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संस्थान मिसाल देते हैं, चूहा दौड़ में नहीं उलझते

हर कोई चूहा दौड़ में दौड़ने के दबाव में है, वह भी किसी ओलिंपिक विजेता को हराने के लिए नहीं बल्कि बेचारे पड़ोसी को मात...

Danik Bhaskar | May 04, 2018, 05:40 AM IST
हर कोई चूहा दौड़ में दौड़ने के दबाव में है, वह भी किसी ओलिंपिक विजेता को हराने के लिए नहीं बल्कि बेचारे पड़ोसी को मात देने के लिए और ऐसे हम हमारी पूरी ज़िंदगी प्रेशर कुकर वाले माहौल में गुजार देते हैं! अब तो बच्चा पूरा वाक्य बोलना सीखे उसके पहले वह रीयलिटी शो में मेडल जीत लेता है। हमारे दिनों में स्कूल सिर्फ बच्चों को शिक्षा देने के लिए नहीं, बल्कि देश के लिए अच्छे नागरिक तैयार करने के लिए बनाए जाते थे पर वह भी बीती बात हो गई है। अब तो सारी बोर्ड परीक्षाओं में शत-प्रतिशत नतीजे देने का प्रचलन है फिर चाहे 8वीं के कम बुद्धिमान छात्रों को स्कूल से निकालना ही क्यों न पड़े। पेश है अच्छे संस्थानों के लिए ‘क्या करें’ और ‘क्या न करें’। अच्छे संस्थान क्या करते हैं : तमिलनाडु के करूर में कलेक्टर टी. अन्बाझगन के लिए कार चलाने का परमशिवम का आखिरी दिन था। वे 35 साल की सेवा के बाद रिटायर हो रहे थे। विदाई कार्यक्रम के बाद कलेक्टर ड्राइवर की सीट पर बैठ गए और वे परमशिवम और उनकी प|ी को घर तक छोड़ने गए। वहां उन्होंने पूरे परिवार के साथ कॉफी पी। ड्राइवर के प्रति आभार व्यक्त करने का कलेक्टर का यह तरीका था।

लेकिन, यह पहला मौका नहीं था। 30 दिसंबर, 2017 को बिहार के मुंगेर जिले के मजिस्ट्रेट उदयकुमार सिंह ने अपने ड्राइवर संपत राम के रिटायर होने पर उनकी 34 साल की सेवा देखते हुए विदाई समारोह आयोजित किया। समारोह होने के बाद संपत राम डीएम की कार की तरफ गए और आखिरी बार अपने बॉस को घर छोड़ने जाने का इंतजार करने लगे। लेकिन, उन्हें तब सुखद आश्चर्य हुआ जब उनके बॉस ने कहा, ‘आज मैं कार चलाऊंगा और आप मेरी जगह पर बैठिए।’ फिर उन्होंने संपत राम को उनके घर छोड़ा।

इसी प्रकार नवंबर 2016 में 35 वर्षों में महाराष्ट्र के अकोला जिले में 18 कलेक्टरों को सेवाएं देने वाले 58 वर्षीय दिगंबर ठाक रिटायर हुए और उनके बॉस तत्कालीन कलेक्टर जी. श्रीकांत ने उन्हें असाधारण व स्मरणीय तोहफा देने का निश्चय किया। दफ्तर में औपचारिक विदाई समारोह के पहले वे खुद कार चलाकर अपने शोफर को दफ्तर लेकर आए। उस सुबह जब विवाह समारोह जैसी सजी कार ठीक के घर पर आई तो लोग इकट्‌ठे हो गए। लोगों को यह देख आश्चर्य हु्आ कि कार के पिछले हिस्से में जो सवार हो रहा था वह शोफर की कड़कती सफेद वर्दी में था और उनके लिए दरवाजा खोलने वाले थे उनके बॉस।

अच्छे संस्थान क्या नहीं करते : अहमदाबाद के जिला शिक्षा अधिकारी नवनीत मेहता के सामने इस हफ्ते अनूठी समस्या आई। उनके सामने स्थानीय स्कूल की 8वीं कक्षा के 22 छात्रों के अभिभावक खड़े थे और बता रहे थे कि उनके बच्चों को ‘कमजोर शैक्षणिक प्रदर्शन’ के कारण स्कूल छोड़ने का प्रमाण-पत्र थमा दिया गया था यानी उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया था। स्कूल की प्रतिष्ठा थी कि पिछले साल से उसने सभी बोर्ड परीक्षाओं में शत-प्रतिशत रिजल्ट दिया था। स्कूल प्रबंधन की ओर से आरोप-प्रत्यारोप के बाद डीईओ ने उन्हें फिर प्रवेश दिलाने का आश्वासन दिया। लेकिन, स्कूल ने शैक्षणिक रूप से कमजोर बच्चों के लिए अपनी प्रतिष्ठा ध्वस्त करने पर कोई ध्यान नहीं दिया। जिसका हमारे समाज के भविष्य पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ेगा। कौन जानता है कि इन 22 छात्रों में से कोई सेना या पुलिस में रहकर हमें और हमारे देश की रक्षा कर रहा होता। इस कोमल आयु में उनकी क्षमताओं को खारिज कर देना उलटा परिणाम देने वाला होगा।

फंडा यह है कि  महान राष्ट्र निर्मित करने के लिए संस्थानों को चूहा दौड़ में शामिल होने के बजाय अच्छे नागरिक बनाने में मदद करनी चाहिए।

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए टाइप करें FUNDA और SMS भेजें 9200001164 पर

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in