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ज़िंदगी की ‘कॉलिंग’ कभी भी आ सकती है

स्टोरी 1 : उत्तर-पश्चिमी इंग्लैंड के लैंकाशर की लिंडसे बार्न्स और हावड़ा स्थित बाली के रंजन घोष की मुलाकात 1980 पार के...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 15, 2018, 05:40 AM IST

ज़िंदगी की ‘कॉलिंग’ कभी भी आ सकती है
स्टोरी 1 : उत्तर-पश्चिमी इंग्लैंड के लैंकाशर की लिंडसे बार्न्स और हावड़ा स्थित बाली के रंजन घोष की मुलाकात 1980 पार के दशक में जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में विद्यार्थी के रूप में हुई, क्योंकि आदर्शवाद और एडवेंचर को लेकर दोनों के विचारों में समानता थी। दोनों ने शादी कर ली और बोकारो से 25 किमी दूर चांब्राबाद गांव में जाने का निर्णय लिया। समाजशास्त्र की छात्रा के रूप में वे वहां मुख्यत: कोयला क्षेत्र में ज़िंदगी पर शोध करने गई थीं, जब 1993 में मदद की एक पुकार ने उनके जीवन के फैसले को बदल दिया।

उनके पास न तो मेडिकल की डिग्री थी और न हैल्थ केयर उनका पसंदीदा क्षेत्र। फिर भी कुछ पड़ोसी होने वाली मां के लिए मदद मांगने उनके पास आए, जिससे उन्हें आश्चर्य हुआ। चूंकि उन्हें मालूम नहीं था कि क्या करना है तो उन्होंने बहाने बनाए। उनके पति ने कहा, ‘जाओ और जाकर देखो कि तुम क्या कर सकती हो।’ गांव में स्वास्थ रक्षा संबंधी हैंडबुक ‘व्हेयर देयर इज नो डॉक्टर’ से लैस होकर लिंडसे बच्चे की डिलीवरी के लिए घर से निकलीं। उन्हें देख वहां मौजूद महिलाओं को राहत मिली। तब लिंडसे को लगा कि उन्हें कुछ करना ही होगा।

अब दो बच्चों की मां 58 वर्षीय लिंडसे को जल्दी ही अन्य गांवों से ही इसी तरह के अनुरोध मिलने लगे। कुछ होम डिलीवरी के बाद उन्होंने हॉस्पिटल और नर्सिंग होम के काम में शिक्षित होकर काम में महारत हासिल करने का फैसला किया। लगभग 100 होम डिलीवरी के बाद लिंडसे 2001 में डिलीवरी के लिए कमरे किराये पर लेकर 12 बिस्तरों वाला हैल्थ सेंटर स्थापित किया, जिन्हें अब गांव की लड़कियां ही चलाती हैं। 95 फीसदी महिलाओं की सामान्य डिलीवरी होती हैं और उन्हें सिर्फ जटिल मामलों के लिए ही बुलाया जाता है। वे जूनियर डॉक्टरों व नर्स को इस बात का प्रशिक्षिण देती हैं कि कैसे सीमित सुविधाओं की परिस्थितियों में रोगी का इलाज करें। यह युगल 120 गांवों की 7,000 महिलाओं को विभिन्न सेल्फ-हैल्प ग्रुप के दायरे में लाया है।

स्टोरी 2 : लिंडसे के विपरीत 46 वर्षीय अंजली कुरियन के लिए फैसले की घड़ी 2015 में आई। एक बार अंजली अंग दान जागरूकता शिविर में गई थीं, जहां उनकी मुलाकात कोच्चि के लेकशोर हॉस्पिटल के अंगप्रत्यारोपण विभाग के प्रमुख फिलिप जी. थॉमस से हुई। अंजली ने थॉमस की किताब ‘ट्रांसप्लांट स्टोरी’ पढ़ी, जो दो अजनबियों की कहानी है, जिन्हें लिवर ट्रांसप्लास ने आपस में मिलाया। उन्हें मालूम नहीं था कि अगले ही दिन उनकी मां उन्हें कॉल करके बताएगी कि उनके भाई सनी की किडनी काम नहीं कर रही है और उसे ट्रांसप्लांट की जरूरत है।

तब तक वे सिर्फ गायिका, लोकप्रिय रेडियो जॉकी, दो किशोरवय बच्चों की मां और प्रसिद्ध गायिका मां उषा उथुप की बेटी थीं। सिर्फ चार साल में अंजली ने न केवल परिवार की लड़ाई के लिए साधन व लोग जुटाए और वसुंधरा राघवन की ‘द कि़डनी वॉरियर’ में अपनी राह खोजी, जो वास्तविक ज़िंदगी के प्रेरक मामलों का संकलन है बल्कि सैकड़ों ऐसे रोगियों की मदद की जो अपने शरीर में ऐसा कोई रोग पाए जाने पर अंधेरे में भटकते रहते हैं। अंजली अब कोलकाता, कोच्चि और अन्य शहरों में घूम-घूमकर अंग-दाताओं, अंग स्वीकार करने वाले रोगियों और स्वास्थ्य रक्षा देने वालों से मिलती हैं, उनका हौसला बढ़ाती हैं और फंड इकट्‌ठा करती हैं। वे किडनी ट्रांसप्लांट ऑपरेशन के पहले व बाद के पहलुओं पर वार्ताएं देती हैं। वे रोगियों को वित्तीय मदद देती हैं और डायलिसिस के सस्ते उपकरण व दवाइयों पर सलाह देती हैं।

फंडा यह है कि  अपनी ‘कॉलिंग’ पाना हर किसी की ज़िंदगी का उद्देश्य होता है। कुछ के लिए जल्दी तो कुछ के लिए यह देर से आती है।

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए टाइप करें FUNDA और SMS भेजें 9200001164 पर

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in

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