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दो परंपराएं होली की : पर्यावरण संरक्षण के लिए बिश्नोई समाज नहीं मनाता होली चितलवाना में पहलवान कहलाने के लिए उठाते है आठ सौ किलो वजनी पत्थर

Pali News - पर्यावरण प्रेमी बिश्नोई समाज पर्यावरण संरक्षण व आस्था के चलते होली दहन करना तो दूर, उसकी लौ भी नहीं देखते हैं।...

Dainik Bhaskar

Mar 01, 2018, 02:35 AM IST
दो परंपराएं होली की : पर्यावरण संरक्षण के लिए बिश्नोई समाज नहीं मनाता होली चितलवाना में पहलवान कहलाने के लिए उठाते है आठ सौ किलो वजनी पत्थर
पर्यावरण प्रेमी बिश्नोई समाज पर्यावरण संरक्षण व आस्था के चलते होली दहन करना तो दूर, उसकी लौ भी नहीं देखते हैं। होली दहन की लौ नहीं देखने के पीछे भी उनकी मान्यता हैं कि यह आयोजन भक्त प्रहलाद को मारने के लिए किया था और विष्णु भगवान ने 12 करोड़ जीवों के उद्धार के लिए वचन देकर कलयुग में भगवान जांभोजी के रूप में अवतरित हुए। इसलिए बिश्नोई समाज स्वयं को प्रहलाद पंथी मानते हैं। सदियों से चली आ रही यह परंपरा न सिर्फ पानी की बर्बादी रोकता है, बल्कि पर्यावरण को बचाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

पर्यावरण संरक्षण व आस्था के चलते बिश्नोई समाज नहीं करता होली का दहन, होली के दिन पाहल व स्नेह मिलन कार्यक्रम का ही होता आयोजन

जरूरी है होली का पाहल

होलिका दहन से पूर्व जब प्रहलाद को गोद में लेकर बैठती है, तभी से शोक शुरू हो जाता है सुबह प्रहलाद के सुरक्षित लौटने व होलिका के दहन के बाद विश्नोई समाज खुशी मनाता है। बिश्नोई समाज के अनुसार प्रहलाद विष्णु भक्त थे। विश्नोई पंथ के प्रवर्तक भगवान जंभेश्वर विष्णु के अवतार थे। कलयुग में संवत 1542 कार्तिक कृष्ण पक्ष अष्टमी को भगवान जंभेश्वर ने कलश की स्थापना कर पवित्र पाहल पिलाकर विश्नोई पंथ बनाया था जांभाणी साहित्य के अनुसार तब के प्रहलाद पंथ के अनुयायी ही आज के विश्नोई समाज के लोग हैं, जो भगवान विष्णु को अपना आराध्य मानते हैं उन्होंने बताया जो व्यक्ति घर में पाहल नहीं करते हैं वे मंदिर में सामूहिक होने वाले पाहल से पवित्र जल लाकर उसे ग्रहण करते हैं। शाम को शोक स्वरुप खिचड़ा भी बनाया जाता है।

दो सौ साल पहले चूना पिसाई के लिए लाया पत्थर, तभी से शुरू हुई पहलवानी परखने की परंपरा

चितलवाना| उपखंड क्षेत्र के कुंडकी गांव में तकरीबन दो सौ साल से चली आ रही पहलवानी परखने की विधि आज भी कायम है। यहां एक आठ क्विंटल वजन का पत्थर, जिसे लोग स्थानीय भाषा में घट के नाम से जानते है को पलटने की विधि आज भी कायम है। जो व्यक्ति पत्थर को पलट देता है। उसे पहलवान माना जाता है। क्षेत्र के गांवों के हजारों लोग धुलंडी के दिन यहां आते हैं और अपनी शारीरिक ताकत आजमाकर उस प्रतियोगिता में भाग लेते हैं। हर वर्ष चार-पांच लोग उस पत्थर को पलटने में कामयाब होते हैं।

दो सौ साल पहले चूना पिसाई के लिए लाया गया था पत्थर

यह पत्थर आज से दो सौ साल पहले यहां मंदिर, कुआं और टांका बनाने के लिए चूना पिसाई के लिए चक्की का है। जिससे चूना पिसा जाता था और आज से तकरीबन दो सौ साल पहले यह परम्परा शुरू हुई थी। ग्रामीण हेमाराम गोदारा तथा देवीचंद कांवा ने बताया कि इसमें कई लोग भाग्य आजमाते हैं और अपनी पहलवानी परखते हैं।

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