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मनुष्य को निरंतर संवेदनहीन बनाती जा रही हैं बाजारवादी शक्तियां: निर्मोही

नोहर|साहित्यकार अपने रचना-कर्म के माध्यम से सदैव मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने के लिए प्रय|शील रहता है किंतु चिंता की...

Danik Bhaskar | Apr 01, 2018, 05:35 AM IST
नोहर|साहित्यकार अपने रचना-कर्म के माध्यम से सदैव मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने के लिए प्रय|शील रहता है किंतु चिंता की बात यह है कि इस क्रूरता से भरे समय में बाजारवादी शक्तियां मनुष्य को निरंतर संवेदनहीन बनाती जा रही हैं। यह बात साहित्यकार मीठेश निर्मोही ने यहां जाट समाज भवन में राजस्थानी लोक संस्थान नोहर की ओर से उनके सम्मान में आयोजित ‘लेखक से मिलिए’ कार्यक्रम में कही। मीठेश निर्मोही ने कहा कि रचनाकार रचना-कर्म करते समय मां की भूमिका में रहता है, इसीलिए उसे अपनी हर रचना प्रिय होती है।

राजस्थानी लोक संस्थान नोहर का ‘लेखक से मिलिए’ कार्यक्रम आयोजित, साहित्यकार मिठेश निर्मोही ने किया रचना पाठ

इस अवसर पर उन्होंने यह भी कहा कि भूमंडलीकरण की बाजारवादी शक्तियां हमारी बहुलतावादी संस्कृतियों और भाषाओं को नष्ट करने पर तुली हुई है। हर रोज एक भाषा मर रही है। यही स्थितियां रही तो आने वाला समय और भी अधिक कष्टदायक हो जाएगा। अंग्रेजी के प्रसार के आगे राजस्थानी ही नहीं हिन्दी के लिए भी खतरा पैदा हो जाएगा। उन्होंने मातृभाषा राजस्थानी और भावी पीढिय़ों के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा का माध्यम राजस्थानी किए जाने पर बल दिया। इस अवसर पर निर्मोही ने राजस्थानी एवं हिन्दी की चुनिंदा कविताओं का पाठ भी किया। कार्यक्रम में मीठेश निर्मोही को शॉल एवं स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मान किया गया। ग्राम सुधार समिति के अध्यक्ष कृष्ण लाल कासनिया ने राजस्थानी भाषा की संवैधानिक मान्यता के मसले को दस करोड़ राजस्थानियों की अस्मिता से जुड़ा मुद्दा बताते हुए कहा कि सरकार को जन भावनाओं का आदर करते हुए अविलंब ही मान्यता देनी चाहिए। विशिष्ट अतिथि साहित्यकार मेहरचंद धामू ने कहा कि मीठेश निर्मोही हमारे प्रदेश के ऐसे प्रतिष्ठित रचनाकार हैं जिन्होंने अपनी रचनाओं में अपने समय एवं परिवेश की क्रूर सच्चाई को बखूबी रचा है। गज़लकार पवन शर्मा ने कहा कि साहित्यकार मीठेश निर्मोही की रचनाशीलता से हम अभिभूत है। उनके द्वारा प्रस्तुत विचार युवा रचनाकारों को प्रेरणा देते रहेंगे। संस्था के संरक्षक मेहरचंद बिजारनिया ने ऐसे कार्यक्रमों की महत्ती आवश्यकता जताई। संस्थान के कोषाध्यक्ष लक्ष्मीनारायण कस्वां, साहित्यकार डॉ.शिवराज भारतीय, संस्थापक अध्यक्ष भरत ओला ने आभार व्यक्त किया। इस मौके पर सुल्तान सहारण, महेन्द्र शर्मा, यशवीर साहू, हरिसिंह पूनिया, दलीपसिंह बेनीवाल, महेंद्र मिश्रा, रमेश खटोतिया, सुभाष सोनी, मनोज शर्मा, संजीव सिहाग, डॉ. हाकम , आशीष पुरोहित, रविंद्र सुथार, युसुफ खां साहिल, ओम सिंगाठिया, आत्माराम सहारण, जगदीश प्रसाद ढाका आदि मौजूद थे।