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मास्टर प्लान मामले में सुनवाई, हाईकोर्ट- मल्टीस्टोरी की परिभाषा बदली जा रही, यह गलत

Dainik Bhaskar

Nov 15, 2017, 09:13 AM IST

जनहित याचिका की सुनवाई के तहत बिल्डर्स एंड डवलपर्स एसो. के प्रार्थना पर यह टिप्पणी की।

सिम्बॉलिक इमेज। सिम्बॉलिक इमेज।
जोधपुर. मास्टर प्लान मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि हर जगह मल्टीस्टोरी बिल्डिंग बनाने की मंजूरी नहीं दी जा सकती। इसके लिए जगह निश्चित होनी चाहिए। अगर अावासीय कॉलोनी में मल्टीस्टोरी बिल्डिंग्स बनती हैं तो स्वाभाविक है कि पूरी कॉलोनी के लोग प्रभावित होंगे। आवासीय कॉलोनी में व्यावसायिक गतिविधियों की भी अनुमति नहीं दी जा सकती। जस्टिस संगीत लोढ़ा व अरुण भंसाली की विशेष खंडपीठ ने मास्टर प्लान से संबंधित जनहित याचिका की सुनवाई के तहत बिल्डर्स एंड डवलपर्स एसो. के प्रार्थना पर यह टिप्पणी की। कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि मल्टीस्टोरी की डेफिनेशन ही चेंज करने की कोशिश की जा रही है, जो कि अनुचित है।
एसोसिएशन ने मल्टीस्टोरी बिल्डिंग के संबंध में कोर्ट की ओर से पहले दिए गए निर्देश स्पष्ट करने का आग्रह किया गया था।
उनका कहना था, कि सरकारी महकमों द्वारा कोर्ट के निर्देशों का गलत अर्थ लगाया जा रहा है, इस वजह से उनके प्रोजेक्ट मंजूर नहीं हो रहे हैं। कोर्ट ने उनका पक्ष सुनने के बाद हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा कि उनके द्वारा दिए गए निर्देश पूरी तरह से स्पष्ट हैं, इन्हें और स्पष्ट करने की कोई गुंजाइश नहीं है। मास्टर प्लान पर अगली सुनवाई 18 नवंबर को होगी।
अतिक्रमण पर सरकार की पालना रिपोर्ट पर जताई असंतुष्टि
कोर्ट ने सरकार की पालना रिपोर्ट पर असंतुष्टि जताते हुए पूछा कि आखिर फुटपाथ, ट्रैफिक समस्याग्रस्त क्षेत्रों से अतिक्रमण क्यों नहीं हटाए जा रहे हैं?
न्यायमित्र एमएस सिंघवी व अधिवक्ता विनीत दवे ने कोर्ट को सरकार की ओर से पेश की गई पालना रिपोर्ट के बारे में बताया कि सरकार ने सितंबर महीने के अंतिम सप्ताह में अतिक्रमण हटाने के संबंध में सार्वजनिक नोटिस जारी किए थे, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्यवाही नहीं की गई है। बाहरी इलाकों में छोटे-मोटे अतिक्रमण हटाकर खानापूर्ति की गई है। जयपुर व जोधपुर में एक भी जगह पार्किंग री-स्टोर नहीं की गई।
रोक के बावजूद नियमन, अफसरों पर जुर्माना लगाएं
लोक संपत्ति संरक्षण समिति के पीएन मैंदोला ने कोर्ट के समक्ष तथ्य रखा कि कोर्ट की रोक के बावजूद नियमन किया जा रहा है। उन्होंने जयपुर की पृथ्वीराज नगर योजना का उदाहरण देते हुए कहा कि हाईटेंशन लाइनों के नीचे भूखंड काट दिए गए और मकान बन गए। कोई हादसा होता है तो इसका कौन जिम्मेदार होगा? उन्होंने जयपुर जेडीए के निदेशक विधि व निदेशक प्लानिंग की जिम्मेदारी तय कर उन पर दो-दो लाख रुपए की कॉस्ट लगाने का आग्रह किया।
याचिकाकर्ता पीएन भंडारी व अधिवक्ता अभिनव भंडारी ने कोर्ट को बताया कि जयपुर में अतिक्रमण हटाने के नाम पर महज खानापूर्ति की गई है। कार्रवाई में भी अफसर ‘पिक एंड चूज’ की नीति अपना रहे हैं। कोर्ट ने जयपुर जेडीए द्वारा केवल एक गृह निर्माण सहकारी समिति द्वारा विकसित कॉलोनी की फाइल पेश करने पर नाराजगी जताई।
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