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फिल्म में रानी पद्मावती, खिलजी के किरदार और घूमर पर क्यों है एतराज?

पदमिनी ने शौर्य, बलिदान और वीरता की अमर कहानी छोड़ी है। इतिहासकार और ग्रंथ के माध्यम से जानें...

Danik Bhaskar | Nov 17, 2017, 12:01 AM IST

भीलवाड़ा/चित्तौड़गढ़. संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्‌मावती रिलीज से पहले विवादों में है। फिल्म के कुछ हिस्सों को रानी पद्मिनी (पद्मावती) का अपमान माना जा रहा है। मेवाड़ सहित देशभर से यह आवाज उठ रही है कि फिल्म में कुछ ऐसी बातें शामिल की गई हैं, जो बेबुनियाद हैं। करणी सेना के चीफ लोकेंद्र सिंह कालवी ने तो यह कह दिया है, "हम 1 दिसंबर को यह फिल्म रिलीज नहीं होने देंगे। ये जौहर की ज्वाला है, आगे बहुत कुछ जलेगा। रोक सको तो रोक लो।" विवाद और विरोध के बीच दैनिक भास्कर ने इतिहास के जानकारों, संदर्भ ग्रंथों और प्रचलित कहानियों से जाना कि आखिर सच्चाई क्या है? फिल्म से जुड़े 5 विवाद क्या हैं और उनके पीछे की हकीकत क्या है?

1) क्या हकीकत में थीं रानी पद्मावती?

(दैनिक भास्कर ने इतिहासकारों से अलग-अलग ग्रंथों के आधार पर बात की तो ये तथ्य निकले)

पद्मावती कोरी कल्पना नहीं

- पद्मावती को लेकर अलग-अलग मत हैं। अभी तक यही माना जाता रहा है कि पद्‌मिनी का जिक्र सबसे मलिक मोहम्मद जायसी ने अपनी रचना ‘पद‌्मावत’ में किया था। लेकिन इतिहास में इसके अलावा भी कुछ और है। कई तथ्यों को खोजने के बाद इतिहासकार पद्‌मिनी को कोरी कल्पना नहीं मान रहे हैं।

- मीरा शोध संस्थान से जुड़े चितौड़गढ़ के प्रो. सत्यनारायण समदानी बताते हैं कि जायसी की रचना 1540 की है। जायसी सूफी विचारधारा के थे, जो अजमेर दरगाह आया करते थे। इसी दौरान उन्होंने कवि बैन की कथा को सुना, जिसमें पद्‌मिनी का उल्लेख था। इसका मतलब साफ है कि जायसी से पहले कवि हेतमदान की ‘गोरा बादल’ कविता से भी जायसी ने अंश लिए थे।

छिताई चरित : जायसी की पद्मावत से 14 साल पहले लिखी गई

- प्रो. समदानी बताते हैं कि ‘छिताई चरित’ ग्वालियर के कवि नारायणदास की रचना थी। इस हस्तलिखित ग्रंथ के संपादक ग्वालियर के हरिहरनाथ द्विवेदी आैर इनके अलावा अगरचंद नाहटा ने भी इसका रचनाकाल 1540 से पहले का माना है। अलाउद्‌दीन खिलजी ने देवगिरी पर आक्रमण किया था। वह वहां की रानी को पाना चाहता था।

- ‘छिताई चरित’ में बताया गया है कि देवगिरी पर आक्रमण के समय अलाउद्‌दीन राघव चेतन को कहता है कि मैंने चित्तौड़ में पद्‌मिनी के होने की बात सुनी। वहां के राजा रतन सिंह को बंदी बनाया, लेकिन बादल उसे छुड़ा ले गया।

जायसी ने लिखा- पद्मावती बहुत सुंदर थीं, खिलजी बहक गया...

सूफी कवि मलिक मोहम्मद जायसी ने मूल घटना के सवा दो सौ साल बाद बाद काव्य रूप में ‘पद्मावत’ लिखी थी। कई लोग मानते हैं कि इसमें हकीकत के साथ कल्पना भी शामिल है। जायसी ने लिखा कि पद्मावती सुंदर थी। खिलजी ने उनके बारे में सुना तो देखना चाहा। खिलजी की सेना ने चित्तौड़ को घेर लिया। रतन सिंह के पास संदेश भिजवाया- पद्मावती से मिलवाओ तो बिना हमला किए चितौड़ छोड़ दूंगा। रतन सिंह ने पद्मावती को बताया। रानी राजी नहीं थीं। अंत में जौहर कर लिया।

इतिहासकार मानते हैं- रानी पद्मावती थीं, लेकिन...

- हिस्ट्री रिसर्चर और चित्तौड़ पीजी कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल डाॅ. ए.एल. जैन कहते हैं कि देबारी में 1359 माग पंचमी बुधवार का शिलालेख मिला था। इसमें रतन सिंह का साफ जिक्र है। सुल्तान के साथ पद्मिनी और रतन सिंह की कथा पूरे मध्यकाल में प्रचलित रही है।

- चित्तौड़गढ़ के जौहर स्मृति संस्थान से जुड़े नरपतसिंह भाटी कहते हैं- खिलजी को रानी पद्मिनी कांच मेंं दिखाने जैसी बात बकवास है। उस जमाने में कहां कांच आ गए? उनके प्रेम प्रसंग जैसे दृश्य कैसे दिखाए जा सकते हैं?

2) ऐसे व्यक्ति को हीरो बता रहे हैं जो हमलावर था

जौहर संस्था से जुड़े चित्तौड़गढ़ के कर्नल रणधीर सिंह बताते हैं- फिल्म में खिलजी को नायक बताया है और पद्मिनी को नायिका। जबकि राजा रतनसिंह की अहमियत खत्म कर दी है। यही इतिहास से छेड़छाड़ है। आखिर एक हमलावर नायक कैसे हो सकता है?

हकीकत : प्रो. सत्यनारायण समदानी सहित चित्तौड़ के अन्य इतिहासकारों का मानना है कि खिलजी किसी भी सूरत में नायक नहीं हो सकता है। छिताई चरित में उल्लेख है कि रणथंभौर, चित्तौड़गढ़ और देवगिरी पर हमले उसने सिर्फ इसलिए किए, ताकि अपनी फौज के बूते महिलाओं को हासिल कर सके। ऐसे में, वह चरित्र का ठीक नहीं था। इतिहासकार बताते हैं कि आक्रांता को जबर्दस्ती नायक बनाया जा रहा है जो बर्दाश्त के काबिल नहीं है।

3) घूमर नृत्य नहीं सम्मान

फिल्म के एक गाने में घूमर नृत्य दिखाया है। इसमें किरदार आम डांसर जैसा है। राजपूतों को यह किसी भी सूरत में कबूल नहीं है।

हकीकत : कर्नल सिंह और अन्य राजपूत नेताओं के मुताबिक, घूमर अदब का प्रतीक है और इसका इतिहास भी कुछ समय ही पुराना है। यूं भी महिलाएं घूमर नृत्य सबके सामने नहीं करती हैं। यह परिवारों में होने वाला आयोजन है। ऐसे में यह तो कतई मुमकिन नहीं है कि कोई रानी ऐसा नृत्य करे। फिल्म में संगीत-नृत्य के जरिए राजस्थानी संस्कृति और रानी पद्‌मावती के इतिहास से छेड़छाड़ की कोशिश की गई है।

(कंटेंट: निरंजन शुक्ला, मनोज शर्मा, राकेश पटवारी, राजनारायण शर्मा)

आगे की स्लाइड में पढ़ें : फिल्म से जुड़े बाकी दो विवाद...

4) भंसाली ने तोड़ दिया वादा 
 
मूवी के डायरेक्टर संजय लीला भंसाली के प्रतिनिधि ने कहा था फिल्म रिलीज होने से पहले राजपूतों को दिखाई जाएगी। दलील : विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि यदि फिल्म में सब कुछ सही है तो दिखाने में क्या हर्ज है। उनका आरोप है कि कुछ गलत तथ्य फिल्म में शामिल किए हैं। फिल्म नहीं दिखाए जाने से हमारी आशंका मजबूत हो रही है।
5) खिलजी ने रानी पद्मावत को कांच में नहीं देखा था 
 
आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि कहा जा रहा है कि खिलजी ने एक बार रानी पद्मिनी को कांच में देखा था। यह बात पूरी तरह गलत है।
 
हकीकत : कर्नल सिंह, प्रो. समदानी और इस विषय से जुड़े अन्य लोगों का तर्क है कि कांच की खोज ही 1835 के आसपास जर्मनी में हुई थी। जबकि, पद्मिनी का इतिहास इससे पहले का है। जौहर स्मृति संस्थान चित्तौड़गढ़ के ट्रेजरर नरपतसिंह भाटी ने बताया कि पद्मिनी को कांच मेंं दिखाने जैसी बात बकवास है। उस जमाने में कहां कांच आ गए। चित्तौड़ का इतिहास में कांच की तरह साफ है। उनके प्रेम प्रसंग जैसे दृश्य कैसे दिखाए जा सकते हैं।