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21 साल बाद खुशी का फैसला

Nagour News - भास्कर संवाददाता | मेड़ता सिटी मातासुख कसनाऊ लिग्नाइट प्रोजेक्ट के करीब 21 साल पुराने मुआवजा प्रकरण में 136 किसानों...

Dainik Bhaskar

Feb 02, 2018, 06:25 AM IST
21 साल बाद 
 खुशी का फैसला
भास्कर संवाददाता | मेड़ता सिटी

मातासुख कसनाऊ लिग्नाइट प्रोजेक्ट के करीब 21 साल पुराने मुआवजा प्रकरण में 136 किसानों के लिए राहत की खबर है। जिला एवं सत्र न्यायालय मेड़ता सिटी ने मुआवजे के इस दो दशक पुराने मामले में राजस्थान हाईकोर्ट के 2011 में दिए गए एक फैसले को यथावत रखते हुए हर किसान को 7500 रुपए प्रति बीघा के बजाए 25 हजार रुपए प्रति बीघा की दर से मुआवजा देने के आदेश दिए हैं। इस राशि पर किसानों को 9 फीसदी की दर से ब्याज भी दिया जाएगा।

इस प्रकरण में जिला एवं सत्र न्यायालय पहले फैसला पारित कर चुका था। मगर आरएसएमएम पहले राजस्थान हाईकोर्ट गई। वहां केस हार जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट की शरण में भी गई। मगर सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर लगा दी। इस पर आरएसएमएम ने दुबारा जिला एवं सत्र न्यायालय में रिव्यू एप्लीकेशन पेश की। मगर वहां भी निराशा हाथ लगी। जिला एवं सत्र न्यायालय ने 31 जनवरी 2018 को इजलास से 25 हजार रुपए प्रति बीघा के हिसाब से मुआवजा का आदेश पारित किया। उल्लेखनीय है कि राजस्थान सरकार के उपक्रम राजस्थान स्टेट माइंस एंड मिनरल्स प्राइवेट लिमिटेड (आरएसएमएम) ने 1994 में एक सर्वे कराया था। इस सर्वे में यह पता चला कि नागौर जिले के मातासुख व कसनाऊ गांवों में कोयले के भंडार हैं। राज्य सरकार ने 1997 में क्षेत्र के 450 काश्तकारों की जमीनें अवाप्त की। ये सभी खेतीहर किसान थे।

आरएसएमएमएल देगा 136 किसानों को ‌ 7500 के बजाए ‌Rs. 25 हजार प्रति बीघा मुआवजा, ब्याज सहित

मातासुख कसनाऊ प्रोजेक्ट

नागौर. मातासुख में लिग्नाइट खान। यह जमीन 1997 से अवाप्त कर यहां से कोयला निकाला जा रहा है।

इसलिए गए कोर्ट में

Rs. 7500 प्रति बीघा मुआवजा दिया तो काश्तकार गए कोर्ट की शरण में

प्रकरण के अनुसार सरकार ने 450 किसानों की कुल 7400 बीघा जमीन अवाप्त कर ली। बदले में मुआवजा 7500 रुपए प्रति बीघा का ही दिया। इससे नाराज किसान अदालत की शरण में गए। काश्तकारों की ओर से जयपुर के एडवोकेट राजकुमार पारीक ने 2002 में जिला एवं सत्र न्यायालय मेड़ता में 136 किसानों की ओर से परिवाद पेश किए। जिसमें यह बताया गया कि सरकार ने किसानों की करोड़ों की जमीन औने-पौने दाम में अवाप्त की। जमीन की कीमत करोड़ों की है, मगर सरकार 7500 रुपए प्रति बीघा के हिसाब से ही मुआवजा दे रही है। जो बहुत कम है। जमीन अवाप्त होने के बाद किसान सड़क पर आ जाएंगे और उनके समक्ष रोजी रोटी का संकट होगा। इसलिए मुआवजा राशि बढ़ाई जाए। इसके बाद यह मामला लगातार न्यायालय में चलता रहा।

लिग्नाइट मिला सरकार को, किसानों ने लड़ी लंबी लड़ाई

आरएसएमएम ने रिव्यू एप्लीकेशन लगाई तो फैसला आया 25 हजार रुपए प्रति बीघा के अदा करने के आदेश का

अब आरएसएमएम जिले की अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक जब केस हार गया तो उसने रिव्यू एप्लीकेशन पेश की जिसे कोर्ट ने 11 मई 2017 को खारिज कर दिया। अब इसी 21 साल पुराने मामले में मेड़ता के जिला एवं सत्र न्यायाधीश गिरीश कुमार शर्मा ने राजस्थान हाईकोर्ट के 11 जुलाई 2017 को दिए गए फैसले के मुताबिक ही सभी 136 काश्तकारों को 7500 रुपए प्रति बीघा के बजाय 25 हजार रुपए प्रति बीघा के हिसाब से मुआवजा अदा करने, उस पर 30 प्रतिशत सोलेसियम यानी अवाप्ति का प्रतिकर अदा करने और कुल देय राशि पर 9 प्रतिशत का ब्याज अदा करने के आदेश दिए हैं। ब्याज भूमि अवाप्ति से लेकर भुगतान की तिथि तक लगेगा।

21 साल का संघर्ष : कुछ ऐसा मातासुख कसनाऊ इलाके में 1994 में सर्वे के जमीन अवाप्ति की प्रक्रिया शुरू हुई। तब किसानों को यहां उद्योग धंधे लगाने के सब्जबाग दिखाए गए। जमीन अवाप्ति के बाद ज्यादातर किसान बेरोजगार हो गए। मुआवजा भी उचित नहीं मिला। तब इन्होंने कोर्ट में शरण ली और लंबी लड़ाई लड़ी। अब जाकर पक्ष में फैसला आया है।

डीजे कोर्ट ने दिया 50 हजार रुपए प्रति बीघा मुआवजा का आदेश: राजकुमार पारीक की ओर से 136 किसानों के पेश किए गए दावे के बाद मेड़ता जिला एवं सत्र न्यायालय ने 6 फरवरी 2010 को तेजाराम देहडू तथा सीताराम जाट निवासी मातासुख के दोनों फैसलों में 7500 रुपए प्रति बीघा के बजाय 50 हजार रुपए प्रति बीघा के हिसाब से किसानों को मुआवजा देने के आदेश पारित कर दिए। इस पर आरएसएमएम राजस्थान हाई कोर्ट की शरण में चला गया। हाईकोर्ट में आरएसएमएम ने दलील दी कि मुआवजा राशि बहुत अधिक है।

हाईकोर्ट ने मुआवजा राशि घटा 25 हजार की थी

आरएसएमएम की अपील पर हाईकोर्ट ने मेड़ता जिला एवं सत्र न्यायालय के फैसले में संशोधन करते हुए मुआवजा राशि 50 हजार रुपए प्रति बीघा से घटाकर 25 हजार रुपए प्रति बीघा कर दी। यह फैसला 11 जुलाई 2011 को हाईकोर्ट ने सुनाया। इसके बाद आरएसएमएम हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की शरण में गई। वहां 14 फरवरी 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने भी फैसला सुना दिया। इसमें हाईकोर्ट के 11 जुलाई 2011 के फैसले को यथावत रखने के आदेश दिए।

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