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महाराष्ट्र: बीड जिले का विडा गांव, यहां जमाई को गधे पर बैठाकर ढोल-नगाड़ों के साथ निकालते हैं जुलूस, फिर देते हैं सोने की अंगूठी

Pali News - होली का उत्सव देशभर में धूमधाम से मनाया जाता है। लेकिन महाराष्ट्र में बीड जिले के विडा गांव में यह त्योहार कुछ अलग...

Dainik Bhaskar

Mar 01, 2018, 05:20 AM IST
महाराष्ट्र: बीड जिले का विडा गांव, यहां जमाई को गधे पर बैठाकर ढोल-नगाड़ों के साथ निकालते हैं जुलूस, फिर देते हैं सोने की अंगूठी
होली का उत्सव देशभर में धूमधाम से मनाया जाता है। लेकिन महाराष्ट्र में बीड जिले के विडा गांव में यह त्योहार कुछ अलग ही ढंग से मनाया जाता है। होली के दिन गांव के जमाई को गधे पर बिठाकर पूरे गांव में उसका जुलूस निकाला जाता है। त्योहार करीब आता देख गांव के सभी जमाई गांव को छोड़कर दूसरे गांवों में रहने के लिए चले गए हैं। लेकिन गांव के लोग अभी से जमाई को ढूंढने में लगे हैं। पूरे बीड जिले में होली का उत्सव जोर-शोर से मनाने का रिवाज है। धारूर तहसील में तो राजपूत समाज के लोग गांव में जुलूस निकालकर सभी लोगों को ठंडई पिलाते हैं, तो विडा गांव में ढोल बजाते हुए जमाई को गधे पर बिठाकर पूरे गांव में घुमाया जाता है। इसलिए होली मनाने के लिए एक भी जमाई यहां नहीं आता। निजाम के जमाने में गांव के ठाकुर आनंदराव देशमुख ने मजाक मे जमाई का गधे पर जुलूस निकाला था, तब से लेकर आज तक यह प्रथा चली आ रही है। गधे को पूरी तरह सजाकर जमाई को ढूंढकर उसे इस पर बिठाया जाता है और गले में चप्पल, जूतों की माला डाली जाती है। जुलूस होने के बाद जमाई को नए कपड़े और सोने की अंगूठी दी जाती है।

त्योहार के पहले ही गांव छोड़कर भागे जमाई, गांव वाले ढूंढने में लगे; निजाम के जमाने से चली आ रही है परंपरा

गांव में करीब 100 जमाई जिन्हें ढूंढने में लगते हैं 8 दिन

विडा की आबादी 6 हजार के करीब है। यहां लगभग 100 जमाई हैं। लेकिन होली के 8-10 पहले ही सभी गांव छोड़कर भाग जाते हैं। उन्हें ढूंढने की जिम्मेदारी गांव के यंग ब्रिगेड पर होती है। 8 दिन पहले ही सभी युवा अपनी-अपनी टीम बनाकर उन्हें ढूंढने के लिए निकलते हैं। इनमंे से तीन-चार जमाई को गधे पर बैठने के लिए राजी किया जाता है। इसमें नए जमाई को गधे पर बैठने का मान दिया जाता है।

जाति और धर्म का नहीं है कोई बंधन

गांव में हिंदू, बौद्ध और मुस्लिम सभी धर्म के लोग रहते हंै। त्योहार में सभी धर्म के जमाई शामिल होते है। इस प्रथा के बारे में उपसरपंच बापूसाहेब देशमुख ने बताया कि, सभी लोग जाति, धर्म को भूलकर उत्सव में शामिल होते हैं। हर साल अलग-अलग धर्म के जमाई को हम गधे पर बिठाते हंै। जुलूस निकालकर नए कपड़ेे और सोने की अंगूठी भेंट के रूप में दी जाती है।

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