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गीतों का मालकौंस अौर पार्श्व गायन में अावाज की अय्यारी

2 वर्ष पहले
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सुशोभित सक्तावत ने कुछ यादगार फिल्म गीतों पर विवेचन और अनु चिंतन प्रस्तुत किया है। अपनी किताब ‘माया का मालकौंस’ में लेकिन, किताब सिर्फ मालकौंस आधारित गीतों पर नहीं है। यह माना जाता है कि भगवान शिव क्रोध में तांडव कर रहे थे तब माता पार्वती ने उनके क्रोध को शांत करने के लिए राग मालकौंस का प्रयोग किया था। इसलिए शिव भक्तों का यह प्रिय राग माना जाता है और मालकौंस उसे भी कहते हैं जो गले में सर्प धारण किए है। शंकर-जयकिशन का प्रिय राग भैरवी रहा है, परंतु उन्होंने फिल्म ‘श्री 420’ का ‘रमैया वस्तावैया’ और फिल्म ‘चोरी चोरी’ का ‘ये रात भीगी-भीगी’ गीत रचे हैं, जो मालकौंस से प्रेरित है। राहुल देव बर्मन ने भी फिल्म ‘आंधी’ में ‘इस मोड़ से जाते है कुछ सुस्त कदम रस्ते, कुछ तेज कदम राहें’ मालकौंस से प्रेरित रचा है।

लेखक ने अपने समाज के संकेत भी दिए हैं। मसलन वे लिखते हैं कि फिल्म ‘श्री 420’ के ‘रमैया वस्तावैया’ गीत में झोपड़पट्टी और फुटपाथ पर जीवन बसर करने वाले साधनहीन लोगों के चेहरे खुशी से दमक रहे हैं। मानो वे गरीबी को ठेंगा दिखा रहे हैं, परंतु 2019 में साधनहीन लोगों के चेहरे बुझे हुए दियों की तरह हैं, गोयाकि उन्होंने अब आशा ही छोड़ दी है। कितनी सरकारें आईं और गईं परंतु उनकी हालत बदतर ही होती चली गई।

सुशोभित ने हर गीत के समय पात्र की मनोदशा का वर्णन भी किया है। फिल्मकार पात्र के अवचेतन में प्रतिक्षण हो रहे परिवर्तन को इन गीतों के माध्यम से ही प्रस्तुत करता है। किताब में गीत के पहले गुजरे हुए दृश्य के विवरण के साथ भविष्य में होने वाली घटना का संकेत प्रस्तुत होता है। हर एक क्षण में, विगत, वर्तमान और भविष्य तीनों ही मौजूद हैं। सुशोभित लिखते हैं कि कंठस्वरों का अपना निजी व्यक्तित्व होता है परंतु जिन पात्रों पर गीत फिल्माया जा रहा है उन पात्रों के निजी व्यक्तित्व के अनुरूप उन्हें अपने कंठस्वरों को बदलना होता है। गोयाकि स्वर को अगर चित्रों की तरह मान लें तो एक तस्वीर पर दूसरी तस्वीर सुपर इम्पोज करने की तरह का कार्य किया जाता है। मन्ना डे राज कपूर के लिए पार्श्व गायन करते हैं तो आवाज में प्रेम का भाव उत्पन्न करते हैं और जब डेविड धवन के लिए ‘लपक झपक तू आ रे बदरवा’ गाते हैं तब अपने स्वर को बदल देते हैं। इसी बात को सराहने के लिए हमें रफी साहब को सुनना चाहिए। फिल्म ‘प्यासा’ में रफी साहब ‘ये कूचे ये गलियां’ में गजब की संवेदना प्रस्तुत करते हैं और इसी फिल्म में जॉनी वॉकर पर फिल्मांकित गीत ‘तेल मालिश चंपी’ अलग अंदाज में गाते हैं। गायकों को आवाज की तैयारी करनी होती है।

ज्ञातव्य है कि बाबू देवकीनंदन खत्री के उपन्यासों में जासूस दुश्मन को लखलखा सुंघाकर बेहोश करता है। अय्यार पल-पल में वेश बदलने में माहिर होते हैं। इस प्रक्रिया में वे अपना व्यक्तित्व उसी सहजता से बदलते हैं जैसे आम आदमी अपने कपड़े बदलता है। यूं तो सभी गायक यह करते हैं पर स्वर की अय्यारी में आशा भोसले का जवाब नहीं। पार्श्व गायक-गायिकाएं स्वर के माध्यम से पात्र की मनोदशा की अलग-अलग व्याख्या प्रस्तुत करते हैं। पार्श्व गायन विधा में एक छल यह है कि पात्र की आवाज उन्हें बनना होता है। इस विसंगति को हम आर बाल्की की फिल्म ‘शमिताभ’ में देख चुके। एक गूंगे को अवाम के सामने गाने की महत्वाकांक्षा है तो दूसरा पात्र उसकी आवाज बन जाता है। एक व्यक्ति के पास महत्वाकांक्षा है और दूसरे के पास प्रतिभा। दोनों मिलकर हंगामा बरपाते हैं।

फिल्म ‘चोरी-चोरी’ के गीत ‘ऐसे में कहीं क्या कोई नहीं, भूले से जो हमको याद करें, इक हल्की सी मुस्कान से जो सपनों का जहां आबाद करें’, ये रात भीगी भीगी...’ शैलेन्द्र राग के बीच विराग को लक्ष्य करते हैं, सुख के भीतर दंश को चिह्नते हैं। वे दुनिया-ए-फानी की विवश चेतना के अटूट गीतकार हैं और हर रागात्मकता के तन्मय क्षणों में भी उनकी नज़र संयोग के भीतर वियोग के महान अजर-अमर नियम पर टिकी रहती हैं। किसी बात को वे ‘श्री 420’ के ‘प्यार हुआ इकरार हुआ फिर प्यार से क्यों डरता है दिल।’ में भी अभिव्यक्त कर चुके हैं। शैलेन्द्र ने प्राय: उस अदृश्य तीसरे व्यक्ति को देख लिया है जो दो बेहद नज़दीक आए लोगों के बीच सतत मौजूद रहता है।

यह बड़ी प्रसन्नता की बात है कि फिल्म गीतों की विविध व्याख्याओं पर किताबें प्रकाशित हो रही हैं। कुछ समय पूर्व ही नागपुर में रहने वाले मनोज चोपड़ा का विलक्षण उपन्यास ‘साज और आवाज’ पढ़ा। उन्होंने फिल्म गीतों की रिकॉर्डिंग में सेक्सोफोन बजाने वाले की व्यथा-कथा बखूबी बयान की है और इसमें सेक्सोफोन उपन्यास के पात्र की तरह प्रस्तुत हुआ है। बहरहाल, सुशोभित को सलाह दे रहा हूं कि वे सरल भाषा का प्रयोग करें। आवाम के गीतों पर अवाम की भाषा के द्वारा ही जटिल बातें भी कही जा सकती हैं।



जयप्रकाश चौकसे

फिल्म समीक्षक

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