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जिंदगी में कुछ हासिल करने वाले बहाने नहीं बनाते

ये वाक्य आपके परिचय के होंगे। कई गृहणियों के बीच यह वाक्य बहुत प्रसिद्ध है, ‘मैं पहले ही बच्चों वाली विवाहिता हूं,...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 02, 2018, 05:55 AM IST

जिंदगी में कुछ हासिल करने वाले बहाने नहीं बनाते
ये वाक्य आपके परिचय के होंगे। कई गृहणियों के बीच यह वाक्य बहुत प्रसिद्ध है, ‘मैं पहले ही बच्चों वाली विवाहिता हूं, और किसी चीज के लिए वक्त ही नहीं है।’ आर्थिक संघर्ष करने वालों के बीच आपने इसे सुना होगा, ‘देखो दोस्त, छोटे भाई को पढ़ाना है, बड़ी बहन की शादी करनी है, शराबी पिता को हैंडल करना है। परिजनों के पेट भरने के अलावा मैं क्या हासिल कर सकता हूं?’ बहाने बनाना बहुत आम है। लेकिन, गत शुक्रवार 990 ऐसे लोग सामने आए, जिन्होंने कोई बहाना नहीं बनाया।

वर्ष 2017 में 9.50 लाख से ज्यादा उम्मीदवारों ने यूपीएससी की प्रारंभिक परीक्षा के लिए आवेदन दिया। इस विशाल संख्या में से सिर्फ 4,56,625 उम्मीदवार परीक्षा में बैठे। मुख्य लिखित परीक्षा में उम्मीदवारों का यह आंकड़ा 13,366 तक रह गया, जो पिछले साल अक्टूबर-नवंबर में हुई थी। इनमें से केवल 2,568 उम्मीदवार फरवरी-अप्रैल 2018 में हुए पर्सनैलिटी टेस्ट तक पहुंचे। फिर यूपीएससी बोर्ड ने 240 महिलाओं और 750 पुरुषों सहित कुल 990 उम्मीदवारों के नाम भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस), भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) और भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के लिए सुझाए। शुक्रवार को जब यूपीएससी 2017 के नतीजे घोषित हुए तो परिश्रम, ज़िद और दृढ़-संकल्प की कई कहानियां सामने आई हैं। ये सभी 990 कहानियां पढ़ने और सीखने लायक हैं। दो उदाहरण पेश हैं।

स्टोरी 1 : यदि बहुत ही सुखी परिवार की विवाहित महिला, जिसका चार साल का बेटा हो, जीवन में ‘संतुष्टि के अहसास’ के लिए व्याकुल हो और वह भी नौ साल के कॉर्पोरेट अनुभव के बाद तो इसका अर्थ है कि उसमें ‘कुछ’ करने की आग है। और उस ‘कुछ’ ने ही देश की सबसे कठिन परीक्षा दूसरे प्रयास में दूसरी रैंक के साथ पास करने का उसका रास्ता साफ किया। मां के रूप में वे अपने बेटे से उसकी ढाई साल की उम्र से ही अलग रहीं। अनु कुमारी से मिलिए, जिन्हें हरियाणा सरकार ने अपने गृह जिले सोनीपत में ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ अभियान का ब्रैंड एम्बेसडर बनाया है। निश्चित ही वे लड़कियों को लेकर लोगों की मानसिकता बदलने में प्रेरणा बनी हैं, खासतौर पर हरियाणा में।

स्टोरी 2: एम. शिवागुरु प्रभाकरण अनु कुमारी जितने किस्मत वाले नहीं हैं। न तो उन्हें कोई कॉर्पोरेट अनुभव है और न उन्होंने दूसरी रैंक हासिल की है। 101 रैंक हासिल करने वाले प्रभाकरण के पिता शराब में डूबे रहते हों और मां व बहन नारियल के पत्तों से चीजें बनाने के बाद उन्हें बेचकर दिन का खर्च निकालने का संघर्ष कर रही हों तो उनके लिए काउंसलिंग और कोचिंग की फीस देना वाकई शीर्ष प्राथमिकता नहीं हो सकतीं। शिवागुरु ने दो साल आरा मशीन ऑपरेटर के रूप में काम किया और तमिलनाडु के तंजावुर जिले के पट्‌टुकोट्‌टाई में खेती भी की ताकि परिवार को सहारा दे सकें और अपनी शिक्षा के लिए भी कुछ बचा सकंे।

बाद में वे आईआईटी मद्रास की प्रवेश परीक्षा पास करने के इरादे से चेन्नई गए। एक दोस्त ने उन्हें ऐसे ट्यूटर का पता दिया, जो वंचित बच्चों को प्रशिक्षण देते थे। सप्ताहांत में नि:शुल्क कोचिंग पाने के लिए वे रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर सोते, घर लौटकर सप्ताह के अन्य दिनों नियमित रूप से कॉलेज जाते। उन दिनों वे पैसा कमाने के लिए मोबाइल रिचार्ज आउटलेट पर काम करते। उन्होंने आईआईटी-एम की परीक्षा पास की, एमटेक में टॉप किया और आखिरकार चौथे प्रयास में यूपीएससी परीक्षा पास की। लेकिन, अनु और शिवागुरु के पास एक बहाना था- वे गरीब लोगों की सेवा करना चाहते हैं!

फंडा यह है कि  आप क्या करते हैं- बहाने बनाते हैं या लक्ष्य हासिल करते हैं? यह आपकी ज़िंदगी है और आपको ही फैसला करना है।

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए टाइप करें FUNDA और SMS भेजें 9200001164 पर

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in

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