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इस परमवीर के नेतृत्व में जब १२० भारतीय सैनिकों ने तेरह सौ चीनी सैनिकों को मार गिराया

इस परमवीर के नेतृत्व में जब १२० भारतीय सैनिकों ने तेरह सौ चीनी सैनिकों को मार गिराया

SUNIL CHOUDHARY | Last Modified - Nov 18, 2017, 10:36 AM IST

जोधपुर। वर्ष 1962 में चीन के साथ लड़ा गया युद्ध त्रासद हार के लिए ही जाना जाता है, लेकिन भारतीय सेना प्रत्येक मोर्चे पर विफल नहीं रही थी। इस युद्ध से जुड़ी कुछ गाथाएं ऐसी भी है जो प्रत्येक भारतीय को हमारे जांबाज सैनिकों पर गर्व का अहसास कराती है। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण है सोलह हजार की फीट की ऊंचाई पर लड़ा गया चुशूल का युद्ध। इस युद्ध के दम पर भारतीय सेना ने लद्दाख को चीन के हाथ में जाने से बचा लिया था। आज से ठीक 55 बरस पहले मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में 120 भारतीय जवानों ने तेरह सौ चीनी सैनिकों को मार गिराया था। इनमें से 114 भारतीय जवान शहीद हो गए थे। महज हौसलों के दम पर लड़ा भीषण युद्ध...


- भारत-चीन युद्ध के दौरान 13वीं कुमाऊं रेजिमेंट की सी कंपनी को मेजर शैतानसिंह के नेतृत्व में चुशूल सेक्टर में रेजांग्ला दर्रे में चीनी सैनिकों को रोकने के लिए भेजा गया। सत्रह हजार फीट की ऊंचाई वाले इस दर्रे में इतनी अधिक सर्दी पड़ रही थी कि तेज बर्फीली हवा में वहां खड़े रह पाना भी मुश्किल था।
- 18 नवम्बर को सुबह साढ़े चार बजे चीनी सैनिकों ने हमला बोल दिया। बर्फीले तूफान के बीच मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में भारतीय जवानों ने मोर्चा संभाल लिया। प्रत्येक भारतीय जवान के पास मुश्किल से तीन सौ से चार सौ गोलियों के साथ ही कुल एक हजार हथगोले थे। वहीं चीनी सैनिकों की संख्या दो हजार थी। उनके पास मशीनगन व मोर्टार के साथ आधुनिक स्वचलित हथियार थे। इस दर्रे में दिनभर भीषण युद्ध चला। मेजर शैतान सिंह ने एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हुए अपने जवानों का हौंसला बनाए रखा। पीछे से शीघ्र मदद मिलने की उम्मीद नहीं थी।
- भारतीय जवानों के पास गोला-बारूद तक समाप्त हो गया। इसके बाद उन्होंने चीनी सैनिकों से आमने-सामने का युद्ध लड़ा। इस भीषण युद्ध में तेरह सौ चीनी सैनिक मारे गए। वहीं भारतीय सेना की पूरी टुकड़ी शहीद हो गई।
- इस मोर्चे पर भारतीय सैनिकों के हाथों मिली करारी हार में अपने तेरह सौ सैनिक गंवा देने के बाद शेष बचे चीनी सैनिक वहां से भाग खड़े हुए। भारतीय टुकड़ी के शहीद होने के बावजूद वे इस क्षेत्र पर कब्जा नहीं जमा पाए।


तीन माह पश्चात बर्फ में दबे मिले शव


- इस क्षेत्र में जोरदार बर्फबारी के कारण कई माह तक भारतीय सेना वहां पहुंच ही नहीं पाई। तीन माह पश्चात बर्फ पिघलने पर एक चरवाहे की सूचना पाकर सेना की एक टुकड़ी वहां पहुंची तो नजारा देख चौंक उठी। कई भारतीय जवानों ने अपनी गन थाम रखी थी और उनकी अंगुली ट्रिगर पर लगी थी। वहीं पहाड़ी के नीचे की तरफ एक हजार से अधिक चीनी सैनिकों के शव पाए गए थे। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वहां कितनी भीषण युद्ध हुआ होगा।
- बाद में मेजर शैतान सिंह की पार्थिव देह जोधपुर लाई गई और यहीं पर उनका अंतिम संस्कार किया गया। मेजर शैतान सिंह की इस बहादुरी को सम्मान देते हुए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। आज जोधपुर में उनकी प्रतिमा पर सेना और नागरिक प्रशासन की तरफ से समारोह आयोजित कर श्रद्धा सुमन अर्पित किए जा रहे है।

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