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सैन्य इतिहास के तथ्यों के साथ घालमेल क्यों?

प्रधानमंत्री और उनके सहायकों ने सैन्य इतिहास के तथ्यों में घालमेल कर दिया है। यदि वे विकीपीडिया ही देखते तो पता चल...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 08, 2018, 05:55 AM IST

सैन्य इतिहास के तथ्यों के साथ घालमेल क्यों?
प्रधानमंत्री और उनके सहायकों ने सैन्य इतिहास के तथ्यों में घालमेल कर दिया है। यदि वे विकीपीडिया ही देखते तो पता चल जाता कि जनरल केएम करिअप्पा (थिमय्या नहीं) 15 जनवरी, 1949 को देश के पहले सेनाध्यक्ष बने थे, इसीलिए इस दिन सेना दिवस मनाया जाता है। करिअप्पा तब सिर्फ 50 साल के थे। कश्मीर मुहिम के लिए भारत ने तब लेफ्टिनेंट जनरल रहे करिअप्पा को दिल्ली व पूर्वी पंजाब का कमांडर चुना।

भ्रम इसलिए होता है कि करिअप्पा ने सहयोगी ‘कूर्ग’ मेजर जनरल केएस थिमय्या को चुना। संयोग की बात कि दोनों के नाम में लगा ‘के’ दोनों के वंश कोदंदेरा का प्रतीक था। करिअप्पा ने थिमय्या को कश्मीर डिवीजन (जो बाद में 19वीं कमान बनी) की कमान सौंपी। शुरुआती महीनों में इसी ने महत्वपू्र्ण लड़ाइयां लड़ीं। दोनों कश्मीर मुहिम के हीरो बने, जिसके वे हकदार थे और सेनाध्यक्ष भी बने। करिअप्पा (जिनके रक्षा मंत्री मिलनसार सरदार बलदेव सिंह थे) के विपरीत थिमय्या की अपने रक्षा मंत्री वीके कृष्ण मेनन से झड़प होती रहती थी। मंत्री महोदय का लगातार दखल थिमय्या के बर्दाश्त के बाहर था। उन दिनों को बेहतरीन ढंग से दर्ज करने वाले दिवंगत इंदर मल्होत्रा ने मजेदार वाकया याद किया था। मेनन से सामना टालने के लिए थिमय्या छुट्‌टी लेना चाहते थे। सहयोगी ने पूछा कारण क्या बताऊं। थिमय्या ने कहा, ‘इतना ही कहो मुझे मेननजाइटिस हो गया है।’ थिमय्या ने 1959 में इस्तीफा दे दिया पर नेहरू ने उन्हें 1961 तक कार्यकाल पूरा करने के लिए मना लिया।

यह सब और कूर्ग संयोग किसी भी आम आदमी को भ्रमित कर सकता है लेकिन, प्रधानमंत्री व उनका कार्यालय कैसे गलती कर सकता है? इसका एक संभावित कारण हो सकता है। स्वतंत्रता के शुरुआती 25 साल हमें युद्ध झेलने पड़े। 1971 को छोड़ किसी बड़े युद्ध में भारत को स्पष्ट जीत नहीं मिली। राजनीतिक वर्ग ने इन दशकों में लगातार ऐसा विश्वास निर्मित किया कि तब नेताओं ने सेना को नीचा न दिखाया होता तो वह काफी अच्छा काम कर सकती थी। लोकतांत्रिक संस्थाएं अभी विकसित हो रही थीं और सेनाएं सत्ता पर कब्जा कर रही थीं खासतौर पर हमारे ही पड़ोस में। नेहरू के नेतृत्व वाले राजनीतिक वर्ग के सामने कई चिंताएं थीं। नागरिक-राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने की चुनौती थी। इसलिए इन वर्षों में एक राजनीतिक-सैन्य कथानक का सिद्धांत गढ़ा गया। यह कि सेनाएं और उनके कमांडर कोई गलती नहीं कर सकते। सारा दोष राजनेताअंों को लेना पड़ा। बेशक सफलता में हिस्सेदारी हो जाती थी जैसा इंदिरा गांधी ने 1971 के बाद किया।

1999 का करगिल युद्ध वाजपेयी सरकार से ज्यादा सैन्य नेतृत्व की नाकामी थी। इतनी बड़ी सीमा के इतने अंदर पाकिस्तानी कैसे घुस आए? फिर सुविधाजनक (लेकिन अावश्यक) कथा गढ़ी गई। नागरिक खुफिया एजेंसी को दोष दिया गया। सेना में बहुत कम लोग जिम्मेदार ठहराए गए। क्योंकि सेनाओं को किसी आलोचना से दूर रखना महत्वपूर्ण था और है। सैन्य बलों में संस्थागत निरंतरता होती है, इसलिए व्यक्तिगत लीडरों को दोषी ठहराने पर पूरे संस्थान की प्रतिष्ठा भंग होगी। राजनेता तो आते-जाते हैं, आमतौर पर प्रतिद्वंद्वी उनकी आलोचना करते हैं, उनकी जगह लेते हैं।

संभवत: उन दशकों का सर्वाधिक विश्वसनीय ब्योरा हाल ही प्रकाशित येल के प्रोफेसर स्टीवन विल्किंसन की ‘आर्मी एंड द नेशन: दर मिलिट्री एंड इंडियन डेमोक्रेसी सिन्स इंडिपेंडेन्स’ है। उन्होंने तनाव का इस तरह से ब्योरा दिया है, जो देने में इस लेखक सहित ज्यादातर भारतीय घबराएंगे। मसलन, सेना में पंजाबियों के प्रभुत्व से पैदा चिंता और सेना का आधार व्यापक बनाने के लिए उठाए गए कदम, जो अंतत: बाबू जगजीवन राम के आबादी आधारित भर्ती कोटा के फैसले तक गए। औपनिवेशकाल की ‘लड़ाकू नस्लों’ का फर्जी सिद्धांत सुनियोजित तरीके से पीछे लिया गया। जो राज्य सेना में सबसे अधिक योगदान देता है वह ब्रिटिश धारणा के मुताबिक लड़ाकू नस्ल का राज्य नहीं, केरल है।

विलकिन्सन और अन्य बताते हैं कि कृष्ण मेनन द्वारा पहुंचाए नुकसान व 1962 के विनाश के बाद भारत सेना का पुनर्निर्माण कर सका इसके पीछे 1962 से 71 के दशक के दो दूरदर्शी रक्षा मंत्री थे, वाईबी चव्हाण और जगजीवन राम। उन्हें जनरलों को दोष देते कभी नहीं सुना गया। थापर व बीएम कौल जैसे जनरलों की 1962 के लिए निंदा पर ज्यादातर दोष राजनेता कृष्ण मेनन को दिया गया। चव्हाण ने ही हेंडरसन ब्रूक्स-भगत रिपोर्ट को गोपनीय और संसद से दूर रखने का फैसला किया। इसलिए कि इसमें सेना के प्रदर्शन और नेतृत्व की आलोचना थी, जो लता मंगेशकर के ‘ऐ मेरे वतन के लोगो…’ से लेस ‘हकीकत’ (इस नाम की चेतन आनंद की फिल्म ने उसे अमर बनाया) शैली के ब्योरे से बिल्कुल अलग था। यह अब भी गोपनीय है।

इन दशकों में इस इतिहास का अति-राष्ट्रवादी संस्करण बना कि जनरल तो हमेशा सही थे पर नेता बीच में आ गए। यदि करिअप्पा, थिमय्या, चौधरी मानेकशॉ को खुला हाथ दिया जाता तो कोई पाक अधिकृत कश्मीर नहीं होता, चीन को सबक सिखा दिया जाता, तिब्बत मुक्त हो जाता और 1965 में पाकिस्तानी दैत्य का नाश हो जाता और 1971 में तो एक पखवाड़े की और लड़ाई में पश्चिमी पाकिस्तान पर भी कब्जा हो जाता। किसी भी पक्ष से आधिकारिक सैन्य ब्योरे दूर से भी ऐसी किसी संभावनाओं के संकेत नहीं देते। लेकिन नए लोकतंत्र में ‘मेरी सेना सबसे शक्तिशाली’ यह भावना जरूरी थी।

आरएसएस के आख्यान में तो यह सोच और भी मजबूत हुई। सैन्य इतिहास का आरएसएस संस्करण कहता है कि करियप्पा, थिमय्या या चौधरी जैसे जनरलों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री से कुछ और दिनों की मोहलत मांगी थी लेकिन, नेहरू-गांधी ने विदेशी ताकतों के दबाव में आकर इसकी इजाजत नहीं दी। आरएसएस से संबंधित किसी भी शख्स से पूछने पर आपको यही तर्क सुनने को मिलेंगे। इस प्रक्रिया में कालक्रम, नाम और अवधि का भी घालमेल हो जाता है लेकिन यह बात बखूबी पेश कर दी जाती है कि एक ताकतवर सेना को कमजोर एवं डरपोक कांग्रेस सरकारों ने आगे नहीं बढ़ने दिया। प्रधानमंत्री मोदी का भी इसी सोच से संबंध है। उनका और उनके सहयोगियों के बीच तथ्यों को लेकर घालमेल होने की भी यही वजह है। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)



शेखर गुप्ता

एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

Twitter@ShekharGupta

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Web Title: सैन्य इतिहास के तथ्यों के साथ घालमेल क्यों?
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