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कोई नया इतिहास रचने वालों को भी बढ़ावा दें

वर्ष 2017 की फिल्म ‘गाज़ी द अटैक’ को तेलुगु में बनाया गया था, जिसे अन्य भाषाओं में डब किया गया, क्योंकि घटना विशाखापटनम...

Dainik Bhaskar

Jun 15, 2018, 05:35 AM IST
कोई नया इतिहास रचने वालों को भी बढ़ावा दें
वर्ष 2017 की फिल्म ‘गाज़ी द अटैक’ को तेलुगु में बनाया गया था, जिसे अन्य भाषाओं में डब किया गया, क्योंकि घटना विशाखापटनम में हुई थी। अब परदे पर आई है ‘राजी’। यह हिंदी में है, क्योंकि घटना हिंदी भाषी क्षेत्र में घटी थी। अक्टूबर में एक और फिल्म आ रही है ‘बाजी’ लेकिन, यह ओडिया में है। यह फिल्म बाजी राउत के साहस और बहादुरी पर है, जो पूर्वी भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में सबसे कम उम्र का शहीद है। ब्रिटिश सैन्य बलों ने धेनकनाल जिले के इस 12 वर्षीय बालक को तब गोली मार दी थी, जब उसने 11 अक्टूबर 1938 को ब्राह्मणी नदी पार कराने से इनकार कर दिया था। चिन्मय दास द्वारा निर्देशित शॉर्ट फिल्म ‘बाजी : द इम्मोर्टल बोट बॉय’ टीम एग्ज़ीबिट की पहल है। यह उन रचनात्मक युवाओं का ग्रुप है, जो बाजी की कहानी कहने के लिए एक साथ आए हैं। ग्रामीण ओडिशा में फिल्माई यह फिल्म अब पोस्ट प्रोडक्शन स्टेज पर है। तीनों फिल्मों की भाषाई भिन्नता के बावजूद उनमें समानता यह है कि ये कहानियां हमारे महान इतिहास पर गढ़ी गई हैं।

बेशक, तीनों फिल्मों की कहानियां ऐसे नागरिकों के साहस और समर्पण की कहानियां हैं, जो अपने देश के लिए अपना जीवन देने को तैयार थे। लेकिन, दिन-प्रतिदिन के हमारे ऐसे हीरो भी हैं, जो किसी चीज का त्याग करते हैं। इन्हें भी प्रोत्साहन और समर्थन देने की जरूरत है। अमर और रानी कलमकर का उदाहरण लीजिए, जिनका किताबों की ताकत में दृढ़ विश्वास है। अमर 15 वर्षों से सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता हैं और युवा चेतना नामक एनजीओ चलाते हैं। वे हमेशा ऐसे वंचित बच्चों के लिए लाइब्रेरी खोलने का सपना देखते थे, जो प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठना चाहते हैं पर उनके लिए तैयारी करने के साधन उनके पास नहीं होते। पुणे की एक यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर रानी अमर के इस विचार से सहमत थीं कि उनके विवाह समारोह को सामाजिक कार्य से जोड़ दिया जाए। इसलिए हाल में जब इस युगल ने शादी की तो उन्होंने वॉट्सएप पर भेजे विवाह निमंत्रण में मेहमानों से अनुरोध किया कि वे उन्हें तोहफे में बुके, कोई महंगी कटलरी या जुलरी देने की बजाय प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए उपयोगी कोई पुस्तक दें।

न जाने कैसे यह निमंत्रण सर्कुलेट हो गया और जो लोग उन्हें नहीं जानते थे, उन्होंने भी उन्हें पुस्तकें दीं। उस एक ही दिन में उन्हें 3,000 किताबें मिल गईं! अब दोनों महाराष्ट्र के अहमदनगर में लाइब्रेरी स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। यह लाइब्रेरी इस माह के अंत तक खुल जाएगी। इसमें रुचि रखने वाले छात्र उनसे इस बारे में पूछताछ के लिए संपर्क भी करने लगे हैं। परोक्ष रूप से इस युगल ने कई लोगों के लिए शैक्षिक स्वतंत्रता निर्मित की है।

एक अन्य मामले के बारे में जानेंगे तो दंग रह जाएंगे। क्या आपको विश्वास होगा कि बिहार के मुंगेर जिले के हेमिजापुर गांव के आसपास दो दशकों से भीख मांगने वाली दृष्टिहीन मुसो देवी और उनके पति मनोहर चौधरी स्वच्छ भारत अभियान के ब्रैंड एम्बेसेडर हैं? ऐसा इसलिए हैं कि उन्हें भीख में जो कुछ भी मिला, उसे पूरा खर्च करके उन्होंने अपनी झोपड़ी में टॉयलेट बनाया है। उन्होंने जब अभियान की बुनियादी बातों को जाना तो यह कदम उठाया। सब-डिविजनल ऑफिसर खगेशचंद्र झा ने उनके साहस और उत्साह की सराहना की और उन्हें योजना के तहत टॉयलेट के निर्माण के एवज में 12 हजार रुपए दिए तथा अभियान का ब्रैंड एम्बेसेडर भी बना दिया।

फंडा यह है कि  इतिहास बहुत महत्वपूर्ण है लेकिन, उन लोगों को बढ़ावा देना भी महत्वपूर्ण है, जो कोई नया इतिहास निर्मित करते हैं।

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए टाइप करें FUNDA और SMS भेजें 9200001164 पर

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in

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