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रक्षा क्षेत्र में मोदी सरकार का बड़ा कदम

मोदी सरकार द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के मातहत विस्तृत दायरे वाली रक्षा नियोजन समिति (डीपीसी) की स्थापना...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 17, 2018, 05:50 AM IST

रक्षा क्षेत्र में मोदी सरकार का बड़ा कदम
मोदी सरकार द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के मातहत विस्तृत दायरे वाली रक्षा नियोजन समिति (डीपीसी) की स्थापना का फैसला लेने के साथ ही आखिरकार भारत के रक्षा नियोजन में महत्वपूर्ण बदलाव आता दिखाई दे रहा है। चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी के चेयरमैन, तीनों सेना प्रमुख, रक्षा, खर्च और विदेश सचिवों की सदस्यता वाली इस समिति के गठन का उद्देश्य है दीर्घावधि रणनीति बनाने की भारत की क्षमता को बढ़ाना। इसे राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति, अंतरराष्ट्रीय रक्षा संबंधों पर रणनीति, रक्षा विनिर्माण का तंत्र स्थापित करने की रूपरेखा, रक्षा निर्यात बढ़ाने की रणनीति और प्राथमिकता वाले क्षेत्रो में क्षमता के विकास पर रिपोर्ट तैयार करने को कहा है।

डीपीसी के तहत चार उप समितियां निर्मित की जाएगी ताकि नीती और रणनीति, योजना व क्षमता विकास, रक्षा कूटनीति और रक्षा विनिर्माण के लिए वातावरण बनाने पर ध्यान केंद्रित किया जा सके। यह निर्णय ऐसे समय आया है जब भारतीय रक्षा नियोजन दिशाहीन-सा हो गया है। हर विभाग में जानकारी को अपने तक ही सीमित रखने से एकीकृत दृष्टि का अभाव पैदा हो गया है और कई बार तीनों सेनाओं के साथ-साथ नागरिक व रक्षा एजेंसियां प्राय: एक-दूसरे के विपरीत उद्देश्यों के लिए काम करती दिखाई देती हैं। ऐसे अस्थायी रवैए से प्राय: यह होता है कि खतरे का आकलन और सशस्त्र बलों की संचरना केंद्रीकृत व्यापक दृष्टि से संचालित नहीं हो पाती। इसकी बजाय हर एजेंसी अपने स्तर पर अपने एजेंडे से काम करती है। तालमेल का यह अभाव हाल ही में तब रेखांकित हुआ था, जब एकतरफ तो सेनाध्यक्ष दो मोर्चों पर यु्द्ध लड़ने की क्षमता की बात कर रहे थे और दूसरी तरफ उपसेनाध्यक्ष संसद की रक्षा मामलों संबंधी स्थायी समिति के सामने कह रहे थे कि सशस्त्र बलों को बजट में आवंटित धन से पहले से की गई आपात खरीदी का भुगतान ही मुश्किल से हो पाएगा। फिर रक्षा आधुनिकीकरण की योजना को आगे बढ़ाने की बात ही क्या।

भारतीय रक्षा नीति पर सुर्खियां प्राय: जमीनी हकीकत से पूरी तरह अलग होती हैं। प्राय: भारत के 250 अरब डॉलर के सैन्य आधुनिकीकरण कार्यक्रम की बात होती है। लेकिन, जहां नई दिल्ली महत्वपूर्ण शस्त्र प्रणालियां हासिल करने पर जोर देती है वहीं दीर्घावधि रणनीति में इन संसाधनों का दोहन करने की इसकी क्षमता पर हमेशा ही संदेह बना रहता है। भारत में ऐसी ‘ग्रैंड स्ट्रेटेजी’ का अभाव रहा है, जो भारतीय शक्ति की अभिव्यक्ति के लिए राजनीतिक लक्ष्य सामने रखे और उसके बाद सैन्य, आर्थिक, खुफिया और शैक्षिक विकास सुनिश्चित करे और उन्हें इन लक्ष्यों की दिशा में आगे बढ़ाया जाए। भारतीय रणनीतिक हलकों में यह अभाव बहस का स्थायी विषय रहा है। भारत का रक्षा सुधार अभियान उतने ही समय से रहा है, जितने समय से मौजूदा व्यवस्था अस्तित्व में है। इस मुहिम का फोकस पूरी रक्षा नीति के निर्माण और संसाधनों के एकीकरण व उनके बीच तालमेल स्थापित करने पर है। इसमें ऐसे बुनियादी ढांचे की सिफारिश की गई है, जो राजनीतिक फैसलों को लागू कर सकें और इन फैसलों को हासिल करने के लिए राज्य के संसाधन एकजुट कर सके।

यह सब अभी भारत में नदारद है। एक बड़ी रणनीति और भारत की रक्षा नियति के बीच संबंध को समझने से संसाधनों के मुताबिक राजनीतिक फैसलों को बेहतर ढंग से अंजाम दिया जा सकेगा। भारतीय रक्षा ढांचे और प्रक्रियाओं का विकास गवाही देता है कि व्यक्तिगत नेटवर्क और प्रधानमंत्री की प्राथमिकताओं का इस पर कितना असर रहा है। इसी तरह यदि प्रधानमंत्री कमजोर हो या उसके एजेंडे पर अधिक ज्वलंत मुद्दे हों तो नीति निर्माण में उसी स्तर का ठहराव भी पैदा हो जाता है। बिल्कुल शुरुआत से ही रक्षा सुधार का लक्ष्य पर्याप्त रूप से एकीकृत और समन्वित राजकीय ढांचा रहा है, जो अमल में लाई जा सकने वाली रक्षा नीति के लिए जरूरी है। लेकिन, इस दिशा में ज्यादा सफलता हासिल नहीं की जा सकी है। अपने सीमित रक्षा संसाधन और राजनीतिक लक्ष्यों को इसके अनुरूप बनाने के लिए इस प्रणाली में सुधार भारत की मूल आवश्यकता बनी हुई है।

प्रभावी रक्षा नियोजन और बलों की रचना संस्थागत ढांचे का काम है। इससे राजनीतिक लक्ष्यों को स्पष्ट रूप से आकार देने, संसाधनों को प्रभावी ढंग से गतिशील करने और राजकीय शक्ति की प्रणालियां विकसित करने में इन संसाधनों के प्रभावी उपयोग में मदद मिलती है। डीपीसी के बनने के साथ ऐसा लगता है कि नई दिल्ली ने अंतत: यह पहचान लिया है कि रक्षा क्षेत्र में नए संस्थागत ढांचे की जरूरत है। उम्मीद है कि इससे भारत के रक्षा नियोजन को विहंगम दृष्टि वाला विज़न मिलेगा। एक ऐसे समय में जब अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी युद्ध प्रणालियों में क्रांति ला रही है, भारत में अब भी सशस्त्रों बलों में सैनिकों की संख्या में कमी लाकर उसे कारगर बनाने की जरूरत पर बहस की जा रही है। भारत को तत्काल इसे अंजाम देने की जरूरत है, क्योंकि सालाना रक्षा बजट का आधे से ज्यादा वेतन और पेंशन जरूरतों पर खर्च होता है, जो ठीक नहीं है।’

‘मेक इन इंडिया’ पहल की प्राथमिकताओं और रक्षा खरीद की बोझिल प्रक्रिया का भी आपस में तालमेल बिठाना होगा। दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश होने का भारत का दर्जा, रक्षा निर्माता हब बनने की इसकी महत्वाकांक्षा के साथ न्याय नहीं करता। इसी तरह सेना मुख्यालयों के बीच और रक्षा मंत्रालय व सेनाओं के बीच एकीकरण को लेकर भी बहस जारी है। इसका कोई निष्कर्ष निकलना चाहिए। रक्षा नियोजन में मुख्य चुनौती तो अब भी अनिश्चितता की है। प्रभावी रक्षा नियोजन में भावी रणनीति और जमीनी जरूरत के मुताबिक ढलने को महत्व दिया जाता है। भारतीय संदर्भ में मानसिकता, ढांचा और प्रक्रियाओं में आमूल बदलाव की जरूरत है। तेजी से बदलता सुरक्षा वातावरण और संसाधनों की कमी का लगभग स्थायी दबाव रणनीतिक रक्षा नियोजन की जरूरत रेखांकित करता है। मोदी सरकार ने पहला कदम उठा लिया है। आदर्श रूप में तो यह कदम सरकार के पहले साल में ही उठा लिया जाना चाहिए था ताकि अब तक तो नियोजन की प्रक्रियाएं तय होने का वक्त मिल जाता। जो भी हो, अब पहल हो गई है और यह प्रक्रिया अपने तर्कसंगत अंजाम तक पहुंचनी चाहिए। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

हर्ष वी. पंत

प्रोफेसर, इंटरनेशनल रिलेशन्स किंग्स कॉलेज, लंदन

harsh.pant@kcl.ac.uk

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