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अनूठी परंपराएं

तीज-त्योहारों वाले मेवाड़ में 13 दिन रहता है रंग पर्व सिटी रिपोर्टर | उदयपुर तीज-त्योहारों वाले मेवाड़ में...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 04, 2018, 03:55 AM IST

अनूठी परंपराएं
तीज-त्योहारों वाले मेवाड़ में 13 दिन रहता है रंग पर्व

सिटी रिपोर्टर | उदयपुर

तीज-त्योहारों वाले मेवाड़ में होली से जुड़ी परंपराएं भी कम अनूठी नहीं हैं। होलिका दहन के दूसरे दिन जहां देश में अधिकांश जगह धुलंडी पर रंग खेलने के साथ ही रंगोत्सव खत्म हो जाता है, वहीं मेवाड़ में 13 दिन तक रंग खेलने की परंपरा है। यहां अलग-अलग जगह खेली जाने वाली होली के रंग भी सबसे हटकर रहते हैं। धुलंडी के बाद होली खेलने के पीछे मान्यता है कि मेवाड़ राजपरिवार में दशकों पहले शोक हो जाने के कारण धुलंडी के दिन रंग नहीं खेला जाता। जमरा बीज पर मेनार में तलवारों की गेर, वल्लभनगर में ईलाजी की बारात और कपासन, आमेट में धुलंडी पर ईलाजी की बारात तो गंगरार के सोनियाणा में लठ मार होली अलग ही पहचान रखती है।

कपासन (चित्तौड़गढ़) में शीतला अष्टमी की दोपहर चारभुजा मंदिर से निकासी के बाद ईलाजी की बारात निकलती है। एक पात्र ईलाजी का रूप धरे सिर पर पगड़ी व कलंगी धारण किए लाल ध्वजा थामे चलता है। नाचती-गाती बारात बाजार पुलिस चौकी पहुंचती हैं, यहां सरकार के प्रतिनिधि के रूप में पुलिसकर्मियों को खुला फाग सुनाया जाता है। मेवाड़ रियासत के समय कपासन जिला होता था। दरबार के प्रतिनिधि को दाणी कहा जाता था। उनके साथ होली खेलने की परंपरा तब से चली आ रही है। बारात का समापन पुरानी कचहरी पर जाकर होता है। इसी तरह, आमेट में जयसिंह श्याम मंदिर से बारात निकाली जाती है।

जमरा बीज पर वल्लभनगर में निकली ईलाजी की बरात, मेनार में तलवारों की रमे जबरी गेर, तेरस पर चारभुजा गढ़बोर में थमेगा रंगों का उत्सव, चैत्र में भरेंगे मेले

नाथद्वारा में निकलती हैबादशाह की सवारी

गंगरार : बरसाने की तर्ज पर लठ मार होली

मेवाड़ में भी होली के बाद मथुरा के पास राधा के गांव बरसाने की तर्ज पर लठ मार होली खेली जाती है। चित्तौड़गढ़ जिले में गंगरार क्षेत्र स्थित सोनियाणा में लठ मार होली खेली जाती है। हालांकि वक्त के साथ परंपरा में कमी आ रही है। गांव के लोग शाम को एक जगह इकट्ठा होते हैं। महिलाएं लठ लेकर पुरुषों को मारने की रस्म अदा करती हैं।

श्रीजी की नगरी नाथद्वारा में बादशाह की सवारी विभिन्न बाजारों में होती हुई निकलती है। सवारी में लोग नाचते-गाते चलते हैं। ये सवारी मंदिर की चौखट पर पहुंचती है। चारभुजा में भी एक पखवाड़े तक फाग महोत्सव मनाया जाता है।

बांसवाड़ा-भीलवाड़ा में खेलते हैं कोड़ामार होली

मेवाड़ का हिस्सा रहे भीलवाड़ा में जीनगर समाज कोड़ामार होली खेलता है। वहीं बांसवाड़ा में भी इसी तरह की होली खेली जाती है। महिलाएं पुरुषों को गीले कोड़े मारती हैं।

होली के लगाते सात फेरे, करते हैं गेर नृत्य : प्रतापगढ़ के बारावरदा, मेरियाखेड़ी, मधुरा तालाब, नकोर में आदिवासी पिछले 100 साल से धुलंडी पर पारंपरिक वाद्य यंत्रों पर गेर रमते हैं। एक साल में नव विवाहितों को धुलंडी पर सज-धजकर होली के फेरे लगाकर गेर रमना होता है। मान्यता है कि ऐसा करने से दांपत्य जीवन खुशहाल होता है। गमी वाले परिवार भी धुलंडी को सात फेरे लेकर शोक खत्म करते है।

गंगरार : धूल उड़ाकर खेली जाती है होली

चित्तौड़गढ़ के गंगरार में भी पूर्बिया समाज की ओर से शीतला सप्तमी को गेर निकालकर होली खेली जाती है। कस्बे में गेर निकालकर समाज के परिवारों से मेल-जोल किया जाता है। पहले धूल के ढेर लगाकर उसको एक-दूसरे पर उछालते हैं। हालांकि अब धूल की होली महज रस्म रह गई है।

ईलाजी की राख की होली बदली रंगों की होली में

कहा जाता है कि होलिका का विवाह ईलाजी से होने वाला था। ईलाजी ने सुना कि होलिका अग्नि-स्नान करते समय जल मरी है, तो बड़ा दुख हुआ। वे होलिका की चिता के पास जा पहुंचे और इसकी राख शरीर पर मल मिट्टी में लोट-पोट होने लगे। बारातियों के पानी डालने पर भी ईलाजी नहीं माने। ईलाजी के इसी पागलपन को लोग होली के दिन रंगों की होली के रूप में साकार करते हैं। ईलाजी फागुन के देवता कहलाने लगे। कई जगह ईलाजी के ही रूप में राजस्थानी रसिये को दूल्हे के वेश में सजाकर गली चौराहों पर हंसी-ठिठोली होती है। डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, इतिहासविद्

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Web Title: अनूठी परंपराएं
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