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ट्विटर के डेटा का मोलभाव और निजता का सवाल

Dainik Bhaskar

May 02, 2018, 05:55 AM IST

Nagour News - फेसबुक के बाद अब ट्विटर के डेटा की सौदेबाजी ने एक बार फिर लोगों की निजता के उल्लंघन और सार्वजनिक बहस व जनमत को...

ट्विटर के डेटा का मोलभाव और निजता का सवाल
फेसबुक के बाद अब ट्विटर के डेटा की सौदेबाजी ने एक बार फिर लोगों की निजता के उल्लंघन और सार्वजनिक बहस व जनमत को अनुचित तरीके से प्रभावित करने का विवाद उठा दिया है। माइक्रो-ब्लागिंग प्लेटफॉर्म ट्विटर ने कैंब्रिज विश्वविद्यालय के शोधार्थी अलेक्सांद्र कोगान को एक दिन के लिए अपना डेटा देखने की छूट दी थी। इस दौरान उन्होंने दिसंबर 2014 से अप्रैल 2015 तक ट्विटर पर उपलब्ध पांच माह के डेटा को एक साथ हासिल करके उनका मनोवैज्ञानिक जीवन वृत्त बनाया और उससे ऐसा उपकरण बनाया, जिसने कैंब्रिज एनालिटिका को राजनीतिक प्रचार में मदद की। हालांकि, इस समाचार का ट्विटर ने खंडन किया है और उसका मानना है कि हैकिंग जैसा कुछ नहीं हुआ है। इसके बावजूद कंपनी इस बात से इनकार नहीं कर रही है कि उसने कोगान की कंपनी जीएसआर को एक दिन के लिए डेटा बेचा। कंपनी का दावा है कि डेटा सार्वजनिक हैं और उसे कोई भी देख सकता है, लेकिन कंपनी जब भी थोक में किसी को डेटा उपलब्ध कराती है तो उसके लिए सौदा करती है और इस मामले में ऐसा हुआ है। कानून की अनुपस्थिति के कारण यह मामला नैतिकता और अनैतिकता के बीच फंस कर रह गया है। सवाल यह है कि अगर डेटा सही हैं और उनका कोई सही उद्देश्य के लिए इस्तेमाल कर रहा है तो इसमें गलत क्या है? गलत इसलिए है कि क्योंकि उन डेटा का इस्तेमाल करके चुनाव में कन्सल्टैंसी करने वाली कंपनियां सार्वजनिक बहस को मनमानी दिशा देती हैं, सार्वजनिक संस्थाओं को प्रभावहीन करती हैं। सबसे बड़ा अपराध तो झूठी खबरों और जानकारियों का परोसा जाना है और वह काम डेटा माइनिंग के माध्यम से ही हो रहा है। ब्रेग्जिट और अमेरिकी चुनाव में हुई धांधली तो हमारे सामने है ही और इसीलिए अपनी करतूतों के लिए माफी मांगते हुए मार्क ज़करबर्ग ने भारत, ब्राजील और दुनिया के अन्य देशों के लिए फिल्टर लगाने की बात की है। फेसबुक के मुकाबले ट्विटर दुनिया के विशिष्ट लोग प्रयोग करते हैं इसलिए उसके 8.7 करोड़ लोगों का डेटा फेसबुक के 2.2 अरब लोगों के मुकाबले कम लग सकता है पर विशिष्ट लोगों के जुड़े होने के कारण ट्विटर का प्रभाव और प्रामाणिकता ज्यादा है। चिंता की बात यह है कि यूरोपीय संघ तो 25 मई से सामान्य डेटा संरक्षण नियमावली लागू करने जा रहा है, लेकिन भारत जैसे देश अभी भी उन कंपनियों के भरोसे बैठे हैं।

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