समझ लिया गया।

किन्तु प्रत्येक हीन भाव में महीन निर्माण का अर्थ ढूंढने वाला भारतीय।

मनुष्य को मनुष्य पर बलपूर्वक साम्राज्य बनाने से वीरतापूर्वक रोकने वाला भारत।

दमन को अहिंसा से नष्ट करने वाला भारत।

किन्तु युद्ध में शौर्य को धर्म रूप में स्थापित करने वाला भारत।

धर्म?

धर्म अर्थात् कर्त्तव्य। कर्म।

राजधर्म। पड़ोसी धर्म। मानव धर्म।

कुचक्र लाख चलें, धर्म का भारतीय अर्थ रिलीजन, मजहब, पंथ नहीं।

धर्म की जय हो। अधर्म का नाश हो। प्राणियों में सद्‌भावना हो।

सद्‌भावना अर्थात् भारत। समूचे संसारवासियों के प्रति प्रेम।

सभी ओर से अत्याचार से शोषित होकर आने वालों को शरण देने वाला भारत।

और विश्व धर्म संसद, शिकागो में विवेकानंद की ऐसी वाणी से प्रस्फुटित होने वाला भारत।

वाणी से नैराश्य को जयघोष में परिवर्तित करने वाला भारतीय।

विद्वानों ने बताया : दिन को भी अंतत: थकना ही होता है, रात्रि के लिए।

हरिवंश ने कहा : प्रात: की ही ओर बढ़ती है रात!

समूचे पीड़ित संसार ने कहा : सूरज तक को डूबना ही पड़ता है।

भारत ने कहा : अस्तारमेषि सूर्य:!

अर्थात् जो अस्त को उदय करे, वह सूर्य है!

आशा अर्थात् भारत।

प्रतिपल आशा। प्रत्येक के लिए आशा।

पराजित शासकों के इितहास से भी अपराजेय।

चूंकि जो शासकों-शासनों का मुंह न तके, वह भारतीय।

पौराणिक बंधन। रूढ़िवादी परम्पराएं। गहन अंधविश्वास। अकर्मण्य भाग्यवाद।

इतनी बेड़ियों में जकड़ा होकर भी निरन्तर आगे बढ़ता रहे।

‘मनुष्य है वही जो मनुष्य के लिए मरे’ कहता, परमार्थ करता रहे।

और, जिसकी प्रार्थना भी ऐसी हो कि -

‘कराग्रे वसते लक्ष्मी, करमध्ये सरस्वती,

करमूले तु गोविन्दं, प्रभाते कर दर्शनम्’

अर्थात् ‘हाथों’ को ही देख। कर्म ही कर। धन-ज्ञान-संसार सभी तुम्हारे हाथ में ही है। (अर्थात् ईश्वर अलग से कहीं नहीं है।)

धर्म, सत्य और न्याय- संसार इन्हीं तीन स्तंभों पर टिका है।

जहां करोड़ों सामान्य नागरिक मातृभूमि के लिए अपने प्राण दे चुके हों -

और कोई उन्हें जानता तक न हो, वो भारतीय। ये उनका राष्ट्रधर्म।

असत्य की अंतहीन सत्ता के मध्य भी जहां करोड़ों लोग केवल सत्य के साथ हों,

सत्यनिष्ठा से कार्यरत् हों, वो भारतीय।

और जिनकी नियति ही अन्याय सहने की हो, किन्तु न्यायोचित जीवन-यापन कर, अन्याय के विरुद्ध छोटे-छोटे स्तर पर संघर्षरत् हों, वो भारतीय।

‘माता-पिता का, गुरुजन का सम्मान करो’ ऐसा पहला पाठ पढ़ाए, वो भारत।

‘किसी का हृदय मत दुखाओ’ मां जहां यही प्रतिदिन दोहराए, वो भारत।

वर्णवाद, वंशवाद, जातिवाद के लिए कुख्यात व्यवस्था में पले।

किन्तु जिसका समूचा इतिहास, समस्त शास्त्र बताते हों

कि भरत जिस पर भारत का नाम पड़ा वंश छोड़, योग्यता पर गए।

सर्वाधिक पवित्र ग्रंथ - संविधान की रचना में सर्वोच्च ध्यान

‘समानता’ का ही रखा।

मुट्‌ठीभर स्वार्थी तत्वों के कारण फिर भी ‘असमानता’ है।

और उसके विरुद्ध संघर्ष भी जारी है।

प्रत्येक सामान्य नागरिक किन्तु सभी को समान मानता हो, वो भारत।

जहां कबीर का पंथ, जाति पता न हो। न जानने में किसी की रुिच हो।

जहां कांकर-पाथर जोड़कर... और पाहन पूजै हरि मिलै तो... विद्यालयों में पढ़ाया जाता हो।

जहां ‘साम्प्रदायिक सद्‌भाव’ को इतनी बार सुनाया जाए कि सद्‌भाव ही घटने लगे -

तो सामान्य नागरिक इस पाखंड से पूरी तरह बचने लगें, वो भारत।

जहां अमानुष, पापी, अपराधी, भ्रष्ट जितनी भी मानवीय बुराइयां हैं -

वो हों - किन्तु नागरिकों का विश्वास कभी न टूटे।

जैसा अपने अंतिम भाषण ‘क्राइसिस ऑफ सिविलाइज़ेशन’ में गुरुदेव ने कहा था :

‘जब मैं अपने चारों ओर देखता हूं तो एक गौरवशाली सभ्यता के भग्नावशेष, निरर्थकता के ढेर से बिखरे पाता हूं। किन्तु फिर भी मनुष्य पर विश्वास खो देने को भयंकर पाप मानूंगा।

प्रत्येक मनुष्य को, उसकी असहमति के साथ ससम्मान स्वीकार कर, अंतहीन संघर्ष पथ पर पूर्ण आनन्द के साथ जो बढ़ता चला जाए - वही भारत। वही भारतीय।

एक सच्चे अर्थों में पूर्ण विश्व नागरिक।

प्रेम और पराक्रम का अनूठा संगम।

हमें जो राजनीतिज्ञ, समाज विज्ञानी, इतिहासकार और ना-ना प्रकार के विद्वान ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ के नित नए रूप बताते रहते हैं - वे भी अच्छे ही हैं। किन्तु या तो भारी आदर्शवादी लगते हैं या कृत्रिम। शुष्क लगते हंै या किताबी। वे हमें हमारे ही राष्ट्र का सच्चा स्वरूप बताएं, असंभव है। किन्तु बताना ही होगा।

क्योंकि, हम सामान्य नागरिकों की कोई तय विचारधारा नहीं है।

हमारे करोड़ों विचार हैं। परिवर्तित होते रहते हैं।

आज हम कोई एक बात अच्छी मानते हैं। तो कल कोई दूसरी बात।

देशकाल और वातावरण के अनुसार हमारे विचार बदलते हैं।

इस तरह हम सामान्य नागरिकों का ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ केवल शांति है।

सभी के लिए शांति। विश्वभर के लिए।

(लेखक दैनिक भास्कर के ग्रुप एिडटर हैं।)

प्रतिक्रिया- 9200012345 वाट्सएप करें।

कल्पेश याग्निक

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Web Title: अनुशासन, अभ्यास, अनुभूति और अनुभव आधारित अलख
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