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अब सिलिकोसिस पीड़ित को पीएचसी-सीएचसी पर मिलेगा उपचार, मोबाइल पर मैसेज व लिंक के बाद तत्काल मुआवजा

3 वर्ष पहले
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सिलिकोसिस जैसी जानलेवा बीमारी की जकड़ में आने के बाद जांच, उपचार और मुआवजे के लिए महीनों तक अस्पतालों के चक्कर काटने वाले श्रमिकों के लिए राहत भरी खबर है। पीड़ित श्रमिकों को भटकना नहीं पड़ेगा। सिलिकोसिस पीड़ित काे पोर्टल से ऑनलाइन आवेदन करना होगा। चिकित्सा विभाग के निर्देश पर अब ग्रामीण क्षेत्र में ही सीएचसी और पीएचसी स्तर पर ही माइनिंग श्रमिकों की स्क्रीनिंग की जा रही है। ताकि न्यूमोकोनोसिस बोर्ड पर भी दबाव कम हो गया है। खनन और मिनरल क्षेत्र में मजदूरी करने के दौरान सिलिकोसिस बीमारी की जांच करवाने के लिए लंबा इंतजार करने की जरूरत भी नहीं होगी और न ही न्यूमोकोनोसिस बोर्ड हर महीने बड़ी संख्या में मरीजों का दबाव रहेगा। सिलिकोसिस के पीड़ित काे पोर्टल के माध्यम से जांच करवाने वाला श्रमिक अगर पॉजिटिव हुआ तो उसके मोबाइल पर मैसेज आएगा, तथा लिंक मुआवजे के लिए डीएमएफटी या कलेक्टर के पास ऑटोमेटिक चला जाएगा। जिस पर सत्यापन के बाद तत्काल मुआवजा जारी कर दिया जाएगा।

पारदर्शिता : समय पर मिलेगा मुआवजा
इस नए तरीके से पारदर्शिता आएगी और श्रमिकों को समय पर मुआवजा मिल सकेगा। बीमारी साबित होने पर श्रमिक को 1 लाख रुपए का मुआवजा जीवन यापन के लिए तथा इस बीमारी से मौत होने पर मृतक के आश्रितों को 3 लाख का मुआवजा दिया जाता है। जिससे मरीजों के लिए समय बचेगा।

रैफर : जांच के बाद बोर्ड के पास भेजेंगे
गांवों में ही पीएचसी व सीएचसी पर जांच होने के बाद श्रमिकों को बोर्ड के पास जांच के लिए रैफर किया जाएगा। माइनिंग क्षेत्र में कार्य करने वाले हर श्रमिक को यह संदेह रहता था कि उसे सिलिकोसिस हो सकता है। ऐसे में बड़ी संख्या में श्रमिक ऑन लाइन जांच के लिए रजिस्ट्रेशन करवा लेते हैं।

रजिस्ट्रेशन : उनका ही रजिस्ट्रेशन होगा जिनके सिलिकोसिस के लक्षण दिखेंगे
ग्रामीण क्षेत्र के प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर तैनात डॉक्टर माइनिंग के कार्य से जुड़े श्रमिकों की स्वास्थ्य केंद्रों पर ही स्क्रीनिंग करेंगे। चिकित्सक सिर्फ उन श्रमिकों का ही रजिस्ट्रेशन करवाएंगे जिनमें सिलिकोसिस के लक्षण दिखाई देंगे।

चुनौती : जांच समय पर पूरी नहीं होती
सारी प्रक्रिया ऑनलाइन होने से ऐसे श्रमिकों की तादाद बहुत ज्यादा हो जाती है जिन्हें सिलिकोसिस होने की संभावना भी नहीं होती। लेकिन ऐसे में उन श्रमिकों की जांच समय पर नहीं हो पाती थी जो वास्तव में सिलिकोसिस पीड़ित होते थे।

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