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हर सकारात्मक कदम का समाज पर असर पड़ता ही है

पिता लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) अश्विनी कुमार बख्शी आर्मी ऑफिसर थे और मां श्रद्धा प्रोफेसर थीं। पिता ऐसी...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 21, 2018, 06:00 AM IST

हर सकारात्मक कदम का समाज पर असर पड़ता ही है
पिता लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) अश्विनी कुमार बख्शी आर्मी ऑफिसर थे और मां श्रद्धा प्रोफेसर थीं। पिता ऐसी जगहों पर तैनात रहे, जहां हम नहीं जा सकते थे, मैंने, मां और बहन अपूर्वा के साथ ज्यादातर वक्त देहरादून में गुजारा। पिता से अलग रहना जहां भावुक बना देता है, वहीं बच्चे हालात से जूझने की अतिरिक्त तालीम भी हासिल कर लेते हैं। बारहवीं के बाद मैं अपनी बहन अपूर्वा बख्शी के साथ आगे की पढ़ाई करने के लिए मुंबई आ गई। बेचलर्स इन मास मीडिया की पढ़ाई करने के साथ 2007 में पहली नौकरी शुरू की। लेकिन बाद में आगे की पढ़ाई करने के लिए नौकरी छोड़ दी और इंडियन बिज़नेस स्कूल, हैदराबाद में दाखिला लिया। इस दौरान मेरी शादी हो गई। कुछ दिन मुंबई में एक कंपनी की नेशनल ब्रैंड मैनेजर रही, फिर पति के साथ हॉन्गकॉन्ग शिफ्ट हो गई। पिछले पांच साल से हम वहीं हैं।

दरअसल, कामकाज के सिलसिले में ऑस्ट्रेलिया, जापान जैसे बहुत-से देशों की यात्राओं में तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं सुनने को मिलती थीं, ‘अहा! आप इंडिया से है। आपका देश तो कल्चरली कितना रिच है, वहां ताजमहल है। वहीं से ही तो योग सारी दुनिया में आया है।’ लेकिन जब मैं उन्हें भारत आने का न्योता देती तो सुनने को मिलता,‘भारत में ट्रैवल! कभी नहीं।’ वे कहते कि अपनी बेटी या प|ी को वे अकेले भारत नहीं भेज सकते। एक सैनिक की बेटी हूं, जाहिर है खून में देशभक्ति की मात्रा थोड़ी ज्यादा ही है। मैं बहस करती कि अमेरिका और न्यूज़ीलैंड में भी तो क्राइम होता है, ऐस में मुझसे प्रश्न किए जाते कि भारत में दुष्कर्म क्यों होते हैं! वे समझने को तैयार नहीं होते कि 130 करोड़ लोगों के देश में हर पुरुष को दुष्कर्मी मान लेना किस तरह जायज नहीं है। कई बार तो ये भी होता था कि जिन लोगों से मैं पिछली रात लड़ रही होती थी, वे अगली सुबह मुझे ई-मेल में औरतों के खिलाफ हो रहे अपराधों की हेडलाइंस हाईलाइट करके भेजते। मैं अक्सर पति से कहती कि मैं भारत जाकर इस दिशा में काम करूंगी। मुझे विदेशियों के आगे शर्मसार होना अच्छा नहीं लगता। ... और वो एक दिन आ गया। एक सुबह हॉन्गकॉन्ग में काम से वापस घर जा रही थी और मैंने भारत के हाईवे 91 पर हुए हादसे के बारे में पढ़ा, जहां बुलंदशहर में मां-बेटी के साथ उनके घरवालों के सामने सामूहिक दुष्कर्म किया गया था। मुझे लगा कि मैं विदेशियों के सामने अपने देश का सम्मान हार गई हूं। मैंने जब कॉर्पोरेट इंडस्ट्री के कुछ टॉप लीडर्स, अधिकारियों से बातचीत की, दोस्तों से विचार-विमर्श किया तो ज्यादातर का कहना था कि भारत में कुछ नहीं बदल सकता। अच्छा हुआ कि तुम हॉन्गकॉन्ग चली गई हो।

मैं बुरी तरह टूट गई थी, लेकिन फिर तय किया, चाहे कुछ हो जाए, मैं जेंडर सेंसेटिविटी के मुद्‌दे पर भारत जाकर लोगों को जागरूक करूंगी। मैंने लाखों रुपए के पैकेज की नौकरी और आराम की ज़िंदगी को छोड़कर देश का रुख किया। मैंने तय किया कि कन्याकुमारी से श्रीनगर तक जाऊंगी और लोगों से औरतों के खिलाफ होने वाले अपराधों, बाल विवाह, बच्चियों को पढ़ाने-लिखाने में आने वाली दिक्कतों समेत तमाम मुद्‌दों पर बातचीत करूंगी, उन्हें जागरूक करने की कोशिश करूंगी। 15 सितंबर, 2017 को मेरे साथ 12 लोगों ने कन्याकुमारी से 3800 किमी की यात्रा शुरू की थी। वे सभी गाड़ी से चल रहे थे, जबकि पदयात्रा का ज़िम्मा मैंने संभाला था। मैं हर दिन तकरीबन 25 से 30 किमी पैदल चलती। शाम ढलने से पहले किसी गांव में जाकर वहां बच्चियों, उनके मां-पिता और गांव वालों तथा लड़कों से चर्चा करती। यूएन के एम्पावर वुमेन इनेशिएटिव के तहत मैं `चैंपियन फॉर चेंज’ चुनी गई थी। इसलिए मैं महिलाओं के साथ अच्छी तरह कनेक्ट कर पा रही थी।

मध्यप्रदेश के एक किसान पिता ने कहा कि मेरे सामने बच्ची की इज्जत और जान बचाने के लिए उसका विवाह करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। गांवों में कच्ची शराब का व्यवसाय धड़ल्ले से चलता है। शराब पीकर 15-16 साल के किशोर अपराध करने को उतारू रहते हैं, उनसे अपनी बेटी को मैं कैसे बचाऊं? उन्होंने बताया कि प्रदेश के देवल गांव में एक बच्ची को दो लड़कों ने दुष्कर्म के बाद ज़िंदा जला दिया था। मुझे अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया कि बच्चियों को अगर हम पढ़ने-लिखने के लिए सुरक्षित माहौल दे सकें तो उनका कम उम्र में विवाह क्यों किया जाएगा? एक बार गायिका सोना महापात्रा ने बताया कि दक्षिण अफ्रीका में रहने वाली एक भारतीय महिला वर्षों से घरेलू उत्पीड़न का शिकार हो रही थी, लेकिन एक उस महिला ने सोना के मोबाइल पर 100 से ज्यादा कॉल्स किए। सोना उस समय रिकॉर्डिंग में व्यस्त थीं। बाद में उन्होंने कॉल बैक किया। वो सोना की आवाज़ सुनते ही फूट-फूटकर रोने लगी। उसने बताया, ‘आपका एक गीत मुझे क्या बेचेगा रुपइया ... मैं सुबह से सुनती ही जा रही थी और मुझे ऐसी प्रेरणा मिली कि मैंने 20 साल तक पीड़ा सहने के बाद आज पति का घर छोड़ दिया है और मैं भारत लौट रही हूं।‘ सोना से ये सुनने के बाद मेरी हिम्मत और बढ़ गई, जो कन्याकुमारी से कश्मीर के बीच कोई न कोई ज़िंदगी ऐसी ज़रूर होगी, जिस पर मेरी इस यात्रा से सकारात्मक असर पड़ रहा होगा। महबूब नगर में एक लड़की ने कहा भी `मेरे मन का डर भाग गया है। मैं 14 साल की हूं। मम्मी-पापा ने मेरी शादी तय कर दी है, लेकिन मैं वो नहीं करूंगी। अगर उन्होंने मुझे घर में बंद भी कर दिया तो दरवाज़ा तोड़कर भाग जाऊंगी।‘ हज़ारों क़दम के सफर में मेरे पैरों पर भले छाले पड़ गए हैं, इन बच्चियों के ऐसे बहादुर बोल दिल के ज़ख्मों पर बहुत बड़ा मरहम हैं।

(जैसा उन्होंने मुंबई में चण्डीदत्त शुक्ल को बताया)

सृष्टि बख्शी

संयुक्त राष्ट्र के महिला सशक्तीकरण कार्यक्रम में ‘चैंपियन फॉर चेंज’ चुनी गईं

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