आत्मा को पोषित करेंगे तो तनाव कम होगा और वह खिल उठेगी

Nagour News - जैसे ही आत्मा शरीर से निकल गई तो शरीर कुछ नहीं कर सकता। सारी जिम्मेदारियां खत्म। बच्चे वहां हैं लेकिन आप उनके लिए...

Bhaskar News Network

Jun 15, 2019, 06:25 AM IST
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जैसे ही आत्मा शरीर से निकल गई तो शरीर कुछ नहीं कर सकता। सारी जिम्मेदारियां खत्म। बच्चे वहां हैं लेकिन आप उनके लिए कुछ नहीं कर सकते। पेड़ पानी बिना नहीं रह सकता, गाड़ी पेट्रोल बिना नहीं चल सकती, शरीर भोजन के बिना नहीं चल सकता, लेकिन आत्मा चलती जा रही है जिसका परिणाम आज हमें दिखाई दे रहा है। हम छोटी-छोटी बातों से नाराज हो जाते हैं, उदास हो जाते हैं क्योंकि बहुत सालों या शायद कई जन्मों से आत्मा को पोषित करना ही भूल गए हैं हम। आत्मा को पोषित कैसे करना है यह हमें मालूम ही नहीं था।

आत्मा को सकारात्मक चिंतन से पोषित करने के बजाय कोई ऐसी चीजें डालनी शुरू कर दीं जो उसके लिए सही नहीं है तो उसका भी परिणाम दिखाई देने वाला है। हम सुबह उठते थे, तैयार होते थे, काम पर जाते थे, शाम को आते थे परिवार के साथ बैठते थे। ऐसा ही जीवन बहुत सालों से चल रहा था। हमें कभी-कभी थोड़ा गुस्सा आ जाता था, कभी हम थोड़े उदास हो जाते थे, फिर हम ठीक हो जाते थे। हम बहुत सारे लोगों के साथ सामंजस्य बैठा लेते थे, कभी-कभी नाराज भी हो जाते थे लेकिन हम वापस उनके साथ हो जाते थे। हां, यह है कि हम रोज सुबह-सुबह पूजा-पाठ करते थे, फिर सारा दिन सामान्य चलता था। सुबह की वो थोड़ी सी पूजा-पाठ भी आत्मा के लिए पोषण थी। मन भी ठीक चल रहा था, शरीर भी ठीक चल रहा था। उस समय इलाज कम होते थे। तब इलाज उतना अच्छा नहीं होता था जितना आज हमारे पास है। लेकिन बीमारियां भी कम थीं। रिश्ते भी अच्छे चल रहे थे। पिछले 50 सालों से हमने भले पोषित नहीं किया लेकिन ज्यादा कुछ गलत भी नहीं खिलाया। अगर हम पिछले 20 साल को देखें तो हमने इसको बहुत ज्यादा गलत खिलाना शुरू किया है।

इससे क्या हुआ कि मन की बीमारियां बढ़ गईं, शरीर की बीमारियां बढ़ गईं, रिश्तों में जो तनाव व कड़वाहट बढ़ता जा रहा है। डिप्रेशन रेट बढ़ गया, हृदय रोग बढ़ गए, तलाक बढ़ गए, दुष्कर्म बढ़ गए। आज के बच्चों पर इतना असर क्यूं हो रहा है सूचनाओं का। बच्चों को स्कूल की पढ़ाई मिल रही है लेकिन आत्मा का पोषण नहीं। छोटी सी उम्र में ही उनके हाथ में फोन हैं, गैजेट्स हैं। वे आज अगर कार्टून भी देख रहे हैं तो उसमें भी हिंसा है। जब ये सारी चीजें आत्मा को बचपन से मिलनी शुरू हो जाएंगी तो आत्मा पोषित कहां होगी। मैंने अपनी सारी जिम्मेदारियां निभाईं लेकिन इससे मेरी आत्मा खुश नहीं है और मैं संघर्ष का जीवन जीती हूं। इससे तो हम पीछे की पीढ़ी को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं।

शहर में प्रदूषण बढ़ रहा है उसे तो हम देखते हैं। उसके लिए समाधान भी ढूंढ़ते हैं लेकिन आत्मा के प्रदूषण के समाधान की तरफ हम ध्यान नहीं देते हैं। अगर हम आत्मा को थोड़े दिन सिर्फ पोषित करना शुरू कर दें तो वह फिर खिल जाएगी। उसका तनाव-अवसाद, बीमारियां ठीक होने लगेंगी, उसके रिश्ते तो बहुत बढ़िया बन जाएंगे।



बी.के. शिवानी, ब्रह्माकुमारी

awakeningwithbks@gmail.com

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