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राजनीति और सत्ता ही सबकुछ है, मान लीजिए

प्रधानमंत्री नहीं प्रधान सेवक के तौर पर जो जिम्मेदारी मोदी ने बीते चार बरस में ली है उसकी यह सिर्फ बानगी भर है कि...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 23, 2018, 05:50 AM IST

राजनीति और सत्ता ही सबकुछ है, मान लीजिए
प्रधानमंत्री नहीं प्रधान सेवक के तौर पर जो जिम्मेदारी मोदी ने बीते चार बरस में ली है उसकी यह सिर्फ बानगी भर है कि बीते 1,448 दिनों में 104 योजनाओं का एेलान प्रधानमंत्री ने किया। यानी हर चौथे दिन एक एेलान। ये भी एक बानगी है कि हर 10वें दिन प्रधानमंत्री चुनाव प्रचार करते हुए नज़र आए। करीब सवा सौ रैलियां बीते चार बरस में राज्यों के चुनाव में कीं। ये भी बानगी है कि हर 27वें दिन प्रधानमंत्री किसी देश की यात्रा पर निकल गए हों। क्योंकि 54 देशों की यात्रा करते हुए जब पीएम ने डेढ़ सौ से ज्यादा दिन विदेशों में बिताए तो फिर यह भी बानगी है कि हर दस दिनों में से एक दिन प्रधानमंत्री विदेश में रहे।

फिर इसी दौर में पहली बार चुनावी फंडिंग को लेकर एक ऐसी मुहर लगा दी, जिसमें दुनिया के किसी भी हिस्से से कितनी भी रकम चाहे वह ब्लैक मनी की क्यों न हो, पार्टी फंड में जमा हो सकती है और कोई पूछेगा नहीं। कोई बताएगा नहीं। और बीते चार बरस की बानगी यह भी है कि चुनाव प्रचार से लेकर चुनाव जीतना और विदेश मंत्रालय से लेकर इकोनॉमी को भी पटरी पर लाने के उपाय पीएम ही करते नज़र आए। ये उपाय नोटबंदी भी हो सकते हैं और रिजर्व बैंक का फेल होना भी हो सकता है। फिर शिक्षा हो या हैल्थ सर्विस या फिर किसानों की आय बढ़ाना हो, भार पीएम पर ही है। आतंकवाद से भी दो-दो हाथ और एक साथ पाकिस्तान, चीन को संभालने का भी भार है। संघीय ढांचे को बनाए रखने से लेकर हर मुद्‌दे के केंद्र में पीएम ही हैं।

विपक्ष को खारिज करते हुए सोशल इंजीनियरिंग और संघ को साधते हुए हिन्दुत्व का परचम भी मोदी सरकार की नीतियों तले ही बीते चार बरस में पीएम ही लेकर आए। यानी बीते चार बरस के दौर में एक ऐसी तस्वीर प्रधानमंत्री की उभरी है, जिसमें बतौर प्रधानसेवक मोदी ‘लार्जर दैन लाइफ’ हो चुके हैं। और तमाम हालातों के केन्द्र में खड़े होकर जिस भार को पीएम उठाए हुए हैं उसकी एक झलक सुप्रीम कोर्ट से समझी जा सकती है, जहां न्यायाधीश की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट बंटा हुआ-सा लगता है।

एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर राजनीतिक मजबूरी अध्यादेश लाने की दिशा में ले जाती है और कावेरी मुद्‌दे पर सरकार यह जवाब देने से नहीं चूकती है कि पीएम पहले विदेश यात्रा पर थे, फिर कर्नाटर चुनाव प्रचार में चले गए। तो फैसला लिया नहीं जा सका। क्या पीएम वाकई बीजेपी की सत्ता 2019 के बाद भी बरकरार रखने में इतने मसरूफ हो चुके हैं कि देश के भीतर तमाम नए-नए मुद्‌दे फन काढ़ रहे हैं और उलझन बढ़ती जा रही है। सारे समाधान चुनावी जीत के बनाए जा रहे रास्तों पर जा टिके हैं। एक्ट को लेकर दलितों में आक्रोश है। सुप्रीम कोर्ट की साख को लेकर बौद्धिक तबके में गुस्सा है। सेंट्ल यूनिवर्सिटी में बेवजह के मुद्‌दों से छात्र परेशान हैं। किसान तक योजनाओं का लाभ नहीं तो किसान आंदोलन खड़े होने लगे हैं। बावजूद इसके अगर चुनाव ही सबकुछ है तो फिर यकीन जानिये कर्नाटक चुनाव में बीजेपी की हार सरकार के लिए सावधान होने का संकेत है। देश को किस रास्ते जाना है, इसका कोई विज़न विपक्ष भी नहीं दे रहा है। हां मोदी फेल हो रहे हैं तो 2014 में मनमोहन फेल हो चुके थे। तो क्या राजनीतिक दलों के सत्ता में बने रहने या सत्ता पाने के खेल को ही नेशनल पॉलिसी मान लिया गया है। ये खेल पहले इतना पारदर्शी नहीं था, जितना अब हो गया है। यानी मोदी ने लोकतंत्र में चुनाव के उस बॉटल-नेक को ही हटा दिया है, जहां नैतिकता बचाकर चुनाव लड़े जाते थे।

बीते चार बरस के दौर ने देश के उन मुद्‌दों को भी सतह पर ला दिया है, जो इससे पहले चुनावी लोकतंत्र में छुप जाते थे। अब खुले तौर पर देश के मुद्‌दे गौण हैं। चुनावी जीत-हार सबसे बड़ा मुद्‌दा है, दरअसल, देश में हर चुनाव अगले चुनाव की जमीन तैयार कर रहा है। यानी कोई नीति विकास की अगली सड़क तैयार नहीं करती। मसलन स्मार्ट सिटी योजना के लिए अब तक 9,943 करोड़ रुपए दिए जा चुके हैं। लेकिन इसमें से सिर्फ 182 करोड़ ही खर्च हुए हैं। यानी कुल रकम का 1.83 फीसदी ही खर्च हुआ और 98 फीसदी पैसा पड़ा हुआ है। रोजगार के नाम पर मृदा योजना में 91 फीसदी को औसतन सिर्फ 23 हजार रुपए दिए गए। तो 23 हजार रुपए में जब पकौड़े का ठेला या पान की गुमटी भी लग नहीं सकते हैं तो फिर रोजगार किसे, कैसे मिल रहा है, यह बताने वाला कोई नहीं। मनरेगा में सौ दिन का काम 10 फीसदी को भी नहीं मिल रहा है। ये हालात तब हैं जब देश में 25 करोड़ मनरेगा मजदूरों में से सिर्फ 12 करोड़ मजदूरों को ही मनरेगा का कार्ड मिला और एक करोड़ मजदूरों को भी काम देने की स्थिति में देश नहीं है।

मसला यह नहीं है कि हर योजना बताई-गिनाई जाए और कह दिया जाए कि कुछ भी नहीं हुआ। सवाल है कि देश चलाने के तौर-तरीके इतनी तेजी से बदले और इतनी तेजी से राजनीतिक सत्ता ही सबकुछ हो गई कि संवैधानिक संसाधनों का ढहना भर महत्वपूर्ण नहीं रहा, बल्कि भारत को कैसा बनना है, नागरिकों की जरूरतों के अनुरूप दुनिया के सामने भारत को कैसे खड़ा होना है, उसे बिना छिपाए अब राजनीति को ही आखिरी मंत्र कैसे बना दिया गया, ये सबसे युवा भारत की उस युवा तस्वीर से समझा जा सकता है, जहां हर घंटे एक छात्र खुदकुशी कर रहा है तो हर दिन दस छात्र राजनीतिक दल से जुड़ रहे हैं, क्योंकि देश में राजनीतिक दल और उसकी सत्ता ही देश है। घोषित योजनाओं की एक बानगी : सांसद आदर्श ग्राम योजना, प्रधानमंत्री मुद्रा योजना, प्रधानमंत्री जन धन योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, प्रधानमंत्री सुकन्या समृद्धि योजना, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजन, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, अटल पेंशन योजना, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना,प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना, प्रधानमंत्री जन औषधि योजना, प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना, मेक इन इंडिया, स्वच्छ भारत अभियान, किसान विकास पत्र, सॉइल हैल्थ कार्ड स्कीम, डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना, मिशन इन्द्रधनुष, दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना, दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्या योजना (अमृत योजना) आदि। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

2019



पुण्य प्रसून वाजपेयी

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