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फेसबुक : यूज़रों ने भरोसा किया, कंपनी ने उन्हीं को धोखा दिया

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 02, 2018, 03:40 AM IST

फेसबुक : यूज़रों ने भरोसा किया, कंपनी ने उन्हीं को धोखा दिया
द न्यूयॉर्क टाइम्स एडिटोरियल बोर्ड

फेसबुक के कामकाज की असलियत सामने आने की वास्तविक शुरुआत डोनाल्ड ट्रम्प के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के चार महीने बाद शुरू हुई थी। कुछ विशेषज्ञों ने बता लगा लिया कि फेसबुक ने रूसी लोगों के संपर्क में आकर अमेरिकी चुनाव में प्रौद्योगिकी की मदद से हस्तक्षेप किया, जिससे ट्रम्प को जीताने में मदद मिली। इन आरोपों की जांच गहराई से चली, ट्रम्प प्रशासन में ही कई लोगों को कम समय में ही पद से इस्तीफा देना पड़ा। परन्तु ट्रम्प लगातार इस बात से इंकार करते रहे हैं कि उन्होंने इस तरह की किसी धांधली के लिए फेसबुक या अन्य किसी की मदद ली। कुछ लोगों ने अपनी जांच जारी रखी और अंतत: पता लगा लिया कि कैम्ब्रिज एनेलिटिका और उसके प्रोफेसर एलेक्ज़ेंडर कोगन ने 5 करोड़ से अधिक फेसबुक यूज़रों की सूचनाएं उन्हें बिना बताए चुराईं। फेसबुक को इसकी जानकारी दो वर्ष बाद लगी।

द न्यूयॉर्क टाइम्स और द ऑब्जर्वर ऑफ लंदन की रिपोर्ट में बताया जा चुका है कि वर्ष 2014 की शुरुआत में कोगन ने क्विज़ एप के जरिये फेसबुक यूज़रों का डेटा एकेडमिक रिसर्च के नाम पर चुराया। वह जानकारी उन्होंने कैम्ब्रिज एनेलिटिका को सौंप दी, उसने वोटर की पर्सनैलिटीज़ के आधार पर उनकी नई प्रोफाइल बनाई थी। सबसे ज्यादा आश्चर्यजनक और परेशान करने वाली बात यह है कि फेसबुक को पता ही नहीं चला कि उसके यूज़र की जानकारी चुराई जा रही है। बाद में जब उसे पता चल गया तो उसने यूज़र को अलर्ट क्यों नहीं किया? फेसबुक ने यह भी जानना उचित नहीं समझा कि उसके यूज़र का डेटा डिलीट किया गया है या नहीं, जबकि वर्ष 2015 में फेसबुक ने कैम्ब्रिज एनेलिटिका और कोगन से बात की थी। कैम्ब्रिज के पास आज भी ज्यादातर डेटा मौजूद है।

सारा खुलासा होने के बाद भी फेसबुक की प्रतिक्रिया उतनी ही धीमी थी, जैसा कि उसे जाना जाता है। वर्ष 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में ट्रम्प के समर्थन वाली फेक न्यूज़ पर भी उसका यही रुख था। उस चुनाव के बाद फेसबुक के संस्थापक और मार्क ज़करबर्ग ने परिणाम प्रभावित करने के आरोपों को पागलपन करार दिया था। हालांकि, कुछ महीने लगे आरोप सच साबित करने में, फिर उन्ही ज़करबर्ग ने स्वीकारा कि वे गलत थे। यह समझना मुश्किल है कि फेसबुक से चुराई गई यूज़र्स की प्रोफाइल से कैम्ब्रिज एनेलिटिका ने किस तरह ट्रम्प को जिताने में मदद की। उसे ‘साइकोग्राफिक डेटा’ कहा गया, क्योंकि उससे लोगों की भावनाएं प्रभावित की गई थीं, इस बारे में भी फेसबुक की तरफ से विविदास्पद बयान जारी किए गए थे। इसके लिए फेसबुक के 3 करोड़ यूज़र्स के डेटा का उपयोग किया गया था, इसमें यह तक शामिल था कि वे जहां रह रहे हैं। उसके अनुसार कैम्ब्रिज एनेलिटिका को उनकी नई प्रोफाइल बनाने और दूसरी सूचनाओं को उसमें शामिल करने में मदद मिली।

आज अमेरिका और यूरोपीय संघ लंदन स्थित डेटा माइनिंग फर्म कैम्ब्रिज एनेलिटिका की जांच कर रहे हैं, इनमें अमेरिकी कांग्रेस के सदस्य और मैसाचुसेट्स की एटॉर्नी जनरल माउरा हीले भी शामिल हैं। उधर, ब्रिटेन में नियामक और सांसद यह पता लगा रहे हैं कि कहीं 2016 के ‘ब्रेग्ज़िट’ जनमतसंग्रह में भी इसी तरह परिणाम प्रभावित तो नहीं किए गए। संभव है कि इसकी और भी जांच चल रही हो। हाल ही में चैनल-4 न्यूज़ ने गोपनीय कैमरे वाला एक फुटेज जारी किया, उसमें कैम्ब्रिज के एग्जीक्यटिव बता रहे हैं कि उनकी कंपनी नेताओं को फांसने के लिए रिश्वत देने सहित कई विकल्प आजमाती है। बाद में फर्म ने इससे इंकार किया कि उनकी कंपनी भ्रष्टाचार एवं अवैध वसूली में शामिल है।

-सांसदों और नियामकों को चाहिए कि वे फेसबुक की प्रतिक्रियाओं की भी जांच करें। उन्हें देखना चाहिए कि फेसबुक ने वर्ष 2011 की उस डिक्री का उल्लंघन किया है, जो ‘फेडरल ट्रेड कमीशन’ भी जुड़ा है। उसमें यह बात उल्लेखित है कि कंपनी यूज़र की सूचनाएं गोपनीय रखेगी, लेकिन उसने सूचनाएं न केवल शेयर कीं, बल्कि सार्वजनिक कर डालीं।

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डेटा चोरी होने की हकीकत सामने आने के बाद भी उसे नहीं रोकना गलत है। फेसबुक के कई ऐसे झूठ सामने आए हैं, जिसमें उसने यूज़र से प्राइवेसी का वादा किया था।

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