नागरिकता संशोधन बिल का विरोध

Nagour News - नागरिकता संशोधन बिल पर केंद्र सरकार के तमाम आश्वासनों के बावजूद नॉर्थ-ईस्ट में लगातार दूसरे दिन लोगों का...

Dec 11, 2019, 07:22 AM IST
नागरिकता संशोधन बिल पर केंद्र सरकार के तमाम आश्वासनों के बावजूद नॉर्थ-ईस्ट में लगातार दूसरे दिन लोगों का विरोध-प्रदर्शन जारी है। मंगलवार को असम, मणिपुर, त्रिपुरा, मिजोरम, अरुणाचल, मेघालय में प्रदर्शन हुआ। असम में 30 से ज्यादा छोटे-बड़े संगठनों से जुड़े लोग सड़कों पर उतरे। इनमें साहित्यकार, कलाकार, समाजसेवी, व्यापारी, छात्र समेत सभी वर्गाें के लोग शामिल रहे। इस बंद को पिछले 10 साल का नॉर्थ-ईस्ट का सबसे प्रभावी बंद बताया जा रहा है। पहली बार सरकार के खिलाफ इतनी बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरे और कामकाज को ठप रखा। हालांकि, नगालैंड इस विरोध में शामिल नहीं हुआ। वजह- वहां जारी हॉर्नबिल फेस्टिवल है।

पूर्ण नॉर्थ-ईस्ट बंद का प्रभाव वैसे तो सभी राज्यों में देखा गया। पर व्यापक असर असम, त्रिपुरा, अरुणाचल, मेघालय और मणिपुर में ही दिखाई दिया। त्रिपुरा में प्रदर्शन के मद्देनजर 48 घंटे के लिए इंटरनेट और एसएमएस सेवा बैन कर दी गई है। त्रिपुरा में इलाज के लिए ले जा रहे बच्चे की प्रदर्शन में फंसने के चलते मौत हो गई। राज्य में सड़कों पर भीड़भाड़ नहीं दिखी। ज्यादातर बाजार बंद रहे। धलाई जिले में एक बाजार में कुछ दुकानों में प्रदर्शनकारियों ने आग लगा दी। इससे गैर-आदिवासी दुकानदारों में दहशत है। पूरे त्रिपुरा में ट्रेन सेवाओं पर असर पड़ा है। अरुणाचल प्रदेश में शिक्षण संस्थान, बैंक और व्यापारिक संस्थान बंद रहे। सड़कों पर सरकारी वाहन ही नजर आए। यहां ऑल अरुणाचल प्रदेश स्टूडेंट यूनियन ने बंद बुलाया था। सरकारी दफ्तरों में भी कर्मचारियों की संख्या न के बराबर रही। मेघालय के शिलांग में आगजनी की घटनाएं हुईं। ईस्ट खासी हिल्स जिले में पुलिस की गाड़ियों पर पेट्रोल बम फेंके गए।

असम में मंगलवार को 11 घंटे का बंद बुलाया गया था। राज्य के सभी बाजार बंद रहे। डिब्रूगढ़ और जोरहाट में प्रदर्शन के दौरान आगजनी भी हुई। कई दशक बाद असम की सड़कों पर ऐसा सन्नाटा देखने को मिला। इस बंद को देखकर लोगों को 70-80 के दशक में हुए असम आंदोलन की याद आ गई। इस बंद का आह्वान भले ही उत्तर पूर्व छात्रसंघ (नेसो) ने किया था, लेकिन समर्थन नॉर्थ-ईस्ट के सभी संगठनों ने किया। दोपहर तक यह आम लोगों का आंदोलन बन गया। दिनभर सुरक्षाबलों और बंद समर्थकों के बीच तनातनी दिखी। लोगों ने कई शहरों में सड़कों पर टायर जलाकर विरोध किया। पुलिस ने सख्ती की जगह समर्थकों को समझाने की कोशिश की। कुछ जगहों पर हल्के बल का प्रयोग करके भीड़ को तितर-बितर कर दिया। कई जगहों पर प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रीय राजमार्गों पर यातायात ठप कर दिया, कुछ ट्रेनों को भी रोका। 8 ट्रेनें निरस्त की गई हैं।

असम में आम जनता ने बंद को प्रभावी बना दिया। लोग खुद ही घरों से सड़क पर आ गए। उनमें बड़ी संख्या में महिलाएं भी थीं। गुवाहाटी में 11 घंटे के बंद के दौरान चाय-पान की दुकानें तक बंद रहीं। सरकारी बसें भी सड़कों पर नहीं दिखीं। एक हिंदी भाषी दुकानदार ने बताया कि यह अच्छे काम के लिए बंद है, इसलिए आज दुकान नहीं खोली। बंद समर्थकों ने गुवाहाटी में सांसद कुइन ओझा के घर में घुसकर उनका पुलता जलाया।

भास्कर ग्राउंड रिपोर्ट

असम में कलाकार, लेखक, छात्र, समाजसेवी व व्यापारी सड़कों पर उतरेे; 30 संगठन समर्थन में

नॉर्थ-ईस्ट में 10 साल का सबसे प्रभावी बंद; लोग खुद ही सड़कों पर निकले, त्रिपुरा में इंटरनेट बंद

असमिया कलाकार ढोल और नगाड़े के साथ सड़कों पर आए, फिल्म वापस ली

गुवाहाटी में असमिया कलाकार ढोल-नगाड़े के साथ सड़क पर उतर आए। उनमें कई लोकप्रिय गायक, असमिया सिनेमा के फिल्मकार और अन्य कलाकार शामिल थे। गायक जुबिन गर्ग, अभिनेत्री वर्षारानी विषया ने विरोध का आह्वान किया। कलाकारों ने चेतावनी दी है कि यदि बिल को नहीं हटाया गया तो वे जापान के प्रधानमंत्री के गुवाहाटी आगमन पर किसी भी कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लेंगे। निर्देशक जाह्नु बरुवा ने गुवाहाटी में होने वाले फिल्म फेयर पुरस्कार से अपनी फिल्म ‘खुली खिड़की’ वापस ले ली है। लेखक, चित्रकार भी विरोध कर रहे हैं।

विरोध

तस्वीर त्रिपुरा की राजधानी अगरतला की है। यहां महिला संगठनों ने विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया। महिलाओं ने बीच सड़क पर लेटकर प्रदर्शन किया।

बिल के मायने

डर: एनआरसी से बाहर होने वाले 12 लाख हिंदू बंगाली नागरिक बन जाएंगे

नॉर्थ-ईस्ट का एक बड़ा वर्ग इस बात से डरा हुआ है कि नागरिकता संशोधन बिल के पास हो जाने से शरणार्थियों को नागरिकता मिलेगी। इससे उनकी पहचान, भाषा और संस्कृति खतरे में पड़ जाएगी। खासकर असम के लोगों का कहना है कि अगर बिल लागू हो जाता है तो अपने ही प्रदेश में असमिया भाषी अल्पसंख्यक हो जाएंगे। दरअसल, असम में एनआरसी की फाइनल लिस्ट से जिन 19 लाख लोगों को बाहर किया गया है, उनमें करीब 12 लाख हिंदू बंगाली बताए जा रहे हैं।

असम, त्रिपुरा, मेघालय में सबसे ज्यादा असर, गुवाहाटी भाजपा सांसद के घर में पुतला जलाया

बिल लागू होने से बांग्ला भाषी 40% तक पहुंच जाएंगे, असमिया भाषी 36% ही बचेंगे

भरोसा: सरकार कभी असमिया जाति को नुकसान नहीं पहुंचाएगी

असम के सीएम सर्वानंद सोनोवाल ने लोगों को सुरक्षा का यकीन दिलाते हुए कहा कि हमारी सरकार ने कभी असमिया जाति को नुकसान नहीं पहुंचाया है और न ही कभी पहुंचाएगी। हम असमिया भाषी लोगों की सुरक्षा के लिए शुरू से काम कर रहे हैं। आप लोग आंदोलन से असम का भविष्य नहीं बदल सकते। सोनोवाल ने कहा कि कुछ लोग भ्रम फैलाकर राज्य में अराजक स्थिति पैदा करना चाहते हैं। बिल से लोगों को परेशानी नहीं होगी। उनकी सुरक्षा के लिए असम समझौते की धारा-6 को कारगर बना रहे हैं।

असर

हकीकत: असमिया भाषी अकेले बहुसंख्यक, 12% कम हो सकते हैं

असम में बांग्लादेश से आकर बसे बंगाली हिंदू-मुसलमान पहले बंगाली ही लिखते थे, पर बाद में उन्होंने असमिया को अपनी भाषा के तौर पर स्वीकार कर लिया। धीरे-धीरे लिखने पढ़ने भी लगे। राज्य में असमिया बोलने वाले 48% लोग हैं। बंगाली बोलने वाले यदि असमिया छोड़ देते हैं, तो असमिया भाषी 36% ही बचेंगे। जबकि असम में बांग्ला भाषी 28% है। नागरिकता बिल लागू होने से बांग्ला भाषी 40% तक पहुंच जाएंगे। अभी असमिया यहां एकमात्र बहुसंख्यक भाषा है।

गुवाहाटी और डिब्रूगढ़ यूनिवर्सिटी ने परीक्षाएं स्थगित कीं; बसें नहीं चलीं, ट्रेन सेवा भी बाधित

आधी आबादी की भी हिस्सेदारी...

बिल पर बयान

एक लाख श्रीलंकाई तमिलों को भी मिले नागरिकता: रविशंकर


जो समर्थन कर रहा, वह देश पर हमला कर रहा है: राहुल


राजनीति: 2021 के चुनाव से पहले हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण पर फोकस

जानकारों का कहना है कि नागरिकता बिल लागू होने से असम में धार्मिक आधार पर राजनीतिक ध्रुवीकरण भी होगा। स्थानीय और क्षेत्रीय मुद्दों की अहमियत घटेगी। भाजपा और संघ हिंदू राजनीति को आगे कर रहे हैं। इसी एजेंडे से 2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने राज्य में पहली बार सरकार बनाई। 126 में से 60 सीटें जीतीं। उसकी सहयोगी असम गण परिषद ने 14 सीटें जीती हैं। जबकि इससे पहले के चुनाव में भाजपा को राज्य में महज 5 सीटें मिली थीं। अगला चुनाव 2021 में होना है।

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