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साहसी और जरूरतमंद मदद के हकदार होते हैं

स्टोरी 1 : रूस में विश्वकप फुटबॉल 2018 बस शुरू ही होने वाला है। कुछ घंटों बाद हम लगातार फुटबॉल की दावत का लुत्फ उठा रहे...

Dainik Bhaskar

Jun 14, 2018, 05:45 AM IST
साहसी और जरूरतमंद मदद के हकदार होते हैं
स्टोरी 1 : रूस में विश्वकप फुटबॉल 2018 बस शुरू ही होने वाला है। कुछ घंटों बाद हम लगातार फुटबॉल की दावत का लुत्फ उठा रहे होंगे। जहां आप और मेरे जैसे फुटबॉलप्रेमी अपने बड़े से टीवी स्क्रीन के सामने डट जाएंगे, चार लड़कियों व दो लड़कों सहित छह बच्चे वर्ल्ड कप लाइव देखने के लिए रूस जा रहे होंगे! इन छह में से पांच मुंबई की झुग्गियों में रहने वाले और झारखंड के सबसे पिछड़े गांव से हैं। ताज्जुब हुआ होगा न कि अनजान-सी झुग्गी बस्ती में रहने वाले और पुरुषों के खेल के लिए ज्यादा लड़कियां क्यों जा रही हैं? क्योंकि ये बच्चे साहसी हैं और लहरों के विरुद्ध तैरते हैं।

लालू राठौड़, अक्षय चौहान, पूनम गौतम, शीतल तोप्पो, सोनी कुमारी और श्रद्धा अहेर ऑस्कर (आर्गनाइजेशन फॉर सोशल चेंज, अवेयरनेस एंड रिस्पॉन्सिबिलिटी) की बदौलत मास्को में विश्वकप का अपना सपना साकार करेंगे। ऑस्कर मुंबई स्थित स्वयंसेवी संस्था है।

शीतल (18) और सोनी (19) झारखंड की राजधानी रांची के निकट गुमनाम से गांव चारी हुजर की हैं और अपने रूढ़िवादी गांव में फुटबॉल खेलने के लिए उन्होंने दमन और तानाकशी का बहादुरी से सामना किया है। ये लड़कियां गरीब घरों से हैं और ऐसी जगह रहती हैं, जहां जल्दी विवाह या देहव्यापार जैसी सामाजिक बुराइयों का शिकार होना बहुत आसान है। उनके लिए शिक्षा और फुटबॉल का मतलब है सशक्तीकरण और आत्मविश्वास। 2014 में जब उन्होंने ऑस्कर फाउंडेशन ज्वॉइन किया और गांव के मैदान पर फुटबॉल खेला तो उन्हें बहुत आलोचना झेलनी पड़ी। सोनी रांची के राम रखन सिंह यादव कॉलेज में राजनीति विज्ञान की दूसरे वर्ष की छात्रा है।

अक्षय चौहान मुंबई स्थित कोलाबा के समीप की आंबेडकर झुग्गी बस्ती का है और बचपन में उसे सिर में गंभीर चोट आई थी। दुर्भाग्य से ऑपरेशन योजना के मुताबिक नहीं हुआ। वह बच तो गया पर पीछे कूबड़ उभर आया। ऑस्कर ने उसे अपनी शरण में ले लिया और धीरे-धीरे पिछले सात वर्षों में वह अन्य बच्चों के लिए कोच बन गया। साथ में उसने मुंबई के सबसे प्रतिष्ठित ज़ेवियर्स कॉलेज से बीकॉम की पढ़ाई भी जारी रखी। लालू और पूनम भी उसी झुग्गी बस्ती के हैं, जहां का अक्षय है लेकिन, तीनों फुटबॉल को अपनी शिक्षा पूरी करने के लिए एंगेजमेंट का साधन मानते हैं। श्रद्धा ऑस्कर की युवा लीडर हैं और उनका पूरा वक्त झुग्गी के बच्चों को खेलों में व्यस्त रखने में जाता है ताकि वे जीवन की अवांछित चीजों में भटक न जाएं।

स्टोरी 2 : फुटबॉल की इस गहमागहमी से दूर 45 डिग्री तापमान में, वह भी सुबह 11:30 से 3:30 के बीच जब सूरज अपने चरम पर होता है अहमदाबाद के प्रह्लाद नगर के निकट दिलीप ठक्कर के गोपी रेस्तरां के कुछ वर्दीधारी लोग जरूरतमंदों को मुफ्त में ‘ठंडी मसाला छाछ’ वितरित करते हुए देखे जा सकते हैं। यह सिलसिला 1 मई को शुरू हुआ था और तब तक जारी रहेगा, जब तक कि इंद्र देवता गुजरात पर मेहरबानी नहीं दिखाते। उस कतार में खड़े रहकर छाछ लेने वालों में ट्रैफिक कॉन्स्टेबल, एटीएम गार्ड, पास की हाउसिंग सोसायटियों में काम करने वाले कामगार और डिलिवरी बॉय भी शामिल हैं, जो अस्थायी शामियाने के नीचे कुछ देर ठहरकर 300 मिलीलीटर छाछ से अपनी प्यास बुझाते हैं। जब से हीट-वेव शुरू हुई है तब से हर दिन 5000 गिलास छाछ बांटी जा रही है, उन लोगों के लिए जो अपने दैनिक कामों के लिए गर्मी का सामना कर रहे होते हैं।

फंडा यह है कि  किसी को कुछ देना चाहते हैं तो साहसी और जरूरतमंदों को दीजिए और उनमें अमीर-गरीब का फर्क मत कीजिए।

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए टाइप करें FUNDA और SMS भेजें 9200001164 पर

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in

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