महावीर अहिंसा तत्व की साधना करना चाहते थे, इसलिए संयम अाैर तप किया: सुरंजनाश्रीजी

Nagour News - दीर्घ तपस्वी भगवान महावीर के जन्म व उनके कार्य इत्यादि को जानने से पूर्व हम भगवान महावीर के जन्म से करीब ढाई-तीन...

Bhaskar News Network

Apr 17, 2019, 09:15 AM IST
Nagaur News - rajasthan news mahavira wanted to do the practice of non violence so did patience and penance suranjana shreeji
दीर्घ तपस्वी भगवान महावीर के जन्म व उनके कार्य इत्यादि को जानने से पूर्व हम भगवान महावीर के जन्म से करीब ढाई-तीन हजार साल की स्थितियों का अवलोकन करते है।

उस समय भारत की सामाजिक स्थिति अत्यन्त ही विकट थी। जाे संस्थाएं धार्मिक थी वह विद्या के बजाय कर्मकाण्ड पर जोर देती थी। कर्मकाण्डों में यज्ञ की प्रधानता थी। कुछ वर्ग दूसरों को अत्यधिक नीच समझते व उन से घृणा करते थे। राजनैतिक एकता समाप्त हो गई थी प्रत्येक राजा एक दूसरे को कुचल कर अपने राज्य के विस्तार में लगा हुआ था। ऐसी स्थिति में विचारशील व दयालु व्यक्तियों को अत्यधिक व्याकुलता थी। इसी दौरान भगवान महावीर की जन्म भूमि गंगा के दक्षिण में बिहार प्रान्त में उनका जन्म हुआ। जिस प्रान्त को विदेह भी कहा जाता है। भगवान महावीर जाति से क्षत्रिय थे। उन के पिता का नाम सिद्धार्थ व माता का नाम त्रिशला था। भगवान के एक बड़ा भाई व बड़ी बहन अाैर थे। बड़े भाई नन्दीे वर्द्धन व बहन सुदर्शना थी। भगवान महावीर के एक ही प|ि यशाेदाथी व उन के एक ही कन्या प्रियदर्शनी का उल्लेख मिलता है। विचक्षण मणि साध्वी सुरंजनाश्रीजी ने बताया कि भगवान महावीर का ध्येय धार्मिक जीवन मात्र था मगर उन्होंने अपने माता पिता के आग्रह पर अपना निश्चय शिथिल किया आखिर वैवाहिक सम्बन्ध काे स्वीकार किया। तथा बड़े भाई को प्रसन्न रखने के लिए गृहवास की अवधि को भी बढ़ाया। 30 वर्ष की आयु का तरूण क्षत्रिय पुत्र भगवान महावीर ने जब गृह त्याग किया तो उन के आन्तरिक व बाहरी दोनाें जीवन ही बदल गए। सुकुमार ने अपने हाथों से कैश लुंचन किया। सारे वैभवों को छोड़ कर एकाकी जीवन व लघुता स्वीकार कर ली। आजीवन समभाव से रहने का नियम अंगीकार कर लिया। इसी से वह साधक जीवन में महावीर की ख्याति को प्राप्त हुए।

अहिंसा तत्व में ही प्राणी का हित

भगवान महावीर अहिंसा तत्व की साधना करना चाहते थे इस कारण उन्होंने संयम अाैर तप यह दो साधन पसन्द किए। उस समय बलवान व्यक्ति निर्बल का शाेषण करते थे तथा यह प्रमाणित करते थे कि जीव जीव का भक्षण है। ऐसे हालत में सुख की मिथ्या भावना व संकुचित वृति के कारण व्यक्तियों ओर समूहों में अन्तर बढ़ रहा था। इस के फलस्वरूप निर्बल बलवान हो कर बदला लेने का प्रयास भी करते थे। इस तरह हिंसा व प्रति हिंसा का मलीन वायु मण्डल तैयार हो जाता है। हिंसा के इस भयानक स्वरूप के विचार से महावीर भगवान ने अहिंसा तत्व में ही समस्त धर्मों का समस्त कर्तव्यों व प्राणी मात्र का हित देखा।

धर्म समाज

सुरंजनाश्री जी

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