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शिक्षा से लेकर मानवीय मूल्यों तक का पतन देश के लिए खतरनाक

एक देश के इतिहास में मोड़ आता है, उसका समाधान भी निकलता है। इंग्लैंड में औद्योगिकरण, फ्रांस में व्यक्तिवाद और...

Danik Bhaskar | Apr 01, 2018, 04:00 AM IST
एक देश के इतिहास में मोड़ आता है, उसका समाधान भी निकलता है। इंग्लैंड में औद्योगिकरण, फ्रांस में व्यक्तिवाद और जर्मनी में वैचारिक द्वंद्व के दौर में 19वीं सदी के उत्तरार्ध में घटित हुए। उन सामाजिक और मानवीय समस्याओं के वैचारिक तथा व्यवहारिक हल निकले। समाज एक दार्शनिक सोच से आगे बढ़ता है। ऐसा प्रतीत होता है कि महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, बीआर अम्बेडकर के बाद वैचारिक सोच समाप्त-प्राय हो चुकी है। प्रचलित सोच समाज के कल्याण के लिये न हो कर सत्ता लोलुपता के लिये एक चाल व उपाय के रूप में परिलक्षित हो रही है। कभी कभी क्षणिक गंभीर तथा सामान्य समस्याओं का उत्पन्न होना स्वाभाविक है। लेकिन गंभीर समस्याओं का निरंतर घटित होना देश के सामाजिक ताने-बाने को खंडित कर सकता है। बंगाल, बिहार में कृत्रिम साम्प्रदायिक उन्माद द्वारा वैमनस्यता, हिंसा और जान-माल की हानि हो रही है। एक मंत्री व मंत्री पुत्र व एक सांसद की भूमिका खुलेआम दिखाई देती है। शासन शिथिल बना हुआ है। ऐसा क्यों हो रहा है? एक दिशाहीन शासन के रहते हुए ही ऐसा हो सकता है। शासन का संकीर्ण दृष्टिकोण भी इसका कारण रहा है। साम्प्रदायिक उन्मादों के अलावा धोखाधड़ी व भ्रष्टाचार की बाढ़ आई हुई है। पंजाब नेशनल बैंक का लगभग 13 हजार करोड़ रुपये का घपला शांत नहीं हुआ, आईडीबीआई बैंक व आईसीआईसीआई बैंक के कारनामे उजागर हुए हैं। पीएनबी का ऑडिटर स्वयं कर-वचन का दोषी पाया गया है। आईसीआईसीआई बैंक की मुखिया को रिजर्व बैंक के निर्देशों के उल्लंघन का दोषी करार दिया गया है। रिजर्व बैंक ने आईसीआईसीआई बैंक पर 58.9 करोड़ का जुर्माना लगाया है। भ्रष्टाचार और घोटालों की घटनाएं पूर्व में भी होती रही हैं। अधिकतर मामलों पर लोगों को दंडित गया है। वर्तमान में, शिक्षा की दशा व दिशा अत्यन्त दयनीय है। परीक्षाओं के प्रश्न-पत्र लीक करना और नकल करवाना आम बात हो गई है। इन दुष्कार्यों में गिरोह खड़े हो गये हैं। ऐसे कृत्य अपराधी धंधे बन चुके हैं। कुछ लोग निजी स्वार्थों के लिये सत्तासीन होने का लाभ उठाकर भी ऐसे कार्य करते हैं। सूचनाओं और चुनाव की तारीख के लीक होने व परीक्षा के प्रश्नपत्रों के लीक होने में बहुत अंतर है। कक्षा 10 के गणित व कक्षा 12 के अर्थशास्त्र के प्रश्न-पत्रों के लीक होने के कारण लाखों विद्यार्थियों का भविष्य संकट में आ चुका है। उनके अभिभावकों की चिंता व परेशानी भी कम नहीं है। वर्तमान शासन ने अपना रटा-रटाया उत्तर दिया है कि ऐसे लीक पूर्व में भी हुए हैं। यह तर्क असंगत है कि पहले जो खराब हुआ है, वैसा ही और उससे भी अधिक खराब होता है तो उसमें कोई बुराई नहीं है। ऐसे में सीबीएसई को भी पेपर लीक के लिये दोषी करार नहीं दिया जा सकता। प्रधानमंत्री की अप्रसन्नता का भाव इस लीक के घाव को भर नहीं सकता। शिक्षा मंत्री का यह कथन कि अपराधियों को बख्शेंगे नहीं भी, सदैव की तरह एक प्रचलित प्रवृत्ति का द्योतक है। लाल बहादुर शास्त्री ने एक रेल दुर्घटना के घटित होने पर पद-त्याग किया था। वर्तमान में ऐसे मंत्री व नेता लुप्त हो चुके हैं। शिक्षा के हर स्तर पर गिरावट है।

शिक्षा की गुणवत्ता पर गम्भीर चिंतन व मंथन को प्राथमिकता दे कर धरातलीय स्तर पर सुधारे बिना हम विद्यार्थियों का भविष्य उज्जवल नहीं बना सकते। यदि शिक्षा केवल विद्यार्थी-अध्यापक केन्द्रित रखी जाती है तो वर्तमान दोषपूर्ण व्यवस्था से मुक्ति प्राप्त हो सकती है। शिक्षा यांत्रिक न होकर एक सघन ज्ञानोपयोगी जीवन-कला के रूप में विकसित करनी होगी। दुनिया के कुछ देशों में शिक्षा न केवल शुल्कविहीन है, बल्कि श्रेष्ठतम भी है। वहाॅं पर शिक्षा का उद्देश्य नागरिकता का निर्माण है, न कि केवल प्रमाण पत्र और उपाधि प्रदान करना। हवा में उड़ने वाली योजनाओं से देश आगे नहीं बढ़ सकता। इसके लिये, गुणात्मक व धरातलीय परिवर्तनों का संचार करना होगा। शिक्षा के दोष, हमारी समाज व्यवस्था के अन्य क्षेत्रों की दोषपूर्ण कार्य-विधियों से भिन्न नहीं है। एक समग्र दर्शन, सोच व क्रियान्विति के बिना लीक होने की समस्या पर नियंत्रण कर पाना कठिन है। ऊपरी सांस्कृतिक आवरण से हट कर सारगर्भित जीवनोपयोगी ज्ञानात्मक शिक्षा ही एक मात्र मार्ग है जो विद्यार्थियों को सुलभ करना होगा। एक महान व्यक्ति ने नाम में परिवर्तन, ड्रेस कोड, ड्रेस का रंग, तथाकथित प्राचीनता को गौरवान्वित करना आदि ऊपरी सांस्कृतिक आवरण मात्र है, न कि एक जीवनोपयोगी संस्कृति है।

प्रो. के.एल. शर्मा

प्रो-चांसलर, जयपुर नेशनल यूनिवर्सिटी,

पूर्व कुलपति, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर