इधर शहीद की मां का दर्द- मैं कुछ कहूंगी तो

Nagour News - इधर शहीद की मां का दर्द- मैं कुछ कहूंगी तो वो छोटे बेटे को भी मार देंगे डिवीजनल कमांडर आतंकी तारिक मौलवी की मां...

Bhaskar News Network

Mar 17, 2019, 05:45 AM IST
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इधर शहीद की मां का दर्द- मैं कुछ कहूंगी तो वो छोटे बेटे को भी मार देंगे

डिवीजनल कमांडर आतंकी तारिक मौलवी की मां का कहना है उसके बेटे को इतना टॉर्चर किया गया कि उसके पास आतंकी बनने के अलावा कोई और रास्ता ही नहीं बचा था। सेना और पुलिस उन्हें रोज कहती है कि वह अपने बेटे को सरेंडर करने को कहें, पर बेटा मानता ही नहीं है। डाउनटाउन में रहने वाली आबिदा का बेटा 15 साल का है। वह कब कहां जाता है, कितना वक्त किसके साथ गुजारता है, किसी घटना पर वह किस तरह से रिएक्ट करता है, आबिदा हर चीज का हिसाब रखती हैं। कहती हैं- “यही उम्र है जब उसके दिमाग पर कोई छोटी बात भी असर कर सकती है।’ जिस इलाके में वह रहती हैं, वहां पत्थरबाजी आम है। आबिदा हर रोज झूठी-सच्ची कहानियां सुनाकर बेटे से तरह-तरह के सवाल करती हैं। ये जानने के लिए कि कहीं वह कुछ गलत करने के बारे में तो नहीं सोच रहा। इसी डाउनटाउन का वाकया है एहतशाम से जुड़ा। खानयार का रहने वाला एहतशाम अपनी मां के कहने पर सरेंडर करने को राजी हुआ था। मां के ही कहने पर फुटबॉलर से आतंकी बना अनंतनाग का माजिद पिछले साल छोड़ घर लौट आया था। पिछले कुछ सालों में जो भी आतंकी सरेंडर कर लौटा है, वह मां की अपील पर ही लौटा है। हाल के कुछ सालों में ऐसे तीन-चार वाकये हुए हैं। यही वजह है कि जैसे ही किसी युवा के घर से गायब होने और आतंकी बनने की बात पुलिस या आर्मी को पता चलती है, वह सबसे पहले उसके परिवार से उसे बुलाने को कहते हैं। वह परिवारों से मिलकर उन्हें समझाने की कोशिश करते हैं कि आतंक से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला। पर कई बार मां की अपील भी काम नहीं आती। पिछले साल त्राल में एक एनकाउंटर चल रहा था। सेना ने आतंकी की मां को बुलाकर उसे सरेंडर करने को कहा। मां की गुहार आतंकी ने नहीं मानी और मारा गया।

बढ़ रहा विदेशी वेबसाइट से सामान मंगाने का ट्रेंड

उम्मीद है कि देश का बिजनेस-टु-बिजनेस ई-कॉमर्स मार्केट 2020 तक 49 लाख करोड़ का हो जाएगा। यानी 2014 की तुलना में यह 133 फीसदी बड़ा हो जाएगा। देश में कुल ऑनलाइन शॉपिंग करने वाले लोगों में करीब 80 फीसदी ग्राहक फ्लिपकार्ट और अमेजन के हैं। बाकी 20 फीसदी लोग डॉमेस्टिक और विदेशी वेबसाइट्स से शॉपिंग कर रहे हैं। इसमें सबसे बड़ी खिलाड़ी अलीबाबा है। दुनिया के सबसे बड़े ई-रिटेलर अलीबाबा समूह की बिजनेस-टु-बिजनेस शाखा अलीबाबा डॉट कॉम की शुरुआत 1999 में हुई थी। भारत दुनिया में इसका दूसरा सबसे बड़ा मार्केट है। यह सप्लायर को खरीददार से जोड़कर लगभग हर तरह का व्यापार करती है। कुछ समय पहले अलीबाबा डॉट कॉम के ग्लोबल बिजनेस डेवलपमेंट के प्रमुख टिमोथी ल्यूंग ने मीडिया से कहा था कि चीन के बाद भारत ही अलीबाबा डॉट कॉम के लिए सबसे जरूरी बाजार है। अलीबाब अब भारत में लघु और मध्यम उद्योग को बढ़ावा देने के लिए आईसीआईसीआई, कोटक महिंद्रा बैंक, क्रिसिल रेटिंग और टैली जैसी कई संस्थाओं के साथ काम रही है। विदेशी साइट्स से सामान मंगाने के पीछे एक कारण कम कीमतें भी हैं। भारतीय सेलर चीन से उत्पाद मंगाने पर उसमें अपनी मार्जिन, लॉजिस्टिक की लागत और टैक्स आदि जोड़ते हैं, जिससे कीमत बढ़ जाती है। इसके विपरीत चाइनीज सप्लायर प्रोडक्ट को सीधे ग्राहक तक भेज देते हैं, जिससे कस्टम ड्यूटी और शिपिंग चार्ज चुकाने के बाद भी कीमत ज्यादा नहीं बढ़ती है। 5 हजार से कम कीमत के सामान गिफ्ट की श्रेणी में आ जाते हैं, जिससे मौजूदा नियमों के तहत कस्टम ड्यूटी नहीं लगती है।

ये 40 परिवार खुद करते हैं खेती, इनमें डॉक्टर और इंजीनियर जैसे लोग शामिल हैं

उनके युवा हो चुके बच्चों ने वहां पर खुद बीज भी लगाए। वे बताती हैं कि हर रविवार को कुछ परिवार इकट्‌ठे होकर वहां जाते हैं। इससे पिकनिक के साथ ही खेती भी हो जाती है। उन्होंने अब अपने घरों में भी मशरूम की खेती शुरू कर दी है। सभी परिवारों ने 15 हजार रुपए प्रति परिवार इकट्‌ठे किए थे। इसी फंड में से वर्कर्स, लीज वाले की पेमेंट और बीज-खाद आदि का काम करना शुरू किया है। चंडीगढ़, पंचकूला और मोहाली में पांच सेंटर्स पर ये सब्जियां पहुंचती हैं जो सभी परिवारों को नजदीक पड़ता है। गांव से ही आने वाले एक ड्राइवर को इसकी अदायगी की जाती है। सब मिल-जुल कर एक दूसरे तक पहुंचा देते हैं। वंदना कहती हैं कि बाजार से सब्जियां खरीदने पर भी लगभग इतना ही खर्च आता था।

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