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यहां बस रहा है 'विधवाओं का गांव', 24 घंटे ऑक्सीजन लगाए रहते हैं मर्द

राजस्थान के भीलवाड़ा में दिखा माइनिंग के आफ्टर इफेक्ट्स का खौफनाक चेहरा।

Dainik Bhaskar

Mar 09, 2018, 01:46 PM IST
Villages destroyed by mining in rajasthan due to serious lung illness

भीलवाड़ा. राजस्थान के जिला भीलवाड़ा के 8 गांव सिलिकॉसिस जैसी गंभीर बीमारी से ग्रसित हैं। अधिकतर मजदूरी करके पेट पालने वाले इन गांवों के पुरुषों की जिंदगी आधी हो गई है। प्रॉब्लम इतनी सीरियस है कि इन गांवों को लोग 'विधवाओं का गांव' कहने लगे हैं। आखिर ऐसा क्या हो गया है इन गांवों को कि अचानक सिर्फ पुरुषों की मौतें हो रही हैं? Dainik Bhaskar की पड़ताल में प्रशासनिक अधिकारियों की गंभीर लापरवाही सामने आई है।


सिलेंडर के सहारे गांववाले

- भीलवाड़ा जिले के आसींद व बदनौर की 8 ग्राम पंचायत में रहने वाले लोग सिलिकॉसिस से जूझ रहे हैं। उन्हें सांस लेने के लिए भी 48 घंटे ऑक्सीजन सिलेंडर चाहिए होता है, इसका खर्च 15 हजार प्रति माह है। सिलेंडर खत्म तो समझो सांसें भी खत्म।
- घर के बीमार सदस्यों को जिंदा रखने के लिए परिवारों ने अपने घर, खेत और गहने आदि सब गिरवी रखवा दिए हैं। लेकिन जरूरत इतनी महंगी है कि सबकुछ बिक जाने के बाद भी जिंदगी नहीं बच पा रही।
- हालत यह है कि बच्चों की पढ़ाई छुड़वाकर उनसे मजदूरी करवाई जा रही है, जिससे घर का चूल्हा जल सके।

क्या है यह सिलिकॉसिस?

- भीलवाड़ा जिला सिलिकॉसिस प्रभावित प्रदेश के 10 जिलों में एक है। जिले के बिजौलिया मांडलगढ़ में बड़ी मात्रा में खनन होता है। इसलिए यहां इस बीमारी के मरीजों की संख्या ज्यादा है।
- सिलिकॉसिस फेंफड़ों की बीमारी है, जो कि फेंफड़ों में सिलिका जमा होने की वजह से होती है। खनन के दौरान उड़ने वाली धूल के कणों में सिलिका मौजूद होता है। अधिक देर तक उसके संपर्क में रहने से यह सांस के जरिए फेंफड़ों में जमा होने लगता है। धीरे-धीरे फेंफड़ों की ऑक्सीजन सप्लाई की कैपेसिटी कम होने लगती है और मरीज का वजन तेजी से घटता है।
- इस बीमारी का इलाज काफी महंगा होता है, जिसे गरीब मजदूर वहन नहीं कर पाते। सबसे आसान रास्ता ऑक्सीजन सिलेंडर ही बचता है, जिससे आर्टिफीशियली शरीर को ऑक्सीजन सप्लाई की जाती है। यूं कहें कि यह बीमारी धीरे-धीरे मरीज का दम घोंट देती है।

प्रशासन कैसे है जिम्मेदार

- सिलिकॉसिस की वजह खदानों में काम करते समय उड़ने वाली धूल है। इन क्षेत्रों में नियमों के विरुद्ध जाकर ड्राय ड्रिलिंग हो रही है। इस प्रॉसेस में धूल ज्यादा उड़ती है जो कि प्राणघातक है।
- सरकारी नियमों के मुताबिक पानी के साथ ड्रिलिंग की जानी चाहिए ताकि धूल न उड़े। सूखी ड्रिलिंग पर खनन पट्टा निरस्त करने का नियम है।
- यहां सरकारी अफसर खदानों का इंस्पेक्शन नहीं करते और ठेकेदार नियम तोड़ते हुए खनन करते रहते हैं। इसका हर्जाना गरीब मजदूरों को अपनी जान गंवाकर भरना पड़ रहा है।

महिलाएं और बच्चे करते हैं काम, तब जाकर आती है दवा

- भास्कर टीम ने काछिया का बाड़िया, प्रतापपुरा व ओझियाणां गांव में इसकी पड़ताल की तो ज्यादातर गांवों में महिलाएं व बच्चे ही जीवित हैं।
- जहां पुरुष जीवित हैं भी उनमें से ज्यादातर का शरीर इतना कमजोर है कि 10 कदम भी चल नहीं सकते।
- परिवारों की जिम्मेदारी मासूमों पर है। स्कूल जाने के बजाय होटलों पर काम कर रहे हैं।
- ओझियाणा का 31 वर्षीय गोपाल सिंह चार साल से मौत से जूझ रहा है। बिजौलिया में 15 साल माइंस पर काम किया। अब सिलिकॉसिस से शरीर में कमजोरी इतनी आ गई कि पलंग से उतर तक नहीं सकता।
- 24 घंटे ऑक्सीजन सिलेंडर की नली लगी रहती है। ऑक्सीजन नहीं मिले तो जान चली जाए। यही हाल 37 वर्षीय दयाल सिंह का है।
- एक सिलेंडर का खर्च एक हजार रुपए होता है। गोपाल की पत्नी नर्बदा सेवा में जुटी है तो दवा खर्च के लिए मासूम बेटे को पाली में होटल पर काम करना पड़ रहा है।
- सिलेंडर मंगाने के लिए पैसा नहीं था तो पत्नी ने गहने गिरवी रख दिए। बैंक से डेढ़ लाख और साहूकार से 1.75 लाख रुपए कर्ज लिया।
- स्थिति यह हो गई कि 6 महीने का बिजली बिल भी जमा नहीं हो पाया। ऐसे में बिजली निगम ने कनेक्शन काट दिया।

हॉस्पिटल में सिलिकॉसिस को लिख देते हैं सिर्फ TB

- खनन और सिलिकॉसिस आपस में जुड़े हैं। इसी वजह से सरकार ने इस बीमारी से जूझने वाले मजदूरों के लिए 1 लाख रुपए की सहायता और मौत होने पर 3 लाख रुपए का मुआवजा तय कर रखा है।
- यहां रहने वाले लोगों का कहना है कि सरकारी डॉक्टर इसमें धांधली करते हैं। वे सिलिकॉसिस होने या उससे मौत होने पर कोई बीमारी का प्रमाण-पत्र नहीं देते। इसकी जगह टीबी बताकर उसका इलाज दिखाते हैं।
- प्रतापुरा के नारायण पुत्र गंगाराम गुर्जर बताते हैं, "बीमारी की वजह से मेरी उम्र 60 साल जितनी लगने लगी है। 10 बार अस्पताल गया, लेकिन इलाज नहीं हो पाया। डॉक्टर टीबी बता दवा लिख देते हैं। टीबी की दवा ले चुका हूं, लेकिन बीमारी ठीक नहीं हो रही।"
- वहीं बीमारी की वजह से अपने पति खो चुकी कई विधवाएं ऐसी हैं, जिन्हें पेंशन तक नहीं मिल रही है। अधिकारी-कर्मचारी चक्कर कटवाते हैं।

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