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शुक्रवार का दिन न्यूजीलैंड के इतिहास में एक काला दिन

Dainik Bhaskar

Mar 17, 2019, 05:26 AM IST

Nagour News - शुक्रवार का दिन न्यूजीलैंड के इतिहास में एक काला दिन था, जब 49 लोगों की नृशंसतापूर्वक गोली मारकर हत्या कर दी गई। इस...

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शुक्रवार का दिन न्यूजीलैंड के इतिहास में एक काला दिन था, जब 49 लोगों की नृशंसतापूर्वक गोली मारकर हत्या कर दी गई। इस घटना से यह पूरा न्यूजीलैंड पीड़ा में है क्योंकि इसे दुनिया के दूसरे सबसे शांत देश होने का सम्मान प्राप्त है। यह वही न्यूजीलैंड है जहां 18 जनवरी 2019 को, यहां की संसद के स्पीकर ने करीब 2400 किलोमीटर दूर स्थित नियू नाम के एक द्वीप के निवासियों के प्रति गहरी संवेदना और दुख व्यक्त किया, क्योंकि वहां पर एक बतख को आवारा कुत्तों ने हमला करके मार डाला था। ट्रेवर नाम की यह बतख न्यूजीलैंड की थी और तूफान में फंसकर 1600 लोगों की आबादी वाले नियू द्वीप पर पहुंच गई थी। वहां पर यह इकलौती बतख थी और इसीलिए दुनिया की सबसे तन्हा बतख कही गई लेकिन मौत से पहले एक साल तक उस द्वीप पर सम्मान के साथ रही। सोचिए, अगर न्यूजीलैंड जैसे देश की सर्वोच्च संसद एक बतख की मौत पर परेशान हो सकती है, तो समझा जा सकता है कि शुक्रवार के कायरतापूर्ण हमले के बाद पूरे देश में क्या स्थिति बनी होगी। दुनिया में ऐसे कुछ ही देश हैं जहां एक भी जिंदगी बचाने के लिए लोग कुछ भी करने को तैयार रहते हैं, फिर भले वह जिंदगी किसी इंसान की हो या फिर एक जानवर की ही क्यों न हो, और न्यूजीलैंड वैसा ही एक दयालु देश है। ऐसा नहीं है कि अन्य देश अपने निवासियों की जिंदगी की परवाह नहीं करते। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां पर उसके लिए खास कोशिशें की जाती हैं।

यही कारण था कि मुझे अपने देश की एक देसी गर्ल का स्मरण हो आया जिसने भी ऐसी ही खास कोशिश की थी। यह 13 मई 2018 का दिन था और जब सारे लोग मदर्स डे का जश्न मना रहे थे, वह लड़की और उसकी टीम के सदस्य चर्म रोग से पीड़ित कुछ आवारा कुत्तों को नहलाने-धुलाने में व्यस्त थे। ये कुत्ते उनकी सोसायटी में ही रहते थे, और वह लड़की उन जैसे सैकड़ों जानवरों को आश्रय देने वाली एक मां के समान है और उसकी सीधी सी सोच है ‘जिसका कोई नहीं उसके लिए मैं हूं।’ कुत्तों की सफाई के बाद, उन सब ने नदी किनारे थोड़ी देर घूमने की सोची। कुछ ही मिनटों में, उसे कुछ लोगों के चीखने-चिल्लाने की आवाज सुनाई दी कि एक आदमी पानी में डूब रहा है। वह एक चट्टान पर खड़े होकर देख रही थी, लेकिन उसे पानी में कोई नजर नहीं आया, न ही हवा के बुलबुले उठते दिखे। उसने तुरंत एक ट्यूब उठाई और गोता लगाकर लोगों के बताए अनुसार डूबे आदमी को ढूंढ़ने लगी।

कुछ देर में ही उसने डूबे आदमी को ढूंढ़ लिया और बाहर खींचकर लाने में कामयाब रही। किनारे पर मौजूद लोगों ने उसे मरा हुआ घोषित कर दिया, लेकिन वह उसे बचाने की कोशिशों में जुट गईं। उसने अपनी हथेली उसके जबड़ों के बीच फंसा दी और उसे जीवन रक्षक सीपीआर (कार्डियो पल्मोनरी रेसीसिटेशन, जिससे बंद धड़कनें फिर चालू हो सकती है) देना शुरू कर दिया। उस आदमी के जबड़े बहुत कसावट के साथ बंद हो रहे थे और उसकी हथेली को बुरी तरह काट रहे थे। एक डेड बॉडी में ऐसा होना स्वाभाविक है क्योंकि मांसपेशियां तेजी से सिकुड़ने लगती हैं। लेकिन उसने हार नहीं मानी। वह उस एक जिंदगी को बचाने के लिए 1 -2 मिनट या 5 मिनट नहीं, बल्कि पूरे 28 मिनट तक जुटी रही। फिर अचानक उस आदमी ने हाथ हिलाया और उसके प्राण लौट आए। अंतत: वह लड़की उस मृतप्राय को बचाने में कामयाब रही। एम्बुलेन्स इस घटना के करीब 50 मिनट के बाद पहुंची, और जांच में पता चला कि उस आदमी को दिल का दौरा पड़ा था और उसकी धड़कन शून्य हो चुकी थी। उस दिन 23 साल का बादल गुजरात के रसूलपुर में महिसागर नदी में डूब कर जान गंवा बैठता अगर उसे वड़ोदरा की उस एनसीसी कैडेट लड़की ने नहीं बचाया होता। आज, बादल सिंगापुर में पढ़ाई कर रहा है और उस लड़की की मदद के लिए एेहसानमंद है। मिलिए 21 साल की भार्गसेतु शर्मा से, जो ह्यूमन्स विद ह्युमैनिटी नामक संस्था की संस्थापक है और न सिर्फ जानवरों को बचाती है बल्कि उसने एनसीसी में 'सी' सर्टिफिकेट प्राप्त किया है और सोशल वर्क में मास्टर्स की पढ़ाई कर रही है, लेकिन उसके दिल में दयालुता भरी है। भार्गसेतु अपने माता-पिता के घर से 10 किमी दूर दादा-दादी के साथ रहती है ताकि उनकी देखभाल कर सके। एक और वजह यह भी है कि उनका घर काफी बड़ा है और इसलिए वहां पर ज्यादा जानवरों को रखकर उनकी सेवा की सकती है। सचमुच वह एक रियल हीरो है और उसने लाखों दिलों को जीता है। वह सेना में जाना चाहती है जिससे कि जिंदगी बचाने की उसकी मुहिम आगे बढ़ती रहे।

फंडा ये है कि एक सच्चा रक्षक ईश्वर से कम नहीं होता, और अगर आपको इस बात पर भरोसा नहीं तो एक बार उनसे जरूर पूछिए जिन्हें ऐसे ही किसी रक्षक ने बचाया है।

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