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जिन्ना की फोटो लगने के पीछे देशद्रोह नहीं करप्शन है

Nagour News - एक समय था जब चुनाव नजदीक आते तो गांव की सड़कों पर पर्चे फेंकती जीपें बढ़ जाती थीं। जिन पर लाउडस्पीकर लगे होते।...

Dainik Bhaskar

May 12, 2018, 06:40 AM IST
जिन्ना की फोटो लगने के पीछे देशद्रोह नहीं करप्शन है
एक समय था जब चुनाव नजदीक आते तो गांव की सड़कों पर पर्चे फेंकती जीपें बढ़ जाती थीं। जिन पर लाउडस्पीकर लगे होते। धीरे-धीरे समय बदला अब चुनाव आते हैं, तो व्हाट्सएप पर मैसेज और यूनिवर्सिटीज में हल्ला बढ़ जाता है। चुनावों के पहले जिस तरह टार्गेट पर विश्वविद्यालय आ रहे हैं, ऐसा लगने लगा है कि चुनावों में मुद्दों को एंट्री भी ग्रेजुएशन करने के बाद मिलती है।

विवाद 80 साल से एएमयू में टंगी जिन्ना की तस्वीर पर है। विवाद होना भी चाहिए, जिस देश में चार साल पहले चुनाव प्रचार तक थ्रीडी होलोग्राम से हो गए थे, वहां पड़ोसी मुल्क के ख़ास आदमी की फोटो टंगी है, ये अफ़सोस की बात है। अगर हम पड़ोस के लोगों की फोटो इस्तेमाल कर रहे हैं तो कम से कम इतने हाईटेक तो नज़र आएं कि उन्हें तस्वीर लगने की तकनीक देख ही जलन हो जाए। और कुछ नहीं तो "जेपीईजी' या "जिफ' फॉर्मेट में ही तस्वीर इस्तेमाल कर लेते। लेकिन इससे भी ज्यादा विवादास्पद चीज एक और है। तस्वीर इतने सालों से टंगी कैसे है, और टंगी भी है तो विवाद बढ़ाने को मिल कैसे गई? याद रखिए हमारे देश की एक यूनिवर्सिटी है, जहां हॉस्टल्स में वाई-फाई नहीं मिलते। एडहॉक में भी ढंग के टीचर नहीं िमलते। गर्मी में वाटरकूलर नहीं मिलता, लाइब्रेरी में नई मैग्जीन नहीं मिलतीं और परीक्षा के दो दिन पहले तक टाइम टेबल नहीं मिलता। ऐसे में जिन्ना की तस्वीर कैसे मिल गई? मेरा मानना है कि ये अलग से शोध का विषय है। एएमयू में ही किसी विद्यार्थी को इस विषय में शोध कर लेना चाहिए कि यूनिवर्सिटी में मौके पर कोई चीज मिली कैसे? हालांकि मुझे पता है कि इस विषय में पीएचडी हो नहीं सकेगी, क्योंकि पीएचडी के लिए गाइड ही नहीं मिलते।

मुझे इसमें गहरे करप्शन की बू जैसी आती है। तस्वीर टंगी है तो तस्वीर के लिए किसी मद से राशि भी जारी हुई होगी। और जितना विश्वविद्यालयों को मैं जानता हूं, एक मद का पैसा उसी काम में लग जाए ऐसा तो हो नहीं सकता। गार्ड के लिए छत का पैसा आता है, तो वीसी की बगिया में घास लग जाती है। लाइब्रेरी में पंखे के पैसे से रजिस्ट्रार का लॉन जगमगाता है। कॉशन मनी के पैसे से प्रोफ़ेसर पेस्ट्री खा जाते हैं, जो बचा तो उसके पैसे से बाबुओं की टीवी रिचार्ज हो जाती है। ऐसे में तस्वीर लग कैसे गई? अगर तस्वीर लगने के पैसे से तस्वीर ही लगी है तो जरूर किसी दूसरे काम में कोई बहुत बड़ा कांड हुआ होगा। सरकार को चाहिए कि जिन्ना को छोड़े, जेम्स बाॅन्ड को बुलाकर पहले इस कांड की जांच करा ले।

मुझे शिकायत यूनिवर्सिटी में नारे लगाते लड़कों से है। मेरा सवाल है, तुम तब कहां रहते हो जब क्लासेज लगती हैं? क्लास के समय जो छात्र पंखे की हवा लगने पर कुम्हला जाते हैं, वही भीषण गर्मी में नारे लगाते समय सन्नी देओल हो जाते हैं। इन्हें देख तकलीफ होती है, इनसे भले तो वही छात्रनेता थे, जो तीसरा विश्वयुद्ध भी कुलपति या रजिस्ट्रार को ज्ञापन सौंप कर टालने का माद्दा रखते थे।



कटाक्ष

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