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सांस्कृतिक शहर समस्याओं का समाधान खोज ही लेते हैं

देशभर की मेरी यात्राओं में मैंने देखा है कि गहरी सांस्कृतिक जड़ों वाले शहरों में कई नागरिक आंदोलन होते हैं, जो...

Dainik Bhaskar

May 09, 2018, 05:35 AM IST
सांस्कृतिक शहर समस्याओं का समाधान खोज ही लेते हैं
देशभर की मेरी यात्राओं में मैंने देखा है कि गहरी सांस्कृतिक जड़ों वाले शहरों में कई नागरिक आंदोलन होते हैं, जो जल्दी ही सकारात्मक अभियान में जुड़ जाते हैं। कई बार तो वे अधिकारियों को हाथों-हाथ शहर की सेवाएं और चौकसी सुधारने पर मजबूर कर देते हैं। महाराष्ट्र में पुणे निश्चित ही ऐसा शहर है, जो अपनी युगों पुरानी संस्कृति से जुड़ा होने के कारण लोगों के स्तर पर विभिन्न पहल करने में अग्रणी है। कुछ उदाहरणों से बात स्पष्ट होगी।

उदाहरण 1 : मार्च में महाराष्ट्र सरकार द्वारा प्लास्टिक के उपयोग पर पाबंदी लगाने के बाद पुणे की मेयर मुक्ता तिलक ने प्लास्टिक व ई-गार्बेज इकट्‌ठा करने की स्वैच्छिक मुहिम चलाने का निर्णय लिया, क्योंकि उनका मानना है कि नागरिकों की पहल से ही प्लास्टिक की भयावह समस्या पर लगाम लग सकती है। इस रविवार की सुबह निगम कमिश्नर सौरभ राव की मौजूदगी में स्वयं तिलक द्वारा शुरू की गई मुहिम शहर के सभी हिस्सों में दिन के 11 बजे तक चली। तीन घंटे के भीतर करीब 5,880 किलो प्लास्टिक, 1,758 किलो थर्मोकोल और 225.3 किलो ई-वेस्ट इकट्‌ठा हुआ। यह मुहिम कई हफ्तों तक चलेगी ताकि शहर को प्लास्टिक से मुक्त किया जा सके।

उदाहरण 2 : करीब छह माह पहले तक हर तरफ कचरा जलाने की आदत के कारण पुणे के उपनगर खराडी के ऊपर प्रदूषित हवा की गहरी काली पर्त मंडराती रहती थी। कई निवासी खासतौर पर बच्चे विषैले धुएं के कारण अस्थमा जैसी श्वसन संबंधी समस्याओं की शिकायत करते। फिर खराडी में कचरे की समस्या से निपटने के दौरान नागरिकों की चिंताएं साझा करने के लिए वॉट्सएप ग्रुप शुरू हुआ। पालिका ने अभी शिकायतों पर ध्यान नहीं दिया था। इसलिए आखिरकार उन्होंने मामला अपने हाथ में लेने का फैसला लिया।

वॉट्सएप ग्रुप ‘खराडी स्वच्छता’ की संस्थापक अनुराधा दुबे ने कचरे के अनियमित कलेक्शन के खिलाफ जागरूकता बढ़ाई और लोगों से भी कचरा न जलाने की गुजारिश की। जल्दी ही Change.org पर ऑनलाइन पिटीशन लॉन्च की गई, जिससे कई लोग इसकी ओर आकर्षित हुए। अधिक लोगों के शामिल होने से उन्होंने अपने स्वच्छता एप पर खुले स्थानों पर कचरे की डम्पिंग और कचरा जलाने के फोटो की बमबारी शुरू कर दी। आखिरकार अधिकारियों ने उनसे संवाद शुरू किया और कार्रवाई की। जब उसी एप पर फीडबैक और सराहना भी आई तो अधिकारियों को अच्छा लगा। आज क्षेत्र की कचरा प्रबंधन की समस्या लगभग पूरी तरह सुलझ चुकी है।

उदाहरण 3 : माहवारी हमारे देश में हमेशा ही निषिद्ध विषय रहा है, जिसके कारण हजारों महिलाओं को सैनेट्री नैपकिन जैसी बुनियादी सुविधा से वंचित रहना पड़ता है। ज्यादातर मामलों में यह जागरूकता से नहीं, लागत से जु़ड़ी समस्या है। पुणे के सिम्बायोसिस कॉलेज ऑफ लिबरल आर्ट्स के 22 साल के दो छात्रों मानल बोले और लक्षित भायाना ने घरों में काम करने वाली महिलाओं की इस समस्या के बारे में क्राउड फंडिंग शुरू की और दोस्तों से संपर्क शुरू किया। अच्छा समर्थन मिलने पर उन्होंने अपने क्षेत्र की ऐसी सारी 400 महिलाओं को नैपकिन उपलब्ध कराना शुरू किया। अब चूंकि उनका कोर्स समाप्त हो रहा है तो दोनों ने इतना फंड इकट्‌ठा कर लिया है कि अगले तीन माह तक नैपकिन मुहैया कराए जा सकंे। इतना वक्त वे खुद के लिए ले रहे हैं ताकि अधिक किफायती नैपकिन का पता लगाया जा सके।

फंडा यह है कि  सांस्कृतिक जड़ें लोगों को जोड़ती हैं, जो सामूहिक शक्ति के बल पर समस्याओं का समाधान खोज लेते हैं।

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए टाइप करें FUNDA और SMS भेजें 9200001164 पर

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in

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