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राज्यपाल- यानी एक व्यक्ति के विवेक पर ही क्यों हो कि किसकी सरकार बने?

‘अंतत: प्रत्येक निर्णय किसी एक व्यक्ति के विवेक पर ही तो होता है, बाकी को तो रोना होता है।’ -अज्ञात कर्नाटक में सही...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 19, 2018, 05:55 AM IST

‘अंतत: प्रत्येक निर्णय किसी एक व्यक्ति के विवेक पर ही तो होता है, बाकी को तो रोना होता है।’ -अज्ञात

कर्नाटक में सही हुआ या ग़लत? यक्ष प्रश्न है।

और कोई धर्मराज नहीं है। कि उत्तर दे सके। होना भी नहीं चाहिए।

अधर्म का समय जो है। धर्म एक ही है - सत्ता पाना।

राष्ट्र निरन्तर तथ्य सुन रहा है। इतने तर्क दिए जा रहे हैं कि कानों में सीसा-सा भर गया हो।

दृष्टांत बताए जा रहे हैं।

पता नहीं रोचक है - या कि दुर्भाग्यपूर्ण - किन्तु किस पार्टी या पार्टियों के समूह को सरकार बनाने का न्योता भेजा जाए - इसे लेकर प्रत्येक के पास ठोस, प्रामाणिक और स्थापित बिन्दु हैं।

ऐसा क्यों है?

क्योंकि संविधान इस पर चुप है।

क्योंकि सुप्रीम कोर्ट इस पर कई बार स्पष्ट कर चुकने के बाद भी, एक पारदर्शी व्यवस्था नहीं दे पाया है।

क्योंकि सरकारिया आयोग रिपोर्ट भी इसे सभी बिन्दुओं पर खुला रखे हुए है।

और विशेषकर, सर्वोच्च बाधा है - राज्यपाल के ‘विवेक’ (डिस्क्रिशन) को सर्वाधिक महत्व देने वाला अधिकार। जो वास्तव में अधिकार नहीं है। परम्परा है। व्यवस्था है। किन्तु अनेक विकल्पों के साथ। जिससे ये पूर्णत: अस्पष्ट हो गई है।

ठीक ऐसा ही राष्ट्रपति के विवेक को लेकर है। वे अपने विचार के अनुसार चाहें तो सबसे बड़ी पार्टी, जिसके पास बहुमत न हो, को सरकार बनाने के लिए बुला सकते हैं। या सबसे बड़े गठबंधन को।

राष्ट्रपति, राष्ट्र के सर्वोच्च हैं। प्रथम नागरिक हैं। राष्ट्राध्यक्ष हैं। उनके पास ऐसा ‘विवेकाधीन’ अधिकार होना ही चाहिए।

किन्तु क्यों राष्ट्रपति जैसे पद पर बैठे श्रेष्ठिजन को ‘पक्षपात’ ‘भेदभाव’ या ‘अनैतिक’ ‘असंवैधानिक’ जैसी कड़वी, अवांछित और मर्यादाहीन शब्दों की निंदा सुननी पड़े?

राज्यपालों की गरिमा, हालांकि, कुछ अलग है। उच्च उतनी ही है। किन्तु चूंकि वे केन्द्र के ‘निर्देश’ लेते रहने के लिए भारी विवादों में सदैव से रहे हैं - इसलिए उनकी स्थिति और गंभीर है।

जैसे कि डॉ. शंकरदयाल शर्मा ने राष्ट्रपति के रूप में ‘सबसे बड़ी पार्टी’ भाजपा को अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनाने के लिए बुलाया - तो भारी आलोचना से घिरे। 1996 का यह इतिहास अमिट है। 13 दिन में गिरी सरकार के कारण।

किन्तु डॉ. शर्मा करते भी क्या?

जिस कर्नाटक में आज इतना भीषण राजनीतिक भूचाल मचा हुआ है - वहीं से उठा था मुख्यमंत्री एसआर बोम्मई केस। उन्हें राज्यपाल ने राष्ट्रपति से इसलिए बर्खास्त करवा िलया था चूंकि उन्हें ‘शक’ था कि वे बहुमत खो चुके हैं। फिर सुप्रीम कोर्ट की नौ-सदस्यीय संविधान पीठ ने लम्बी सुनवाई की। और काफ़ी विस्तृत फैसला सुनाया। उससे केन्द्र द्वारा राज्य सरकारों को ‘सुविधानुसार’ बर्खास्त करने वाला दुरुपयोग लगभग बंद हो गया।

किन्तु फिर भी एक कांटा रह ही गया।

कांटा यह कि बोम्मई केस हो, या कि सरकारिया, पुंछी रिपोर्ट - या कि केवल किसे सरकार बनाने के लिए बुलाया जाए - इसी पर रामेश्वर प्रसाद विरुद्ध यूनियन ऑफ इंडिया पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय। सभी में निचोड़ एक ही निकलता है कि -

1. राज्यपाल के विवेक पर है कि वे किसे बहुमत वाली पार्टी या गठबंधन मानते हैं।

2. और बहुमत है या नहीं - यह केवल विधानसभा में -ऑन द फ्लोर ऑफ द हाउस- ही देखा जाए।

संविधान, संसद, सुप्रीम कोर्ट - सभी इस पर क्रमबद्ध, दो टूक, ‘स्पीकिंग’ शब्दों में कुछ नहीं बता पा रहे हैं।

जिस सरकारिया आयोग की दुहाई दी जा रही है - उसका बड़ी चतुराई से उपयोग किया जा रहा है। उसमें है कि किसी के पास भी स्पष्ट बहुमत न होने पर 1. जिस भी पार्टी या पार्टियों के चुनाव-पूर्व (प्री-पोल) गठबंधन को बुलाया जाए - जो बहुमत का दावा सिद्ध कर सके 2. सबसे बड़ी पार्टी को बुलाया जाए 3. चुनाव परिणाम के बाद के (पोस्ट पोल) गठबंधन को बुलाया जाए।

किन्तु यह सच नहीं है। क्योंकि ऐसा कहीं नहीं लिखा कि इसी क्रम में बुलाया जाए।

सुप्रीम कोर्ट के किसी भी फैसले को ले लिया जाए - अंतत: एक ही बात आती है कि जिसके पास बहुमत हो, उसे बुलाया जाए।

यानी, लोकतंत्र की आत्मा- संख्या।

नहीं, यह कहना नितांत ग़लत होगा। लोकतंत्र की आत्मा तो लोगों की भावनाओं का प्रतिबिम्ब बनी सरकार ही है। लोगों का। लोगों द्वारा। लोगों के लिए।

संख्या, लोकतंत्र के प्राण को कह सकते हैं?

प्राण क्या है? विषय भिन्न है - किन्तु योग में प्राण: का श्रेष्ठ उल्लेख है। प्राण को हम आमतौर पर ‘जीवन’ या ‘जान’ समझते हैं। चूंकि ‘प्राण निकल गए’ सुनते रहे हैं।

कि ‘लोकतंत्र की हत्या’ यानी लोकतंत्र के प्राण हर लिए।

ऐसा नहीं है। प्राण कहते हैं ‘फोर्स ऑफ लाइफ’ को।

इसलिए, संख्या लोकतंत्र के ‘जीवन का बल’ मानी जा सकती है।

तो संख्या तो देखनी ही पड़ेगी।

डॉ. नीलम संजीव रेड्‌डी ने 1979 में मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्री पद से, अविश्वास प्रस्ताव के संदर्भ में, दिए त्यागपत्र के बाद क्या किया था? उन्होंने मोरारजी और टूटे धड़े के नेता चौधरी चरणसिंह - दोनों को समर्थन देने वाले सांसदों के प्रमाण प्रस्तुत करने को कहा। तत्पश्चात् अधिक समर्थन वाले चौधरी चरण सिंह को सरकार बनाने का अवसर दिया। हालांकि जनता पार्टी तब भी सिंगल लार्जेस्ट पार्टी थी 200 सांसदों के साथ।

तो ‘विवेक’ ही सभी संदर्भों में हावी है। या ‘विवेक’ ही कुंजी है।

किन्तु, ‘विवेक’ क्या करवा सकता है - उसका भयंकर, लोकतंत्र के लिए सर्वाधिक डरावना किस्सा है आंध्र के मुख्यमंत्री नंदमुरि तारक रामाराव (एनटीआर) को गिराने का।

इंदिरा गांधी के विश्वस्त राज्यपाल रामलाल ने अपने ‘विवेक’ पर उन्हें तब बर्खास्त कर दिया - जब वे अमेरिका में ट्रिपल कॉरोनरी बायपास सर्जरी करवा के लौटे ही थे। ताबड़तोड़ उन्हीं के वित्तमंत्री को कांग्रेस का मुख्यमंत्री बनाकर शपथ दिला दी।

295 के सदन में 161 विधायकों के समर्थन वाले एनटीआर ने किन्तु इतिहास रच दिया। पूरे 161 विधायकों की दिल्ली में राष्ट्रपति भवन के समक्ष ‘लाइव’ परेड करवा दी! समूचे राष्ट्र में खलबली मच गई। ऐसा पहले कभी किसी ने नहीं किया था।

ऐसा आज क्यों नहीं होता? परेड करवाने का प्रावधान क्यों नहीं किया जा सकता?

मुझे याद है 1984 की यह घटना जब मैं कॉलेज में पढ़ता था। इंडिया टुडे ने लिखा था “लोकतंत्र की ये परेड विजय चौक पर गणतंत्र दिवस परेड से कम न थी। 25 देशों के अंतरराष्ट्रीय टीवी चैनल्स ने उसे कवर किया था। और इंदिरा गांधी की कड़ी भर्त्सना की थी।”

जिन डॉ. शंकरदायल शर्मा को राष्ट्रपति के नाते अटल बिहारी वाजपेयी को बुलाने पर आलोचना झेलनी पड़ी, उन्हीं ने रामलाल की जगह ली। और एनटीआर के पुन: मुख्यमंत्री बनने का मार्ग एक माह में ही प्रशस्त किया।

एक और बात।

तब इंदिरा गांधी सर्वशक्तिमान थीं। फिर भी रामलाल को, मीडिया द्वारा कड़ी आलोचना के बाद, बर्खास्त कर दिया। आज कोई राज्यपाल बर्खास्त नहीं किए जाते।

हो सकता है, वे रामलाल जैसी भयंकर भूलें न कर रहे हों।

हो सकता है, मीडिया भी वैसी स्पष्ट, ईमानदार आलोचना न कर रहा हो।

अन्यथा 2 सीटों वाली भाजपा सत्ता में कहां से आ जाती? मेघालय, मणिपुर, गोवा कुछ न हुए होते।

न हुए होते - पूर्णत: काल्पनिक है। राजनीति; संख्या से, सत्ता से, सूझ-बूझ से अथवा साजिश से चलती है। कल्पना से नहीं।

कर्नाटक के संदर्भ में यदि लोकतंत्र की भावना देखें - तो जिन पार्टियों के समूह ने सर्वप्रथम बहुमत के प्रमाण दिखा दिए - उन्हें ही सरकार बनाने का अवसर मिलना था।

कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री मानना कांग्रेस का मास्टर स्ट्रोक था! चाहे न चला हो।

फिर सुप्रीम कोर्ट में कांग्रेस आधी रात के काफ़ी बाद गई। हार गई।

किन्तु प्रमुख चिंता के प्रश्न खड़े हो गए।

1. क्या कर्नाटक में शपथ कोई ऐसा राष्ट्रीय संकट था जिसे सुप्रीम कोर्ट सुबह 5 बजे तक सुने? लाखों पीड़ितों के लिए तो ऐसा कभी भी सोचा तक नहीं गया? याकूब तक में गलत था।

2. समर्थन के लिए 15 दिन या 7 दिन या 3 दिन भी क्यों दिए जाने चाहिए?

किसी को भी?

स्पष्ट है, ‘हॉर्सट्रेडिंग’ का समय है यह। जब होटल्स-रिजॉर्ट्स में विधायकों को रखा जा रहा है - तो क्यों न उन्हें 24 घंटे में विधानसभा में पेश होकर, विश्वास मत प्रकट करने को बाध्य नहीं किया जाना चाहिए? यदि जिला मुख्यालय बहुत ही दूर है - तो भी देश में सभी पार्टियां इतनी सक्षम हैं कि हेलीकॉप्टर से विधायक को बुलवा लेंगी।

घोड़े हैं- तो बिकेंगे ही।

बिकने का समय और बाज़ार की सीमा तो कम की जा सकती है। क्योंकि रामाराव के समय विधायकों का रेट 15 लाख था जो अब 100 करोड़ हो गया है!

सभी ‘विवेक’ सदैव सही के पक्ष में निर्णय ले, असंभव है, किन्तु लेने ही होंगे।

विवेक से विश्व चलता है। विवेक, किन्तु इतना भिन्न होता है कि कल्पना भी नहीं की जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट में गोवा के लिए सुनवाई के अंतर्गत कांग्रेस के अभिषेक मनु सिंघवी ने अपील की शुरुआत में कहा था : ‘योर लॉर्डशिप्स ऑलवेज़ हिअर द अदर साइड।’

इस पर तब के चीफ़ जस्टिस जे.एस. खेहर ने कहा था : नो, समटाइम्स, वी डू नॉट हिअर!

कोई बात नहीं। कहना हमारा कर्तव्य है। कहते ही रहेंगे।

(लेखक दैनिक भास्कर के ग्रुप एिडटर हैं।)

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