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टीम का बर्ताव पहले चेक करते तो बदनामी नहीं होती

ल टैम्परिंग मामले के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्टीव स्मिथ, डेविड वार्नर और बेनक्रॉफ्ट को रोते देखना खेलप्रेमियों...

Danik Bhaskar | Apr 01, 2018, 04:00 AM IST
ल टैम्परिंग मामले के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्टीव स्मिथ, डेविड वार्नर और बेनक्रॉफ्ट को रोते देखना खेलप्रेमियों को विक्षुब्ध करने वाला था। विश्वस्तरीय खिलाड़ी खेल, टीम और अपने देश का गौरव होते हैं। वे देश के हीरो होते हैं, विलेन नहीं। लेकिन इस सदमे और अपमान के बीच दुनिया के लिए, खासकर युवा खिलाड़ियों के लिए बड़ा संदेश भी छिपा है कि जीत महत्वपूर्ण है, पर यह सबकुछ नहीं है। गेम को खराब करने के लिए बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है। स्मिथ और वार्नर को इसकी सजा एक साल के बैन के रूप में मिली। जबकि, बेनक्रॉफ्ट नौ महीने के लिए बैन हुए हैं। हालांकि, अभी यह बहस जारी है कि क्या क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने अपने तीनों क्रिकेटरों को ज्यादा कड़ी सजा दी। आईसीसी कोड ऑफ कंडक्ट को देखते हुए यह ज्यादा लगती भी है। शायद इसी कारण इन तीनों क्रिकेटरों के प्रति क्रिकेट प्रसंशकों से लेकर पूर्व क्रिकेटरों के एक वर्ग में सहानुभूति भी जाग रही है।

क्या ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों ने जो किया, वह दूसरे खिलाड़ी नहीं करते? शायद! पर ऑस्ट्रेलिया ने उन्हें सिर्फ बॉल टैम्परिंग की सजा नहीं दी है। दरअसल, इन क्रिकेटरों ने सिर्फ टैम्परिंग नहीं की, बल्कि जब वे रंगे हाथों पकड़े गए तब उन्होंने झूठ बोला। उन्होंने बहाने बनाए और इससे पूरे ऑस्ट्रेलिया की बदनामी हुई। ऑस्ट्रेलिया में क्रिकेट कप्तान बेहद सम्मान का पद है। वहां क्रिकेट कप्तान चुने जाने से पहले उसके खेल से लेकर व्यवहार तक की पड़ताल की जाती है। यही कारण है वार्नर को ताउम्र लीडरशिप की भूमिका से बैन कर दिया गया है। स्मिथ भी तभी कप्तान बन पाएंगे, जब प्रशंसक और स्पॉन्सर भी इसकी इजाजत दें। क्रिकेटरों की कड़ी सजा ने ऑस्ट्रलिया के क्रिकेट कल्चर पर भी बहस छेड़ दी है। ऑस्ट्रेलिया के पूर्व कोच मिकी आर्थर ने भी कहा कि जब ऑस्ट्रेलियंस कमजोर पड़ने लगते हैं तो वे मर्यादा की सीमा पार कर जाते हैं। लोगों को स्मिथ का ‘ब्रेनफेड’ याद होगा। तब वे बेंगलुरू टेस्ट (2016) में डीआरएस लेने के लिए ड्रेसिंग रूम से इशारे का इंतजार कर रहे थे। क्रिकेट जगत का एक वर्ग इस पूरे प्रकरण के लिए डेरन लेहमन को भी दोषी मान रहा है। वे लगातार कहते रहे हैं कि उनकी टीम सिर्फ ‘जीत-जीत जीत’ के लिए खेलती है। हालांकि, लेहमन वह व्यक्ति नहीं हैं, जिसने स्लेजिंग को इस उग्र रूप में पहुंचाया। इसके लिए पूर्व कप्तान स्टीव वॉ को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, जो मैच में या मैच से पहले विरोधी को मानसिक आघात (इसे स्लेजिंग और बुलीइंग पढ़ सकते हैं) पहुंचाना चाहते थे। ऑस्ट्रेलिया की टीम पिछले दशकों में अपने हार्ड और फेयर खेल के लिए गर्व करती रही है। वे इसके लिए स्लेजिंग की एक ‘लाइन’ भी तय करने का दावा करते रहे हैं। तब प्रशासकों से लेकर टीम के प्रशंसक भी इसे सही मानते रहे हैं। तब किसी ने रियलिटी चेक नहीं की। अगर रियलिटी चेक की गई होती तो शायद यह नौबत नहीं बनती।

बॉ



ayazmamon80@gmail.com