इंसुलिन के दो लाख करोड़ रु. के बाजार पर तीन कंपनियां हावी, सस्ती दवा बनाने की पहल

Nagour News - ओपन इंसुलिन प्रोजेक्ट के फाउंडर डी फ्रेंको काउंटर कल्चर लैब में। कैसे होती है डायबिटीज जब पेनक्रियास खून की...

Dec 01, 2019, 10:22 AM IST
PHEE News - rajasthan news two lakh crores of insulin three companies dominate the market initiative to make affordable medicine
ओपन इंसुलिन प्रोजेक्ट के फाउंडर डी फ्रेंको काउंटर कल्चर लैब में।

कैसे होती है डायबिटीज

जब पेनक्रियास खून की शुगर को नियंत्रित करने वाला हार्मोन इंसुलिन नहीं बनाता या व्यक्ति में हार्मोन के लिए प्रतिरोध पैदा हो जाता है तब डायबिटीज होती है। 1922 में डायबिटीज के इलाज के लिए इंसुलिन के उपयोग की शुरुआत हुई थी। डॉक्टर फ्रेडरिक बेंटिंग और मेडिकल छात्र चार्ल्स बेस्ट ने गाय के पेनक्रियास से एक तत्व निकालकर इंसुलिन बनाई थी।

अमेरिका में 20 दवाइयों के मूल्य कई देशों से तीन गुना अधिक इसलिए साइंटिस्ट आगे आए

ग्रांट बर्निंघम

अमेरिका में बेतहाशा महंगी दवाइयों से लोगों को राहत दिलाने के लिए कई साइंटिस्ट अपने स्तर पर काम कर रहे हैं। कैलिफोर्निया के ओकलैंड में कंप्यूटर साइंटिस्ट डी फ्रेंको का ओपन इंसुलिन प्रोजेक्ट इस खोज में बहुत आगे बढ़ चुका है। इसके प्रमुख साइंटिस्ट 33 वर्षीय फ्रांसीसी बायोकेमिस्ट यान हुओन केरमाडेक हैं। प्रोजेक्ट के साथ कई अन्य साइंटिस्ट जुड़े हैं। ये लैब में बनाए गए खमीर (यीस्ट) की एक कोशिका से इंसुलिन बना रहे हैं। प्रोजेक्ट के पीछे सोच है कि कुछ आम लोग मिलकर स्वयं इंसुलिन बना सकें।

अमेरिका में इंसुलिन सहित कई दवाइयों के मूल्य दूसरे देशों की तुलना में कई गुना ज्यादा हैं। विश्व की 20 प्रमुख दवाइयों की स्टडी में पाया गया कि ब्रिटेन की तुलना में अमेरिका में इनकी कीमतें तीन गुना अधिक हैं। दवाइयों का पेटेंट 20 वर्ष के लिए होता है। दूसरी कंपनियां जेनरिक दवाइयां बना सकती हैं। लेकिन, दवा कंपनियां फार्मूले में थोड़े फेरबदल के साथ नया पेटेंट हासिल कर लेती हैं।

इसलिए कई वैज्ञानिक सस्ती दवाइयों पर रिसर्च कर रहे हैं। दरअसल, कैलिफोर्निया के खाड़ी क्षेत्र की बायोटेक इंडस्ट्री में पुरानी लैब आसानी से कम कीमत में मिलती है। अमेरिकी सरकार ने कुछ समय पहले 19 हजार करोड़ रुपए से जीन सीक्वेंसिंग प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी। अब दवाई की दुकान में करीब 14000 रुपए में यह टेस्ट हो जाता है। उपकरण सस्ते होने के कारण ओपन इंसुलिन प्रोजेक्ट इस काम पर आगे बढ़ सका है।

ओकलैंड स्थित काउंटर कल्चर लैब ने भी महंगी दवाइयां कम मूल्य पर उपलब्ध कराने की चुनौती हाथ में ली है। 2013 में वैज्ञानिकों और कुछ विचारकों ने बायोटेक्नोलॉजी को जनता तक पहुंचाने के लिए लैब की स्थापना की थी। इसमें एक साथ कई प्रोजेक्ट पर काम चलता है। ओपन इंसुलिन प्रोजेक्ट इससे आगे की सोच पर काम कर रहा है। वह इंसुलिन बनाने का तरीका और संबंधित निर्देश सीधे जनता को सौंपेगा। कोई भी व्यक्ति डीआईवाई लैब डालकर इंसुलिन बना सकेगा। यह प्रोजेक्ट अंतिम चरण में है।

केरमाडेक और उनकी टीम ने दो जीन सीक्वेंस लिए। इनमें से एक प्रोटीन बनाता है जिसे काटकर इंसुलिन तैयार हो सकती है। दूसरा जीन एंटीबायोटिक प्रतिरोधी यीस्ट कोशिका पैदा करता है। इनसे डीएनए का एक छोटा गोल टुकड़ा प्लास्मिड बनाया गया है। फिर एक कंपनी से प्लास्मिड की अधिक मात्रा तैयार करवाई गई। इसके बाद इन्हें ओकलैंड स्थित काउंटर कल्चर लैब भेजा। प्लास्मिड को यीस्ट कोशिकाओं में बदलकर उसमें एंटीबायोटिक घोल मिलाया गया। इस मोड़ पर एंटीबायोटिक प्रतिरोधी जीन काम आती है। जो जीन्स प्लास्मिड को अपने डीएनए में स्वीकार कर लेते हैं, वे बच जाते हैं। बाकी मर जाते हैं। अब बची कोशिकाओं से इंसुलिन वाला प्रोटीन बन सकता है।

टीम की सोच है कि वे इंसुलिन बना चुके हैं। लेकिन वे दूसरे वैज्ञानिकों के माध्यम से इसकी पुष्टि करना चाहते हैं। प्रोजेक्ट के फाउंडर डी फ्रेंको का कहना है, किसी ग्रुप के लिए लगभग सात लाख रुपए की लागत से दस हजार लोगों की जरूरत का इंसुलिन बनाने का प्रोजेक्ट शुरू हो सकता है।

(टाइम और टाइम लोगो टाइम के रजिस्टर्ड ट्रेडमार्क हैं। इनका उपयोग अनुबंध के तहत किया गया है।)

पेटेंट और पेचीदा नियमों का सहारा

विश्व में एक लाख 93 हजार करोड़ रु. के इंसुलिन बाजार के अधिकतर हिस्से पर तीन कंपनियों-एली लिली, नोवो नॉरडिस्क, सनोफी- का नियंत्रण है। ये कंपनियां बाजार को अपने हाथ में रखने के लिए पेचीदा नियमों और पेटेंट का सहारा ले रही हैं। अमेरिका में पिछले 60 वर्षों में इंसुलिन के एक वायल का मूल्य 53 रु. से बढ़कर आज 17 हजार रु. से अधिक हो गया है।

अमेरिका में 20 दवाइयों के मूल्य कई देशों से तीन गुना अधिक इसलिए साइंटिस्ट आगे आए

ग्रांट बर्निंघम

अमेरिका में बेतहाशा महंगी दवाइयों से लोगों को राहत दिलाने के लिए कई साइंटिस्ट अपने स्तर पर काम कर रहे हैं। कैलिफोर्निया के ओकलैंड में कंप्यूटर साइंटिस्ट डी फ्रेंको का ओपन इंसुलिन प्रोजेक्ट इस खोज में बहुत आगे बढ़ चुका है। इसके प्रमुख साइंटिस्ट 33 वर्षीय फ्रांसीसी बायोकेमिस्ट यान हुओन केरमाडेक हैं। प्रोजेक्ट के साथ कई अन्य साइंटिस्ट जुड़े हैं। ये लैब में बनाए गए खमीर (यीस्ट) की एक कोशिका से इंसुलिन बना रहे हैं। प्रोजेक्ट के पीछे सोच है कि कुछ आम लोग मिलकर स्वयं इंसुलिन बना सकें।

अमेरिका में इंसुलिन सहित कई दवाइयों के मूल्य दूसरे देशों की तुलना में कई गुना ज्यादा हैं। विश्व की 20 प्रमुख दवाइयों की स्टडी में पाया गया कि ब्रिटेन की तुलना में अमेरिका में इनकी कीमतें तीन गुना अधिक हैं। दवाइयों का पेटेंट 20 वर्ष के लिए होता है। दूसरी कंपनियां जेनरिक दवाइयां बना सकती हैं। लेकिन, दवा कंपनियां फार्मूले में थोड़े फेरबदल के साथ नया पेटेंट हासिल कर लेती हैं।

इसलिए कई वैज्ञानिक सस्ती दवाइयों पर रिसर्च कर रहे हैं। दरअसल, कैलिफोर्निया के खाड़ी क्षेत्र की बायोटेक इंडस्ट्री में पुरानी लैब आसानी से कम कीमत में मिलती है। अमेरिकी सरकार ने कुछ समय पहले 19 हजार करोड़ रुपए से जीन सीक्वेंसिंग प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी। अब दवाई की दुकान में करीब 14000 रुपए में यह टेस्ट हो जाता है। उपकरण सस्ते होने के कारण ओपन इंसुलिन प्रोजेक्ट इस काम पर आगे बढ़ सका है।

ओकलैंड स्थित काउंटर कल्चर लैब ने भी महंगी दवाइयां कम मूल्य पर उपलब्ध कराने की चुनौती हाथ में ली है। 2013 में वैज्ञानिकों और कुछ विचारकों ने बायोटेक्नोलॉजी को जनता तक पहुंचाने के लिए लैब की स्थापना की थी। इसमें एक साथ कई प्रोजेक्ट पर काम चलता है। ओपन इंसुलिन प्रोजेक्ट इससे आगे की सोच पर काम कर रहा है। वह इंसुलिन बनाने का तरीका और संबंधित निर्देश सीधे जनता को सौंपेगा। कोई भी व्यक्ति डीआईवाई लैब डालकर इंसुलिन बना सकेगा। यह प्रोजेक्ट अंतिम चरण में है।

केरमाडेक और उनकी टीम ने दो जीन सीक्वेंस लिए। इनमें से एक प्रोटीन बनाता है जिसे काटकर इंसुलिन तैयार हो सकती है। दूसरा जीन एंटीबायोटिक प्रतिरोधी यीस्ट कोशिका पैदा करता है। इनसे डीएनए का एक छोटा गोल टुकड़ा प्लास्मिड बनाया गया है। फिर एक कंपनी से प्लास्मिड की अधिक मात्रा तैयार करवाई गई। इसके बाद इन्हें ओकलैंड स्थित काउंटर कल्चर लैब भेजा। प्लास्मिड को यीस्ट कोशिकाओं में बदलकर उसमें एंटीबायोटिक घोल मिलाया गया। इस मोड़ पर एंटीबायोटिक प्रतिरोधी जीन काम आती है। जो जीन्स प्लास्मिड को अपने डीएनए में स्वीकार कर लेते हैं, वे बच जाते हैं। बाकी मर जाते हैं। अब बची कोशिकाओं से इंसुलिन वाला प्रोटीन बन सकता है।

टीम की सोच है कि वे इंसुलिन बना चुके हैं। लेकिन वे दूसरे वैज्ञानिकों के माध्यम से इसकी पुष्टि करना चाहते हैं। प्रोजेक्ट के फाउंडर डी फ्रेंको का कहना है, किसी ग्रुप के लिए लगभग सात लाख रुपए की लागत से दस हजार लोगों की जरूरत का इंसुलिन बनाने का प्रोजेक्ट शुरू हो सकता है।

(टाइम और टाइम लोगो टाइम के रजिस्टर्ड ट्रेडमार्क हैं। इनका उपयोग अनुबंध के तहत किया गया है।)

अमेरिका में 20 दवाइयों के मूल्य कई देशों से तीन गुना अधिक इसलिए साइंटिस्ट आगे आए

ग्रांट बर्निंघम

अमेरिका में बेतहाशा महंगी दवाइयों से लोगों को राहत दिलाने के लिए कई साइंटिस्ट अपने स्तर पर काम कर रहे हैं। कैलिफोर्निया के ओकलैंड में कंप्यूटर साइंटिस्ट डी फ्रेंको का ओपन इंसुलिन प्रोजेक्ट इस खोज में बहुत आगे बढ़ चुका है। इसके प्रमुख साइंटिस्ट 33 वर्षीय फ्रांसीसी बायोकेमिस्ट यान हुओन केरमाडेक हैं। प्रोजेक्ट के साथ कई अन्य साइंटिस्ट जुड़े हैं। ये लैब में बनाए गए खमीर (यीस्ट) की एक कोशिका से इंसुलिन बना रहे हैं। प्रोजेक्ट के पीछे सोच है कि कुछ आम लोग मिलकर स्वयं इंसुलिन बना सकें।

अमेरिका में इंसुलिन सहित कई दवाइयों के मूल्य दूसरे देशों की तुलना में कई गुना ज्यादा हैं। विश्व की 20 प्रमुख दवाइयों की स्टडी में पाया गया कि ब्रिटेन की तुलना में अमेरिका में इनकी कीमतें तीन गुना अधिक हैं। दवाइयों का पेटेंट 20 वर्ष के लिए होता है। दूसरी कंपनियां जेनरिक दवाइयां बना सकती हैं। लेकिन, दवा कंपनियां फार्मूले में थोड़े फेरबदल के साथ नया पेटेंट हासिल कर लेती हैं।

इसलिए कई वैज्ञानिक सस्ती दवाइयों पर रिसर्च कर रहे हैं। दरअसल, कैलिफोर्निया के खाड़ी क्षेत्र की बायोटेक इंडस्ट्री में पुरानी लैब आसानी से कम कीमत में मिलती है। अमेरिकी सरकार ने कुछ समय पहले 19 हजार करोड़ रुपए से जीन सीक्वेंसिंग प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी। अब दवाई की दुकान में करीब 14000 रुपए में यह टेस्ट हो जाता है। उपकरण सस्ते होने के कारण ओपन इंसुलिन प्रोजेक्ट इस काम पर आगे बढ़ सका है।

ओकलैंड स्थित काउंटर कल्चर लैब ने भी महंगी दवाइयां कम मूल्य पर उपलब्ध कराने की चुनौती हाथ में ली है। 2013 में वैज्ञानिकों और कुछ विचारकों ने बायोटेक्नोलॉजी को जनता तक पहुंचाने के लिए लैब की स्थापना की थी। इसमें एक साथ कई प्रोजेक्ट पर काम चलता है। ओपन इंसुलिन प्रोजेक्ट इससे आगे की सोच पर काम कर रहा है। वह इंसुलिन बनाने का तरीका और संबंधित निर्देश सीधे जनता को सौंपेगा। कोई भी व्यक्ति डीआईवाई लैब डालकर इंसुलिन बना सकेगा। यह प्रोजेक्ट अंतिम चरण में है।

केरमाडेक और उनकी टीम ने दो जीन सीक्वेंस लिए। इनमें से एक प्रोटीन बनाता है जिसे काटकर इंसुलिन तैयार हो सकती है। दूसरा जीन एंटीबायोटिक प्रतिरोधी यीस्ट कोशिका पैदा करता है। इनसे डीएनए का एक छोटा गोल टुकड़ा प्लास्मिड बनाया गया है। फिर एक कंपनी से प्लास्मिड की अधिक मात्रा तैयार करवाई गई। इसके बाद इन्हें ओकलैंड स्थित काउंटर कल्चर लैब भेजा। प्लास्मिड को यीस्ट कोशिकाओं में बदलकर उसमें एंटीबायोटिक घोल मिलाया गया। इस मोड़ पर एंटीबायोटिक प्रतिरोधी जीन काम आती है। जो जीन्स प्लास्मिड को अपने डीएनए में स्वीकार कर लेते हैं, वे बच जाते हैं। बाकी मर जाते हैं। अब बची कोशिकाओं से इंसुलिन वाला प्रोटीन बन सकता है।

टीम की सोच है कि वे इंसुलिन बना चुके हैं। लेकिन वे दूसरे वैज्ञानिकों के माध्यम से इसकी पुष्टि करना चाहते हैं। प्रोजेक्ट के फाउंडर डी फ्रेंको का कहना है, किसी ग्रुप के लिए लगभग सात लाख रुपए की लागत से दस हजार लोगों की जरूरत का इंसुलिन बनाने का प्रोजेक्ट शुरू हो सकता है।

(टाइम और टाइम लोगो टाइम के रजिस्टर्ड ट्रेडमार्क हैं। इनका उपयोग अनुबंध के तहत किया गया है।)

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