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अच्छे काम कहीं भी हों, उनकी अनदेखी नहीं होती

वर्ष 2014 के पहले बरसों तक जापान के होक्काइडो द्वीप के क्यू-शिराटकी ट्रेन स्टेशन पर सिर्फ एक यात्री नियमित रूप से...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 10, 2018, 05:40 AM IST

अच्छे काम कहीं भी हों, उनकी अनदेखी नहीं होती
वर्ष 2014 के पहले बरसों तक जापान के होक्काइडो द्वीप के क्यू-शिराटकी ट्रेन स्टेशन पर सिर्फ एक यात्री नियमित रूप से इंतजार करता था- हाई स्कूल की एक लड़की। यह ट्रेन सिर्फ दो जगह पर दिन में दो बार रुकती थी। सुबह लड़की को लेने और छोड़ने के लिए और शाम को उसी क्रिया को दोहराती। क्यू-शिराटकी स्टेशन और इसके आसपास सवारियों की संख्या बहुत गिर गई थी, क्योंकि ये स्थान बहुत दूर स्थित थे और बहुत पहले ही माल ढुलाई की सेवा भी बंद कर दी गई थी। चूंकि छात्र आने-जाने के लिए ट्रेन पर निर्भर थे तो पालकों ने कंपनी से कहा कि वह बच्चों के लिए यह स्टेशन खुला रखे। जापान रेलवे ने ट्रेन का संचालन मार्च 2014 तक जारी रखा, जब तक कि आखिरी लड़की वहां से ग्रेजुएट नहीं हो गई।

यह कहानी प्रसारित करने वाले टीवी चैनल के फेसबुक पेज पर एक जापानी नागरिक ने लिखा, ‘मैं ऐसे देश के लिए अपनी जान क्यों नहीं देना चाहूंगा, जो सिर्फ मेरे लिए अतिरिक्त कदम उठाने को तैयार है। सुशासन का जमीनी स्तर पर पहुंचने का यही अर्थ है। हर नागरिक का महत्व है। कोई बच्चा भी पीछे नहीं रहेगा।’

यहां भारत में महाराष्ट्र के पुणे से 100 किलोमीटर से अधिक दूरी पर चांदर गांव में सिर्फ एक छात्र को पढ़ाने 29 वर्षीय शिक्षक रजनीकांत मेंधे हर दिन एक-तरफ की यात्रा में कीचड़भरे रास्ते पर 12 किलोमीटर का फासला तय करते हैं! हां, आपने ठीक पढ़ा, सिर्फ एक छात्र। और जिस कीचड़ भरे रास्ते से वे जाते हैं उसके दोनों तरफ 400 फीट का उतार है। वे सरकार द्वारा नियुक्त साधारण शिक्षक हैं लेकिन, वे किसी सैनिक की तरह एक छात्र को पढ़ाने की जिम्मेदारी निभाते हैं। वे उसे पूरी शिद्दत से निभाते हैं। कई बार आठ साल का छात्र युवराज सांगले छिप जाता है, क्योंकि कक्षा में वह अकेला छात्र है। मेंधे अपना उत्साह बरकरार रखते हुए बच्चे का ध्यान पढ़ाई पर लगे इसके लिए सबकुछ करते हैं। 11 बच्चों वाले स्कूल में पिछले दो वर्षों से सिर्फ एक बच्चा है, क्योंकि कई पालकों ने बच्चों को गुजरात के निकट के शहरों में पैसा कमाने भेज दिया है। इस गांव में 15 झोपड़ियां और 60 रहवासी हैं, जिनके पास बिजली सहित वास्तव में कुछ भी नहीं है, जिससे वे कुछ कमाई कर सकें। इसलिए अधिकांश लोग दूसरी जगहों पर चले गए हैं। उनकी गलियों में सौर ऊर्जा से चलने वाले तीन लैम्प बरसों पहले बंद हो गए। अब उनके पास (सौर ऊर्जा से उत्पन्न) इतनी बिजली है कि जिससे हर घर में एक बल्ब जलाया जा सके और फोन चार्ज किया जा सके।

जैसे जापानियों ने जापान रेलवे की सराहना करते हुए अपने देश के लिए कुछ भी करने की तैयारी दिखाई थी, समर्पण के इस मामले में भी महाराष्ट्र राज्य बिजली वितरण कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर ने पुणे ऑफिस को निर्देश दिए हैं कि वह घने जंगलों में बसे चांदर गांव के घरों में बिजली पहुंचाए। इस जगह तक पहुंचने के रास्ते के अंतिम 15 मील का हिस्सा तो दरकती मिट्‌टी का बना है, जिस पर से भारी सामान लदा कोई वाहन नहीं जा सकता। फिर भी बिजली विभाग ने वहां काम शुरू कर दिया है। बिजली कंपनी के चेअरमैन संजीव कुमार ने कहा, ‘यह काम शिक्षा के प्रति मेंधे की अटल निष्ठा के सम्मान में किया जा रहा है।’ ट्रान्सफॉर्मर सहित 65 खम्भे और तार लगाए जाने के बाद 2 मई को स्कूल और चांदर व पास के दो अन्य गांवों में बिजली पहुंच गई। इस खुशी के अवसर पर जश्न मनाने हेतु गांव वालों के पास बांटने के लिए केवल चीनी थी।

फंडा यह है कि  सुदूरवर्ती क्षेत्र में किए अच्छे काम भी अनदेखे नहीं रहते। अच्छाई और अधिक अच्छाई को आकर्षित करती है।

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए टाइप करें FUNDA और SMS भेजें 9200001164 पर

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in

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