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एपल ही नहीं गूगल और माइक्रोसॉफ्ट में भी बच्चों को लुभाने की होड़

पिछले दिनों एपल के सीईओ टिम कुक ने सेन फ्रांसिस्को के एक ऑडिटोरियम में कई छात्रों के बीच में 9.7 इंच का आईपैड पेश...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 01, 2018, 04:20 AM IST

पिछले दिनों एपल के सीईओ टिम कुक ने सेन फ्रांसिस्को के एक ऑडिटोरियम में कई छात्रों के बीच में 9.7 इंच का आईपैड पेश किया, जिसे एपल पेंसिल से चलाया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि इसे स्कूलों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। इसकी लॉन्चिंग में इस बात का ध्यान रखा गया कि किस तरह से छात्रों को इसकी ओर आकर्षित किया जा सके। ये बताया गया कि किस तरह से इसे क्लासरूम में उपयोग कर सकेंगे। एपल एक बार फिर से अपनी जड़ों की ओर लौट रही है। 90 के दशक में भी मेकिनतोश कंपनी ने देशभर में क्लासरूम के लिए ही तैयार किया था।

दिग्गज टेक कंपनी माइक्रोसॉफ्ट ने पिछले वर्ष मई माह में ही सर्फेस टॉप नामक अपनी तरह का पहला डिवाइस पेश किया था। सर्फेस टॉप में भी पूरा जोर इस बात पर था कि कॉलेज जाने वाले छात्र इसे ज्यादा से ज्यादा ले सकंे। इस वर्ष के आरंभ में माइक्रोसॉफ्ट ने नया विंडो पीसी क्लासरूम के लिए डिजाइन किया। एपल के आयोजन के महज एक दिन पूर्व गूगल और एसर ने पहला क्रोम ओए पावर्ड टैबलेट जारी किया। सर्च की महारथी गूगल अमेरिका के क्लासरूम में अपना वर्चस्व बनाए रखना चाहता है। गूगल की क्रोमबुक किंडरगार्टन में 59.6 फीसदी शिपमेंट होता है। विंडोज़ का 25.6 फीसदी और आईओएस का 10.6 फीसदी शिपमेंट होता है।

ये तमाम टेक कंपनियां अपने गैजेट्स की स्कूलों में पकड़ रखना चाहती हैं, क्योंकि इन्हें इसमें बड़े कारोबारी अवसर दिख रहे हैं। कुछ समय पहले आईबीआईएस केपिटल द्वारा जारी एक रिपोर्ट में बताया गया कि अगले दो वर्ष में एजुकेशन टेक्नोलॉजी का बाजार 252 अरब डॉलर का हो जाएगा। ग्लोबल डेटा के रिसर्च डायरेक्टर एवि ग्रीनगार्ट का कहना है कि जिस तरह से स्कूल में गूगल क्रोमबुक्स या विंडोज लैपटॉप का प्रयोग हो रहा है, उतना एपल के डिवाइस का नहीं। एपल ने जो पेंसिल आईपैड के साथ दी है, उसका तात्पर्य ये है कि जो चीजें कीबोर्ड से नहीं की जा सकती हैं, वे पेंसिल से कर सकते हैं। आईपैड की ज्यादा लागत भी स्कूलों को इसकी खरीदी से रोक सकती है। इसे 299 डॉलर में स्कूल में दिया जा रहा है, जो आईपैड प्रो टैबलेट से सस्ता है। क्रोमबुक्स इनके मुकाबले और सस्ता है। एजुकेशन अब इन कंपनियों के लिए आकर्षक बाजार है। तमाम बड़ी टेक कंपनियां इस पर नजरें रखे हुए हैं। लेकिन इसमें इस बात का डर है कि स्टूडेंट क्लासरूम छोड़कर पूरी तरह से कंज्यूमर हो जाएंगे। फिर भी एपल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि स्कूल इस तरह की क्रिएटिव लर्निंग एप्लीकेशन में इन्वेस्ट करते हैं या नहीं।

डिप्लोमेसी: उत्तर कोरिया के तानाशाह में बदलाव क्यों?

क्यों चर्चा के लिए तैयार हुए?

चार्ली कैम्पबेल/ टोन्गिलकोन/ स्टीफन किम/ फिलिप इलियट

ऐसा क्या है कि दुनियाभर में शत्रु माने जाने वाले दो गर्ममिजाज नेता एक दूसरे से बात करने जा रहे हैं। उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बीच ऐसा क्या हुआ कि सारा आक्रोश पिघल गया। टाइम पत्रिका ने उन लोगों से बात की है, जो कभी उत्तर कोरिया के साथ थे, जो वार्ताकार हैं और दोनों ही पक्षों के अहम लोगों से ये जाना कि आखिर ये संभव कैसे हुआ? किम की सबसे बड़ी जरूरत पैसा और सुरक्षा है। ट्रम्प के राष्ट्रपति बन जाने के बाद से संयुक्त राष्ट्र ने उत्तर कोरिया के खिलाफ प्रतिबंध तीन दौर में लगाए हैं। इससे उत्तर कोरिया का रेवेन्यु बुरी तरह से प्रभावित हो गया। उसका कोयला, श्रमिक और कपड़ा उद्योग का एक्सपोर्ट खत्म हो गया। अर्थव्यवस्था की हालत जर्जर हो गई। किम ये भी जानते हैं कि यदि लड़ाई छिड़ी तो उनका देश टिक नहीं पाएगा। विशेषज्ञों की राय में इन्हीं सब कारणों से किम ने परमाणु शस्त्रों को खत्म करने की बात पर सहमति जताई साथ ही हथियारों का परीक्षण स्थगित करने पर रजामंदी जाहिर की।

कभी उत्तर कोरिया के समर्थक रहे क्लाइव ने अपने बचाव के लिए छद्म नाम से बात करते हुए कहा कि उत्तर कोरिया इसलिए भी अमेरिका से संबंध बनाना चाहता है, क्योंकि 2 करोड़ लोगों की आजीविका का सवाल है। हो सकता है कि किम उस संधि पर भी सहमत हो जाए, जो दक्षिण कोरिया ने रूस, चीन, और जापान के साथ कर रखी है, जिसमें परमाणु अस्त्रों को खत्म करने की बात है। संयुक्त राष्ट्र ने इसकी पुष्टि की है। उनका कहना है कि इस तरह की संधि होती है तो फिर किम को इस बात की भी आपत्ति नहीं होगी कि अमेरिका दक्षिण कोरिया में अपने 28,500 सैनिकों को रखे।

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भारत विरोधी हैं अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार

रेगन प्रशासन में बतौर राजनयिक और अटॉर्नी कड़ी मेहनत करने पर जॉन बोल्टन को अपने साथियों की ओर से कांसे का बना हैंडग्रेनेड प्रतीकात्मक उपहार के रूप में मिला था। ये उन्होंने कई दिनों तक वॉशिंगटन स्थित अपने ऑफिस में लगाकर रखा था।

अब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनाया है। बोल्टन वही शख्स हैं, जो जॉर्ज बुश और मनमोहन सिंह के कार्यकाल के दौरान संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत थे। इन्होंने चीन के साथ मिलकर संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का जमकर विरोध किया था। 9 अप्रैल से बोल्टन पदभार ग्रहण कर रहे हैं। राष्ट्रवादी और रूढ़िवादी विचारों वाले बोल्टन का असर अमेरिकी नीतियों पर मई माह से दिखने लगेगा।

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