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खुशनुमा दुनिया चाहिए- प्रकृति और विकास में संतुलन बनाएं

बहुत पहले 1969 में जब हमारे राष्ट्र प्रमुखों ने देश में पहला परमाणु संयंत्र स्थापित करने का फैसला लिया तो राष्ट्रीय...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 14, 2018, 05:55 AM IST

खुशनुमा दुनिया चाहिए- प्रकृति 
और विकास में संतुलन बनाएं
बहुत पहले 1969 में जब हमारे राष्ट्र प्रमुखों ने देश में पहला परमाणु संयंत्र स्थापित करने का फैसला लिया तो राष्ट्रीय राजमार्ग 48 पर कई गांवों में लोगों के चेहरे मुस्कान से दमक रहे थे, क्योंकि इस फैसले ने उनके गांव का नाम दुनिया के नक्शे पर ला दिया था। इसके अलावा तारापुर परमाणु केंद्र ने कुछ और भी किया। यह धीरे-धीरे औद्योगिक गतिविधि का केंद्र बनने लगा। कपड़ा, दवाई, इस्पात खासतौर पर रसायनों के निर्माताओं ने अपने बिज़नेस स्थापित करने शुरू कर दिए विशुद्ध रूप से इसलिए, क्योंकि यह मुंबई से दूर था और फिर भी इतना दूर भी नहीं था कि देश की आर्थिक राजधानी तक पहुंचने के लिए 129 किलोमीटर का फासला तय नहीं किया जा सके। कुलमिलाकर 2,558 एकड़ की जमीन पर महाराष्ट्र का पहला औद्योगिक काम्प्लेक्स बन गया। इसका मतलब था समुद्र सतह से ऊपर भारी निर्माण और न सिर्फ गांव वालों के लिए नौकरियां बल्कि मुंबई के दूरदराज के उपनगरों के लिए भी नौकरियां। इस तरह देश के औद्योगिक विकास में तारापुर एक महत्वपूर्ण पड़ाव कहा जा सकता है।

लेकिन, पुरानी पीढ़ी ने खेती जारी रखी, क्योंकि नौकरी चाहने वालों की अधिक संख्या के लिए अधिक खाद्यान्न की जरूरत थी। तब तक बारिश के पानी से धान और गर्मियों में प्राकृतिक रूप से बने तालाब के पानी से सब्जियां उगाना आम चलन था। जमीन का स्तर ऊंचा उठा तो समुद्री सतह भी ऊंची उठी, जिससे ऊंचे-ऊंचे ज्वार आने लगे। यह तारापुर के तटवर्ती समुदायों के लिए चिंता का विषय बन गए। ठीक वैसे जैसे गुजरात के कच्छ या कोकण में हुआ। समुद्र तटों पर तीव्र विकास का आमतौर पर यही नतीजा होता है। संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन संबंधी फ्रेमवर्क कन्वेंशन का भी अनुमान है कि 2100 तक समुद्र की सतह 34.6 इंच बढ़ जाएगी, जिसका परिणाम तटवर्ती भू-जल व वेट लैंड के खारे होने और तटवर्ती समुदायों की बेशकीमती जमीन के पानी में डूबने में होगा। इसलिए कोई अचरज नहीं कि तारापुर की जमीन में समुद्री जल का प्रवेश हो गया। इसका सीधा नतीजा यह हुआ कि आसपास की जमीन खारी हो गई।

जैसे विभिन्न कारणों से गलतियां होती हैं तो महाराष्ट्र सरकार ने भी पर्यावरण के प्रभाव के आकलन का सर्वे किए बिना 1972 में 39 एकड़ राजस्व भूमि गारोदिया साल्ट वर्क्स (जीएसडब्ल्यू) को दे दी। इसके परिणाम जल्द ही सामने आ गए और आसपास के खेतों की उपज लगातार गिरने लगी। नमक के पोखरों के खारे पानी ने भूमिगत पानी को प्रभावित करना शुरू कर दिया। उन मीठे पानी के जलस्रोतों में खारापन बढ़ने लगा।

धीरे-धीरे 1978 आते-आते तारापुर और आसपास के 200 कुंओं में से 175 खारे हो गए और किसान अदालत का दरवाजा खटखटाने पर मजबूर हो गए। खार लैंड डेवलपमेंट सर्कल (केएलडीसी), स्थानीय राजनेता और तारापुर वेजिटेबल ग्रोअर्स एसोसिएशन साथ आए। स्थानीय शिकायतों पर ध्यान देने वाली अदालत लोकायुक्त ने स्वतंत्र जांच के बाद उनके आरोपों की पुष्टि की और उन सबने 1992 में जीएसडब्ल्यू से जमीन वापस छीन ली। नमक का उत्पादन तो रुक गया पर जमीन बेकार पड़ी रही, क्योंकि यह खारी हो गई थी। औद्योगिक प्रदूषण लंबे समय तक बना रहता है, चाहे उद्योग बंद ही क्यों न हो जाएं।

फिर 2012 में केएलडीसी ने समुद्री जल का प्रवेश रोकने के लिए मिट्‌टी का 540 मीटर का बांध बनाया ताकि फिर हासिल की गई 393 एकड़ जमीन को गर्मियों में होने वाले समुद्री जल के प्रवेश से बचाया जा सके। पांच वर्षों तक गांव वाले क्षेत्र को दो भागों में बांटने वाले मौजूदा रोड के स्तर को ऊंचा उठाने पर काम करते रहे। यह काम सिलिंग का हिस्सा था। गांव वालों ने साल्ट-पेन वाले क्षेत्र में बोरिंग का रिचार्ज किया ताकि मीठे पानी का प्रवेश हो सके। स्थानीय उद्योगपतियों और लॉयन्स क्लब ने भू-सुधार का यह काम कम्युनिटी एंड क्लाइमेट रेजिलियन्स प्रोजेक्ट के रूप में शुरू किया। 1,955 मिलीमीटर की औसत सालाना वर्षा से जून 2017 में शुरू करके सिर्फ चार माह में खार की जमीन पानी से लबालब हो गई । तालाब में 45 एकड़ में फैले 15 करोड़ लीटर पानी से आज 15 हजार परिवारों को अपनी सब्जियां उगाने और पेयजल की समस्या सुलझाने में मदद मिल रही है।

फंडा यह है कि  विकास को टाला नहीं जा सकता लेकिन, यदि हम औद्योगिकीकरण को गति देने के पहले प्रकृति के साथ संतुलन बनाएं तो यह ज्यादातर ज़िंदगियों को काफी खुशी दे सकता है।

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in

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Web Title: खुशनुमा दुनिया चाहिए- प्रकृति और विकास में संतुलन बनाएं
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